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    कोल इंडिया ने नई हाईटेक व्यवस्था की लागू, लेजर स्कैनर से हुई कोयला स्टॉक की जांच

    Updated: Mon, 11 May 2026 03:30 PM (IST)

    कोल इंडिया ने कोयला स्टॉक की मैन्युअल जांच में होने वाली हेराफेरी और गलत आकलन को रोकने के लिए नई हाईटेक व्यवस्था लागू की है। ...और पढ़ें

    एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

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    HighLights

    1. कोल इंडिया ने नई हाईटेक व्यवस्था लागू की।

    2. थ्रीडी लेजर स्कैनर से कोयला स्टॉक की जांच हुई।

    3. हेराफेरी, ओवररिपोर्टिंग पर नियंत्रण, पारदर्शिता बढ़ी।

    जागरण संवाददाता, धनबाद। कोयला स्टाक की मैन्युअल जांच में लगातार सामने आ रही ओवररिपोर्टिंग, गलत आकलन और कोयले की हेराफेरी की शिकायतों के बाद कोल इंडिया लिमिटेड ने नई हाईटेक व्यवस्था लागू कर दी है।

    संशोधित 'न्यू येलो बुक' के तहत पहली बार थ्रीडी टेरेस्ट्रियल लेजर स्कैनर और आधुनिक डिजिटल तकनीक से कोयला स्टाक की जांच पूरी कर ली गई है।

    अप्रैल के अंतिम सप्ताह और मई में विभिन्न परियोजनाओं में यह जांच कर रिपोर्ट भी कोल इंडिया मुख्यालय को सौंप दी गई है।

    नई तकनीक लागू होने से स्टाक की ओवररिपोर्टिंग, कोयला चोरी और हेराफेरी पर काफी हद तक नियंत्रण संभव हुआ है। इसके साथ ही उत्पादन, डिस्पैच और उपलब्ध स्टाक के आंकड़ों में पारदर्शिता बढ़ी है तथा भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने में मदद मिली है।

    अप्रैल 2026 से संशोधित नियम लागू होने के बाद अब खदानों में स्टाक की माप पूरी तरह वैज्ञानिक और डिजिटल प्रणाली से की जा रही है।

    हेरफेर की बनी रहती थी आशंका

    अब तक अधिकांश खदानों में कोयला स्टाक की माप पारंपरिक सर्वे और मानवीय अनुमान के आधार पर की जाती थी। इस प्रक्रिया में त्रुटि और हेरफेर की आशंका बनी रहती थी। कई परियोजनाओं में वास्तविक स्टाक से अधिक कोयला दिखाने, रिकॉर्ड में अंतर और चोरी की शिकायतें लगातार सामने आती रही थीं।

    सूत्रों के अनुसार कई बार स्टाक के आंकड़ों में बड़ा अंतर मिलने के बावजूद सटीक सत्यापन संभव नहीं हो पाता था।
    नई येलो बुक लागू होने के बाद पहली बार कोयला स्टाक की जांच थ्रीडी लेजर स्कैनर से की गई।

    जांच के दौरान पूरे कोयला स्टाक की त्रिआयामी डिजिटल स्कैनिंग कर वास्तविक आयतन और घनत्व का सटीक आकलन किया गया। इसके बाद विशेष साफ्टवेयर के माध्यम से सीधे स्टाक और वाल्यूम की गणना की गई।

    अप्रैल के अंतिम सप्ताह और मई में विभिन्न परियोजनाओं में यह प्रक्रिया पूरी की गई। अधिकारियों के अनुसार नई तकनीक से प्राप्त आंकड़े पारंपरिक पद्धति की तुलना में अधिक सटीक और पारदर्शी पाए गए हैं। इसके बाद अब इसे सभी परियोजनाओं और ओपनकास्ट खदानों में लागू कर दिया गया है।

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