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    झारखंड में जुरासिक काल के जीवाश्म: 7 जिलों में 13 प्रमुख स्थल, संरक्षण के लिए विधेयक की तैयारी; वन विभाग करेगा सर्वेक्षण

    Updated: Mon, 02 Feb 2026 07:30 PM (IST)

    Jharkhand के लाखों साल पुराने जुरासिक काल के जीवाश्म (fossil), जो राज्य के भौगोलिक इतिहास को दर्शाते हैं, खनन और अवैध गतिविधियों के कारण खतरे में हैं। ...और पढ़ें

    झारखंड में जुरासिक काल के जीवाश्म, संरक्षण जरूरी।

    झारखंड में जुरासिक काल के जीवाश्म, संरक्षण जरूरी।

    HighLights

    1. झारखंड के जुरासिक जीवाश्म खनन गतिविधियों से खतरे में।

    2. विधायक सरयू राय संरक्षण हेतु विधानसभा में विधेयक लाएंगे।

    डिजिटल डेस्क, रांची। झारखंड की प्राकृतिक धरोहर में लाखों साल पुराने जुरासिक काल के जीवाश्म (फॉसिल्स) शामिल हैं, जो राज्य की भौगोलिक इतिहास की कहानी बयां करते हैं। ये जीवाश्म मुख्य रूप से पौधों के अवशेष हैं, जो 68 से 145 मिलियन वर्ष पुराने हैं। हालांकि, पत्थर खनन, अयस्क परिवहन और अवैध गतिविधियों से ये साइट्स नष्ट हो रही हैं।

    राज्य में कुल 13 प्रमुख जीवाश्म स्थल हैं, जिनमें से अधिकांश राजमहल हिल्स क्षेत्र में केंद्रित हैं। विधायक सरयू राय विधानसभा के आगामी बजट सत्र (फरवरी-मार्च 2026) में इनके संरक्षण के लिए एक विशेष विधेयक लाने की तैयारी कर रहे हैं।

    वन एवं पर्यावरण विभाग भी इन साइट्स का सर्वेक्षण कर सुरक्षा उपाय अपनाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ये जीवाश्म न केवल वैज्ञानिक महत्व के हैं, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देने में भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।

    जीवाश्म स्थलों की स्थिति और स्थान  

    झारखंड में जुरासिक काल के जीवाश्म मुख्य रूप से राजमहल फॉर्मेशन (ऊपरी गोंडवाना अनुक्रम) से जुड़े हैं, जो पौधों के जीवाश्मों से भरपूर है। रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के प्रोफेसर नीतीश प्रियदर्शी के अनुसार, राज्य में 13 बड़े जीवाश्म साइट्स हैं।

    इनमें से ज्यादातर साहिबगंज जिले की राजमहल पहाड़ियों में स्थित हैं, जो सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। राजमहल हिल्स उत्तर-दक्षिण दिशा में 193 किलोमीटर तक फैली हैं, जो साहिबगंज से पश्चिम बंगाल के रामपुरहाट तक जाती हैं।

    यहां प्रमुख स्थलों का विवरण 

    1. राजमहल हिल्स, साहिबगंज: सबसे बड़ा जीवाश्म क्षेत्र। यहां 68-145 मिलियन वर्ष पुराने पौधों के जीवाश्म मिलते हैं, जिनमें ग्लोसोप्टेरिस, गैंगमोप्टेरिस जैसे पौधे शामिल हैं। बिरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबोटनी (लखनऊ) ने यहां के जीवाश्मों का अध्ययन किया है। क्षेत्र में मंड्रो फॉसिल पार्क विकसित किया गया है, जहां पेड़ों के तनों और पेट्रीफाइड रिंग्स प्रदर्शित हैं।  

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    2. मंड्रो फॉसिल पार्क, साहिबगंज: झारखंड का पहला फॉसिल पार्क, जो 2022 में खोला गया। यहां राजमहल हिल्स से लाए गए जीवाश्म रखे गए हैं। पार्क में हरे-भरे बाग, विशाल मूर्तियां और एक छोटा संग्रहालय है, जहां प्रागैतिहासिक युग के जीवाश्म देखे जा सकते हैं। यह पार्क 10.79 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है।  

    3. सोनाजोरी हिल्स, पाकुड़: यहां जुरासिक युग के दुर्लभ पौधों के जीवाश्म मिले हैं। 2017 में यहां की खोज से वैज्ञानिक समुदाय में हलचल मची थी। पाकुड़ जिले में निपानिया (24°32' : 87°34') और अमरापारा जैसे इलाके भी जीवाश्मों से समृद्ध हैं।  

