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    मंगल मुद्दा: कोयलांचल का खूनी कॉरीडोर, कब तक सांसें घोटेंगे कोल डंपर और बुझते रहेंगे मासूमों के चिराग?

    Updated: Tue, 28 Jul 2026 01:06 PM (IST)

    झारखंड के कोयलांचल में कोयला वाहनों से हो रही दुर्घटनाएं आम हो गई है। आम जनजीवन, छात्रों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधि अलग कॉरिड ...और पढ़ें

    HighLights

    1. कोयलांचल में कोल डंपरों से बढ़ रहे सड़क हादसे।

    2. बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव।

    3. अलग कोल कॉरिडोर बनाने की उठाई गई मांग।

    जागरण संवाददाता, चतरा। चतरा के टंडवा से लेकर रामगढ़ और धनबाद के कोयलांचल तक—तस्वीर एक जैसी और सिहरा देने वाली है। आम नागरिकों, बुजुर्गों और बस्तों लादे मासूम बच्चों के चलने के लिए बनी सार्वजनिक सड़कें आज पूरी तरह कोयला ढोने वाले भारी वाहनों (कोल डंपरों) के पहियों के नीचे दम तोड़ रही हैं।

    सुबह का सूरज उगते ही सड़कों पर शिक्षा की उम्मीदें नहीं, बल्कि कोयले से लदे ट्रकों की लंबी और खौफनाक कतारें नजर आती हैं। बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ और दिल में हर पल हादसे का डर—यही झारखंड के इन इलाकों की रोजमर्रा की सुबह है।

    रामगढ़ और धनबाद का भी हाल बेहाल

    चतरा के टंडवा और सिमरिया का यह दर्द सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे झारखंड के कोयलांचल की बानगी है। रामगढ़ में कुज्जू, पतरातू और गोला मार्ग पर कोयले ओवरलोडेड हाइवा और डंपरों का आतंक चरम पर है।

    यहां आए दिन सड़क दुर्घटनाओं में आम राहगीरों की जान जा रही है। स्कूल वैन और बसों को इन भारी वाहनों के बीच घंटों जाम से जूझना पड़ता है। कोयला राजधानी धनबाद का हाल तो और बुरा है। गोविंदपुर, कतरास, बाघमारा और सिंदरी क्षेत्र की सड़कें तो जैसे गड्ढों और कोयले की काली धूल का पर्याय बन चुकी हैं।

    यहां अवैध और बेलगाम कोयला परिवहन ने स्थानीय लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। हवा में उड़ता कोयला और सड़क पर दौड़ते मौत के सौदागर, बच्चों के फेफड़ों और जिंदगी दोनों पर भारी पड़ रहे हैं। हाई कोर्ट में भी चल रहा है मामला।

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    आंकड़े जो रूह कंपा दें

    • 1200 से अधिक मौतें: पिछले एक दशक में अकेले चतरा-टंडवा मार्ग पर सड़क हादसों में करीब 1200 लोगों के मारे जाने का अनुमान है। हालांकि कई आंकड़े कागजों में दब जाते हैं, लेकिन हर मौत के पीछे उजड़ा हुआ कोई परिवार जरूर होता है।
    • पढ़ाई पर ग्रहण: जाम और धूल के गुबार के कारण बच्चे समय पर स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं। मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना उनकी शैक्षणिक प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।

    राजनीतिक गलियारों से उठी आवाज

    जनता का यह दर्द अब सदन से लेकर सचिवालय तक गूंजने लगा है। हाल ही में स्थानीय सांसद कालीचरण सिंह ने लोकसभा में इस गंभीर मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया।

    उन्होंने दो टूक कहा कि टंडवा और सिमरिया क्षेत्र में कोल वाहनों के कारण आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। इन पर लगाम कसने और जनजीवन बचाने के लिए कोयला परिवहन के वास्ते अलग डेडिकेटेड कॉरिडोर (अलग सड़क) का निर्माण अब अनिवार्य हो गया है।

    वहीं, विधायक कुमार उज्ज्वल दास ने भी इस मामले की गंभीरता को समझते हुए राज्य के मुख्य सचिव और वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने कोयला परिवहन के इस नासूर का स्थाई निदान निकालने की जोरदार मांग की है।

    कोयला सिंडिकेट का 'काला खेल': आखिर पर्दे के पीछे कौन?

    झारखंड के कोयलांचल में यह सब किसी से छिपा नहीं है। प्रशासनिक सुस्ती और मिलीभगत के साए में कोयला सिंडिकेट का एक बहुत बड़ा और खतरनाक खेल चल रहा है।

    • तय मानकों को ताक पर रखकर ओवरलोडिंग करना।
    • बिना ढके कोयले का परिवहन कर पर्यावरण और सेहत से खिलवाड़ करना।
    • ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए तेज रफ्तार से डंपर दौड़ाना।

    यह सिंडिकेट इतना ताकतवर है कि आम जनता की जान इसकी प्राथमिकता सूची में दूर-दूर तक नहीं है। मुनाफाखोरी का यह तंत्र हर दिन मासूमों की जिंदगी दांव पर लगा रहा है। ज्यादातर कोयला खनन क्षेत्रों में खाकी, खादी और मीडिकर्मी मिले होते हैं।

    समाधान क्या है?

    जिंदगी की कीमत कोयले के हर टन से भारी है। जब तक सियासत और सिंडिकेट की सांठगांठ नहीं टूटेगी, तब तक सड़कों पर यूं ही लहू बहता रहेगा। इस समस्या से पार पाने के लिए कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि ग्राउंड जीरो पर कड़े फैसलों की दरकार है।

    • अलग कोल कॉरिडोर (Bypass/Alternative Route): आबादी वाले इलाकों और स्कूलों के बीच से कोयला ढुलाई तुरंत बंद हो। खनन क्षेत्रों से सीधे मुख्य हाईवे तक जोड़ने के लिए विशेष भारी वाहन मार्ग का युद्धस्तर पर निर्माण हो।
    • नो-इंट्री का कड़ाई से पालन: स्कूली बच्चों के आने-जाने के समय (पीक आवर्स में) कोल वाहनों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध (Strict No-Entry) लागू किया जाए और उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना व जब्ती की कार्रवाई हो।
    • सिंडिकेट पर शिकंजा: ओवरलोडिंग और अनफिट वाहनों को बढ़ावा देने वाले सिंडिकेट और ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ प्रशासन बिना किसी राजनीतिक दबाव के कठोर कानूनी कार्रवाई करे।
    • हाई-स्पीड सर्विलांस और कैमरे: बीसीसीएल, ईसीएल और सीसीएल में कैमरे की निगरानी की बात होती है, पर धरातल पर सीन अलग दिखता है। सड़कों पर सीसीटीवी और स्पीड रडार लगाकर डंपरों की रफ्तार पर लगाम लगाई जाए।


    अब वक्त आ गया है कि सरकार और प्रशासन सिर्फ मुआवजे के मरहम लगाने के बजाय, इस व्यवस्थागत बीमारी का स्थाई ऑपरेशन करें, ताकि झारखंड के बच्चे सुरक्षित सड़क पर चल सकें और उनका भविष्य अंधकार में न डूबे।

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