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    वैश्विक पहचान की ओर बढ़ रहा झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर मांदर, जीआई टैग मिलने की उम्मीद

    Updated: Wed, 15 Apr 2026 04:44 PM (IST)

    गुमला का पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर अपनी मधुर थाप और सांस्कृतिक महत्व के कारण आज भी लोकप्रिय है। इसे वैश्विक पहचान दिलाने के लिए जीआई टैग दिलाने के प्र ...और पढ़ें

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    संतोष कुमार, गुमला। झारखंड के गुमला जिले की पहचान बन चुका पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर अपनी मधुर थाप और गहरे सांस्कृतिक महत्व के कारण आज भी लोगों के दिलों में विशेष स्थान बनाए हुए है।

    समय के साथ जीवनशैली और तकनीक में कई बदलाव आए, लेकिन मांदर की लोकप्रियता और उपयोगिता में कोई कमी नहीं आई है। आज भी जनजातीय समाज के अधिकांश घरों में यह वाद्ययंत्र टंगा हुआ दिखाई देता है और इसकी थाप सुनते ही लोग अनायास ही झूमने लगते हैं।

    मांदर को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में जिला प्रशासन द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2023 में गुमला के रायडीह प्रखंड के जर्जटा गांव स्थित मांदर प्रोड्यूसर कंपनी ने इस पारंपरिक वाद्ययंत्र के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग हेतु आवेदन किया था। इसके बाद 20 दिसंबर 2024 को दिल्ली में अंतिम सुनवाई निर्धारित की गई थी, जिससे उम्मीद थी कि मांदर को जीआई टैग मिल जाएगा।

    हालांकि तकनीकी कारणों से उस समय यह उपलब्धि हासिल नहीं हो सकी, लेकिन प्रशासन और कारीगरों के प्रयास अब भी लगातार जारी हैं। जुडिसियरी प्रोसेस में है। बताया जाता है कि मांदर को जीआई टैग दिलाने की पहल गुमला के तत्कालीन उपायुक्त सुशांत गौरव ने शुरू की थी, इसके बाद तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी द्वारा निरंतर मानिटर किया गया। हालांकि अब भी प्रक्रियाधीन है। जुडिसियरी प्रोसेस में है।

    मांदर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे पूरी तरह स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक तकनीकों से तैयार किया जाता है। इसके निर्माण में लाल मिट्टी, चमड़े की खाल और विशेष काला बालू (खरण) का उपयोग किया जाता है। मांदर का खोल शंख नदी की मिट्टी से बनाया जाता है, जबकि इसकी आवाज को मधुर बनाने के लिए चमड़े पर विशेष रंग लगाया जाता है, जिसे महिलाएं अपने हाथों से तैयार करती हैं। इसे अपने हाथों से ही कारीगर तैयार करतें है। जो इस वाद्ययंत्र की पारंपरिकता को और खास बनाती है।

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    गुमला जिले के रायडीह प्रखंड के जर्जटा गांव में दो दर्जन से अधिक परिवार पीढ़ियों से मांदर बनाने के कार्य से जुड़े हुए हैं। एक मांदर तैयार करने में तीन से आठ दिन का समय लगता है, जिसमें पूरे परिवार की मेहनत और पारंपरिक कौशल शामिल होता है।

    यही कारण है कि मांदर केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यदि मांदर को जीआई टैग प्राप्त होता है, तो यह झारखंड के लिए एक बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि साबित होगी।

    इससे कारीगरों को आर्थिक लाभ मिलेगा, उत्पाद की मांग बढ़ेगी और स्थानीय हस्तशिल्प को नई पहचान मिलेगी। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में झारखंड में हजारीबाग की सोहराई पेंटिंग को ही जीआई टैग प्राप्त है। ऐसे में मांदर को यह दर्जा मिलने से राज्य की सांस्कृतिक विरासत को एक और गौरवपूर्ण पहचान मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    जीआई टैग मिलने से बनेगी पहचान

    यदि मांदर को जीआई टैग मिल जाता है, तो इससे न केवल कारीगरों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि गुमला और झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। जीआई टैग मिलने के बाद बाजार में इसकी मांग बढ़ेगी। जिससे पारंपरिक रुप से जुड़े कारीगरों को लाभ मिलेगा।

    ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे, जिससे युवाओं का रुझान इस पारंपरिक कला की ओर बढ़ेगा। राज्य की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच पर पहचान मिलेगी। इसके अलावा, जीआई टैग एक कानूनी संरक्षण भी प्रदान करता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद सरकारी योजनाओं और निवेश में भी तेजी आएगी, जिससे स्थानीय उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। कुल मिलाकर, मांदर को जीआई टैग मिलना गुमला जिले के कारीगरों और क्षेत्रीय विकास के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकता है।

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