टाटा समूह में तीसरी बार गहराया शीर्ष नेतृत्व का संकट, चंद्रशेखरन की विदाई से मोदी व मिस्त्री विवाद की यादें ताजा
टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन के इस्तीफे से समूह में शीर्ष नेतृत्व का संकट फिर गहरा गया है, जो ...और पढ़ें

चंद्रशेखरन के इस्तीफे से 1991 के टाटा स्टील और रूसी मोदी विवाद की यादें ताजा हुईं।
HighLights
चंद्रशेखरन का इस्तीफा, टाटा समूह में नेतृत्व संकट।
नोएल टाटा ने कार्यकाल विस्तार का किया विरोध।
1991 के रूसी मोदी विवाद की हुई तुलना।
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। टाटा समूह अपनी मजबूत कारपोरेट गवर्नेंस और स्थापित मूल्यों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इसके बावजूद पिछले तीन दशकों से समूह के शीर्ष नेतृत्व में सुचारू बदलाव एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन के अचानक इस्तीफे ने एक बार फिर तीन दशक पुराने नेतृत्व संकट को सतह पर ला दिया है। टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष नोएल टाटा द्वारा चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार का विरोध करने और कुछ महत्वाकांक्षी डिजिटल व विनिर्माण परियोजनाओं के वित्तीय नतीजों पर सवाल उठाने के बाद यह स्थिति बनी।
टाटा समूह में शीर्ष स्तर पर खींचतान का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले रतन टाटा के दौर में टाटा स्टील के तत्कालीन कद्दावर प्रमुख रूसी मोदी के साथ हुआ शक्ति संघर्ष भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के सबसे चर्चित विवादों में दर्ज है।
टाटा स्टील और रूसी मोदी का ऐतिहासिक टकराव
टाटा स्टील के पूर्व अधिकारी प्रभात शर्मा बताते हैं, मार्च 1991 में जब जेआरडी टाटा ने पद छोड़कर रतन टाटा को टाटा संस का अध्यक्ष बनाया, तब समूह की कमान संभालना कतई आसान नहीं था। उस दौर में समूह की विभिन्न कंपनियों के प्रमुखों के पास असीमित अधिकार थे। इनमें सबसे शक्तिशाली नाम टाटा स्टील (तत्कालीन टिस्को) के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक रूसी मोदी का था।
जमशेदपुर से टाटा स्टील का विशाल साम्राज्य चलाने वाले रूसी मोदी का प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्होंने रतन टाटा की नियुक्ति का खुलकर विरोध किया था। उन्होंने बताया कि दोनों के बीच टकराव तब चरम पर पहुंच गया जब 1991 के अंत में रूसी मोदी ने टाटा संस की मंजूरी के बिना अपने चहेते अधिकारी आदित्य कश्यप को संयुक्त प्रबंध निदेशक बना दिया।
रतन टाटा ने इसे अपनी कमान को सीधी चुनौती माना और टाटा स्टील के निदेशक मंडल की बैठक बुलाकर उस पदोन्नति को रद करा दिया। इसके बाद रतन टाटा ने कार्यकारी और गैर-कार्यकारी निदेशकों के लिए सेवानिवृत्ति आयु नीति लागू की।
लंबे चले सार्वजनिक विवाद के बाद रूसी मोदी को पहले प्रबंध निदेशक पद से हटाया गया और अप्रैल 1993 में उन्हें टाटा स्टील के अध्यक्ष पद से भी बेदखल कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में जेआरडी टाटा का मौन समर्थन रतन टाटा के साथ था।
साइरस मिस्त्री के बाद अब चंद्रशेखरन की विदाई
रूसी मोदी के अलावा टाटा केमिकल्स के दरबारी सेठ और इंडियन होटल्स के अजीत केरकर को भी इसी तरह समूह से बाहर होना पड़ा था। बाद में 2016 में साइरस मिस्त्री और रतन टाटा के बीच घाटे में चल रही इकाइयों और टाटा के मूल्यों को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद मिस्त्री को अचानक पद से हटा दिया गया।
अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स की कमान संभाली और नियंत्रण मजबूत किया। फरवरी 2026 में नोएल टाटा ने टाटा न्यू, बिगबास्केट और सेमीकंडक्टर इकाइयों में भारी पूंजी निवेश और धीमे नतीजों पर सवाल उठाते हुए चंद्रशेखरन के 2027 से 2032 तक के कार्यकाल विस्तार का विरोध किया। छह महीने तक आम सहमति न बनने पर आखिरकार चंद्रशेखरन को अपना पद छोड़ना पड़ा।
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