    4. महाराजपुर, तरपाहड़, गर्मी पहाड़, बरहरवा, साहिबगंज: ये साहिबगंज के प्रमुख इलाके हैं जहां जुरासिक काल की पत्तियों के जीवाश्म मिले हैं। 2020 में भूविज्ञानियों ने यहां से कई नमूने एकत्र किए। पड़ोसी पाकुड़ जिले के सोनाजोरी में भी समान जीवाश्म पाए गए।  

    5. सिमडेगा, खूंटी, लोहरदगा और पलामू: ये जिले भी जीवाश्म साइट्स के लिए जाने जाते हैं। सिमडेगा और खूंटी में नदियों के किनारे जीवाश्म मिलते हैं, जबकि लोहरदगा और पलामू में पत्थर खनन से प्रभावित क्षेत्र हैं।  

    6. गुमला जिला: यहां नदियों के किनारे कई अनअधिसूचित जीवाश्म स्थल हैं, जिन्हें अभी संरक्षित नहीं किया गया है। वन विभाग इनकी पहचान और अधिसूचना की योजना बना रहा है।

    7. अन्य गांव और प्रभावित क्षेत्र: साहिबगंज के अलावा, अमजोला, गुरमी, पंगडो, धोकुटी, बेकचुरी जैसे दर्जनों गांव राष्ट्रीय राजमार्ग-80 के साथ राजमहल हिल्स पर बसे हैं। यहां पत्थर खनन से जीवाश्मों को खतरा है।  

    ये जीवाश्म गोंडवाना महाद्वीप के टूटने और भारत की भौगोलिक विकास की कहानी बताते हैं। इनके आसपास जल स्रोत होने से शोधकर्ताओं को लाखों साल पुरानी जलवायु और भौगोलिक स्थितियों का अध्ययन करने में आसानी होती है।  

    जीवाश्मों पर खतरा: खनन परिवहन की वजह से बर्बादी  

    प्रोफेसर नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि अधिकांश साइट्स पत्थर खनन की चपेट में हैं। संरक्षित साइट्स पर भी अयस्क परिवहन से जीवाश्मों की संरचना टूट रही है, जिससे वे मिट्टी में बिखर रहे हैं। खनन कंपनियां पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रही हैं, जिससे जीवाश्म नष्ट हो रहे हैं। 

    संरक्षण के प्रयास: वन विभाग की कार्ययोजना  

    वन एवं पर्यावरण विभाग ने इन जीवाश्मों की रक्षा के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की है। विभाग इन साइट्स का सर्वेक्षण कराएगा और नए स्थलों को अधिसूचित करेगा। जीवाश्म पार्क विकसित करने और पर्यटन गतिविधियां शुरू करने की योजना है।

    मंड्रो फॉसिल पार्क इसका उदाहरण है, जहां पर्यटकों को जीवाश्मों की जानकारी दी जाती है। विभाग का लक्ष्य है कि इन साइट्स को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराया जाए।  

    सरयू राय का विधेयक: पर्यावरण संरक्षण पर फोकस  

    विधायक सरयू राय, जो लंबे समय से झारखंड में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं, विधानसभा के बजट सत्र में जीवाश्म संरक्षण से जुड़ा विधेयक लाने वाले हैं।

    यह विधेयक खनन गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण, जीवाश्म साइट्स की सुरक्षा और पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण पर जोर देगा। सरयू राय ने कहा, "खनन जहां होता है, वहां पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है।

    जीवाश्म जैसी धरोहरों को बचाना जरूरी है, वरना हम अपनी प्राकृतिक संपदा खो देंगे।" यह विधेयक राज्य सरकार की नीतियों में बदलाव ला सकता है, जिसमें खनन कंपनियों पर जुर्माना और जीवाश्म क्षेत्रों में प्रतिबंध शामिल होंगे।  

    वैज्ञानिक महत्व और भविष्य की संभावनाएं  

    सीनियर जर्नलिस्ट देवेंद्र सिंह बताते हैं- झारखंड के जीवाश्म न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हैं। ये जुरासिक काल की पौधों की विविधता दर्शाते हैं। इन साइट्स को संरक्षित कर पर्यटन बढ़ाया जा सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। अवैध खनन रोकने के लिए सख्त कानून जरूरी हैं।

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