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    झारखंड में 3500 साल पुरानी सभ्यता! ASI के रिकॉर्ड में दर्ज हुए हथिंदर-सोहरा, असुर जनजाति के लौह उद्योग ने चौंकाया

    Updated: Fri, 03 Jul 2026 12:11 PM (GMT+05:30)

    ASI Survey in Jharkhand: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने चौपारण के हथिंदर और सोहरा सहित विभिन्न पुरास्थलों का दस्तावेजीकरण किया है, जिससे क्षेत्र ...और पढ़ें

    प्राचीन मूर्तियों, आयरन स्लैग, मृदभांड और पुरास्थलों का तैयार हुआ दस्तावेजीकरण। (तस्वीर: शशि शेखर)

    प्राचीन मूर्तियों, आयरन स्लैग, मृदभांड और पुरास्थलों का तैयार हुआ दस्तावेजीकरण। (तस्वीर: शशि शेखर)

    HighLights

    1. एएसआई ने हथिंदर और सोहरा के पुरास्थलों का दस्तावेजीकरण किया।

    2. चौपारण में प्राचीन लौह उद्योग और महापाषाणिक संस्कृति के प्रमाण।

    3. हजारीबाग में दैहर की अमूल्य प्रतिमाओं के लिए संग्रहालय की मांग उठी।

    शशि शेखर, चौपारण (हजारीबाग)। चौपारण के पुरातात्विक महत्व को लेकर वर्षों से उठ रही आवाज अब ठोस परिणाम की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों को लगातार प्रमुखता से सामने लाने के दैनिक जागरण के प्रयास रंग लाने लगे हैं।

    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के रांची जोन की टीम ने दो दिनों तक चौपारण प्रखंड के हथिंदर, सोहरा और दैहर सहित विभिन्न पुरास्थलों का विस्तृत निरीक्षण कर उनका औपचारिक दस्तावेजीकरण किया। इसके साथ ही हथिंदर और सोहरा के पुरातात्विक अवशेष पहली बार भारतीय पुरातत्व विभाग के अभिलेख में विधिवत दर्ज हो गए हैं।

    एएसआई के सहायक पुरातत्वविद डॉ. नीरज कुमार मिश्रा तथा वरिष्ठ छायाकार कन्हैया कुमार झा के नेतृत्व में पहुंचे विशेषज्ञों ने प्राचीन मूर्तियों, अभिलेखों, आयरन स्लैग, मृदभांड, महापाषाणिक अवशेषों तथा धार्मिक स्थलों का सूक्ष्म अध्ययन किया।

    टीम ने इन सभी स्थलों का फोटोग्राफिक एवं तकनीकी रिकॉर्ड तैयार किया, जिसे अब वरीय अधिकारियों को भेजा जाएगा। यह चौपारण क्षेत्र का एएसआई द्वारा तीसरा औपचारिक व अधिकारिक सर्वेक्षण है।

    पहले चरण में मानगढ़ और चैथी, दूसरे चरण में दैहर तथा अब तीसरे चरण में हथिंदर और सोहरा के विस्तृत पुरातात्विक अवशेषों का सर्वे किया गया। डॉ. मिश्रा ने बताया कि जुलाई माह के अंतिम सप्ताह में पांच दिनों का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण फिर से किया जाएगा, जिसमें कई नए स्थलों का भी अध्ययन होगा।

    उन्होंने कहा कि हजारीबाग और चतरा जिले की धरती अपने भीतर तीन से साढ़े तीन हजार वर्षों का समृद्ध इतिहास समेटे हुए है। लगातार मिल रहे पुरातात्विक साक्ष्य इस क्षेत्र को झारखंड ही नहीं, बल्कि पूर्वी भारत के महत्वपूर्ण प्राचीन सांस्कृतिक केंद्रों में स्थापित कर सकते हैं।

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    लौह उद्योग का था बड़ा केंद्र, भारी मात्रा में मिला आयरन स्लैग

    निरीक्षण के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तथ्य बड़ी मात्रा में मिले आयरन स्लैग, भट्टियों के अवशेष तथा लौह प्रगलन से जुड़े अन्य पुरावशेष रहे। डॉ. मिश्रा ने बताया कि चौपारण और चतरा क्षेत्र में प्रथम शताब्दी ईस्वी से ही असुर जनजाति द्वारा लौह प्रगलन किए जाने के पर्याप्त प्रमाण मिल रहे हैं।

    उन्होंने बताया कि क्षेत्र के अनेक महापाषाणिक समाधि स्थलों के आसपास लौह स्लैग, भट्टियों के अवशेष तथा लौह अयस्क के टुकड़े मिले हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि यहां विकसित लौह प्रौद्योगिकी विद्यमान थी।

    महापाषाणिक संस्कृति और लौह उद्योग का यह सह-अस्तित्व इस क्षेत्र की तकनीकी उन्नति का प्रमाण है। विशेषज्ञों के अनुसार चौपारण क्षेत्र में लौह उत्पादन की परंपरा केवल प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक सीमित नहीं रही, बल्कि आठवीं-नौवीं शताब्दी ईस्वी तक लगातार जारी रही।

