धनबाद: अस्तित्व की जंग लड़ रही राजगंज की लाइफलाइन, नदी बनी कचरा डंपिंग जोन; प्रशासन मौन
राजगंज-मैराकुल्ही पथ पर स्थित नदी बाजार के कचरे से प्रदूषित हो रही है, जिससे यह 'लाइफ लाइन' गंदे नाले में बदल गई है। ...और पढ़ें
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HighLights
राजगंज-मैराकुल्ही नदी बाजार के कचरे से प्रदूषित।
नदी का पानी दूषित होने से बीमारियों का खतरा।
प्रशासनिक उदासीनता, ग्रामीणों की जागरूकता आवश्यक।
सुशील कुमार चौरसिया, कतरास (धनबाद)। पर्यावरण संरक्षण और नदी-तालाबों को बचाने के तमाम सरकारी दावों की पोल राजगंज-मैराकुल्ही पथ पर स्थित नदी खोल रही है। राजगंज बाजार का कूड़ा-कचरा बेधड़क होकर इस नदी में फेंका जा रहा है, जिससे इस जलस्रोत का वजूद ही खतरे में पड़ गया है।
पहाड़ की तलहटी से निकलने वाली और ग्रामीणों की ''लाइफलाइन'' कही जाने वाली यह नदी अब धीरे-धीरे सिमटकर गंदे नाले का रूप ले रही है। यदि जिला प्रशासन और स्थानीय स्तर पर इसे बचाने के लिए तुरंत ठोस व आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो बहुत जल्द यह नदी इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी।
झरने से शुरू हुआ सफर मैराकुल्ही पहुंचते ही बना 'कचरा घर'
इस नदी का उद्गम स्थल पहाड़ की तलहटी है। डकैया पहाड़ से गिरने वाला झरना ढहु नाला से होते हुए सरायदाहा, चुंगी, लाठाटांड के रास्ते मैराकुल्ही पहुंचती है और आगे धावाचिता होते हुए कतरी नदी में मिल जाती है।
विडंबना देखिए कि जिस नदी का सफर एक पवित्र झरने से शुरू होता है, उसे मैराकूल्ही पहुंचते ही राजगंज इलाके का कचड़ा डंपिंग जोन बना दिया जाता है। यहां प्रतिदिन भारी मात्रा में प्लास्टिक, थर्मोकोल और सबसे अधिक सब्जी बाजार की सड़ी-गली सामग्रियां फेंकी जा रही हैं।
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दूषित पानी से बढ़ रहा बीमारियों का खतरा, राहगीर भी परेशान
नदी में कचड़ा फेंके जाने के कारण पानी पूरी तरह दूषित हो चुका है। सड़ांध की वजह से नदी के आसपास से गुजरने वाले राहगीरों का सांस लेना तक दूभर हो गया है। इसके बावजूद, समुचित जलापूर्ति न होने के कारण आज भी आस-पास के ग्रामीण कपड़े धोने, स्नान करने और मवेशियों को पानी पिलाने के लिए इसी नदी पर निर्भर हैं। दूषित हो चुके पानी के संपर्क में आने से ग्रामीणों और उनके स्वजन के बीच त्वचा रोग व अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से पैर पसार रहा है।
कार्रवाई न होने से बेखौफ हैं पर्यावरण के दुश्मन
एक तरफ सरकार जलस्रोतों को बचाने के लिए जल जीवन मिशन जैसी करोड़ों की योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक उदासीनता के कारण लोग बेखौफ होकर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कचरे के लगातार जमाव से नदी का पाट संकरा होता जा रहा है। ढहती मिट्टी और कूड़े के ढेर के कारण नदी समतल होने की कगार पर है, जिससे इसका प्राकृतिक जलप्रवाह पूरी तरह बाधित हो सकता है।
ग्रामीणों की चेतना ही बचा सकती है वजूद
नदी को इस नारकीय स्थिति से बाहर निकालने के लिए अब सरकारी फाइलों से इतर ग्रामीणों को खुद जागरूक होना होगा। जब तक स्थानीय लोग कचरा फेंकने वालों का सामूहिक विरोध नहीं करेंगे और प्रशासन इस पर कड़ी कार्रवाई का हंटर नहीं चलाएगा, तब तक इस लाइफ लाइन को बचा पाना मुमकिन नहीं होगा।