    मानगढ़ से ताम्र पाषाण, हथिंदर-दैहर से लौह संस्कृति के प्रमाण

    डॉ. मिश्रा ने बताया कि मानगढ़ से ताम्र पाषाण काल के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। वहीं हथिंदर, दैहर और मानगढ़ के आसपास बड़ी मात्रा में लौह स्लैग, भट्टियों के अवशेष तथा लौह उत्पादन से संबंधित सामग्री मिली है।

    इन साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि चौपारण केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था, बल्कि यहां विकसित धातुकर्म भी होता था। यही लौह तकनीक आगे चलकर मंदिरों, मठों और विशाल स्थापत्य निर्माण में उपयोगी सिद्ध हुई।

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    हथिंदर का सती प्रस्तर स्तंभ बना शोध का नया विषय

    निरीक्षण के दौरान हथिंदर गांव में स्थित प्राचीन सती प्रस्तर स्तंभ का भी विस्तृत अध्ययन किया गया। डॉ. मिश्रा ने बताया कि यह प्रस्तर स्तंभ झारखंड के अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्यों में शामिल है। इस पर अंकित सूर्य, चंद्रमा, आशीर्वाद मुद्रा में उठा हुआ हाथ तथा महिला-पुरुष की आकृतियां तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी देती हैं।

    उन्होंने बताया कि झारखंड में अब तक ऐसे सती स्मारकों के प्रमुख प्रमाण केवल हथिंदर, पलामू के देवगन तथा चतरा के भद्रकाली मंदिर परिसर से ही ज्ञात हुए हैं। शैलीगत अध्ययन के आधार पर इन सती प्रस्तरों का काल 14वीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी माना जा रहा है।

    नौवीं से तेरहवीं शताब्दी तक की दुर्लभ प्रतिमाएं

    निरीक्षण के दौरान दैहर गांव एक बार फिर विशेषज्ञों के आकर्षण का केंद्र बना। यहां नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के मध्य की दर्जनों दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमाएं मिली हैं। इनमें उमा-महेश्वर, विष्णु, शिव सहित शैव एवं वैष्णव परंपरा की उत्कृष्ट मूर्तियां हैं, वहीं अवलोकितेश्वर, देवी तारा, बोधिसत्त्व तथा बुद्ध की प्रतिमाएं इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म की मजबूत उपस्थिति का प्रमाण देती हैं।

    कई प्रस्तर फलक पर मन्नत स्तूप तथा बुद्ध प्रतिमाओं का अंकन मिला है। छोटे-छोटे स्तूपों के अवशेष भी यहां बौद्ध भक्ति परंपरा के विकास की पुष्टि करते हैं। कमला माता मंदिर परिसर में संरक्षित बौद्ध देवी मरीची की दुर्लभ प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इस प्रतिमा पर अंकित अभिलेख इसके ऐतिहासिक महत्व को और अधिक मजबूत बनाते हैं।

    मृदभांडों ने भी खोले इतिहास के नए पन्ने

    निरीक्षण के दौरान क्षेत्र से प्राप्त ब्लैक एंड रेड वेयर तथा नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर मृदभांडों का भी अध्ययन किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार इन मृदभांडों की उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि चौपारण क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक निरंतर आबाद रहा और यहां विकसित सभ्यता का विस्तार था।

    डॉ. नीरज मिश्रा ने कहा हजारीबाग और चतरा जिले में अत्यंत समृद्ध इतिहास छिपा हुआ है। यहां से प्राप्त आयरन स्लैग, महापाषाणिक अवशेष, प्राचीन मृदभांड, बौद्ध एवं सनातन परंपरा की मूर्तियां इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की पुष्टि करती हैं। सभी पुरास्थलों का दस्तावेज तैयार कर वरीय अधिकारियों को भेजा जाएगा। भविष्य में यहां व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधान की पूरी संभावना है।

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    खुले आसमान के नीचे पड़ी हैं दैहर की पांच दर्जन से अधिक अमूल्य प्रतिमाएं

    दैहर गांव में हजारों वर्ष पुरानी करीब पांच दर्जन से अधिक दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमाएं आज भी खुले आसमान के नीचे पड़ी हुई हैं। बारिश, धूप और प्राकृतिक क्षरण के कारण इन अमूल्य धरोहरों को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।

    स्थानीय ग्रामीण सुरेश कुशवाहा, कपिल कुशवाहा, अमित कुशवाहा सहित अनेक लोगों ने दैहर में स्थायी पुरातत्व संग्रहालय (म्यूजियम) बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इन प्रतिमाओं को सुरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर नष्ट हो सकती है।

    एएसआई के सहायक पुरातत्वविद डॉ. नीरज कुमार मिश्रा ने भी माना कि दैहर की प्रतिमाएं केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत हैं। यदि यहां संग्रहालय स्थापित होता है तो यह क्षेत्र इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण केंद्र बनेगा। इससे हमारी सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रहेगी साथ ही स्थानीय पर्यटन और रोजगार को भी नई दिशा मिलेगी।

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