जामताड़ा सदर अस्पताल: कमांडो सिक्योरिटी पर भरोसा नहीं, विशेष पुलिस बल की मांग; बवाल के बाद डॉक्टरों की दो टूक
जामताड़ा सदर अस्पताल में प्रसूता की मौत के बाद हुए हंगामे और तोड़फोड़ ने निजी सुरक्षा एजेंसी की विफलता उजागर की है। ...और पढ़ें
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सदर अस्पताल में गिरफ्तारी व सुरक्षा की मांग को लेकर प्रदर्शन करते चिकित्सक
HighLights
प्रसूता की मौत के बाद जामताड़ा अस्पताल में तोड़फोड़ हुई।
निजी सुरक्षा एजेंसी भीड़ नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल रही।
डॉक्टरों ने अस्पताल में विशेष पुलिस बल की तैनाती मांगी।
जागरण संवाददाता, जामताड़ा। सदर अस्पताल में गुरुवार को प्रसूता की मौत के बाद हुए हंगामे और तोड़फोड़ ने अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
अस्पताल की सुरक्षा के लिए निजी एजेंसी कमांडो सिक्योरिटीज के माध्यम से महिला एवं पुरुष सुरक्षा कर्मियों की तैनाती पर हर माह लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन घटना के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल नजर आई। हंगामे के समय सुरक्षा कर्मी न तो भीड़ को नियंत्रित कर सके और न ही अस्पताल की संपत्ति को नुकसान पहुंचने से रोक पाए।
जानकारी के अनुसार सदर अस्पताल में कमांडो सिक्योरिटीज के 14 सुरक्षा जवान तीन शिफ्टों में 24 घंटे तैनात रहते हैं। प्रत्येक सुरक्षा कर्मी को 12 हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाता है।
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(अस्पताल में तोड़फोड़ के बाद बिखरा मशीन)
इस प्रकार एजेंसी को हर महीने करीब 1.68 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है। इसके बावजूद अस्पताल में सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि केवल निजी सुरक्षा एजेंसी के भरोसे अस्पताल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
बता दें कि घटना के समय जनरल ओपीडी की सेवा समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में सुरक्षा एजेंसी को हालात की गंभीरता को देखते हुए मुख्य प्रवेश द्वार बंद कर देना चाहिए था, ताकि आक्रोशित भीड़ अस्पताल परिसर में प्रवेश नहीं कर पाती।
इमरजेंसी सेवा के लिए अलग प्रवेश द्वार खुला रखा जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसका फायदा उठाकर भीड़ अस्पताल के भीतर पहुंच गई और जमकर तोड़फोड़ की।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हंगामे के दौरान कमांडो सिक्योरिटीज के सुरक्षा कर्मी कहीं नजर नहीं आए और न ही भीड़ को नियंत्रित करने का कोई प्रभावी प्रयास किया गया। इससे सुरक्षा एजेंसी की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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(सदर अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज खंगालते पुलिस पदाधिकारी)
अस्पताल प्रबंधन डाक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों की सुरक्षा के लिए नियमित रूप से निजी सुरक्षा एजेंसी पर खर्च कर रहा है। इसके बावजूद यदि अस्पताल परिसर में इस तरह की घटना होती है तो सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ रहा है।
घटना के बाद चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है। डॉक्टरों ने मांग की है कि अस्पताल में पहले की तरह विशेष पुलिस बल की तैनाती की जाए। उनका कहना है कि सरकारी अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में प्रशिक्षित पुलिस बल की मौजूदगी ही ऐसी घटनाओं को रोक सकती है और चिकित्सकों को सुरक्षित वातावरण प्रदान कर सकती है।
प्रसूता की मौत के बाद हुए इस हंगामे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल निजी सुरक्षा एजेंसी की तैनाती पर्याप्त नहीं है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब अस्पताल की सुरक्षा पर हर माह लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तब भी यदि तोड़फोड़ और हिंसा नहीं रुक पा रही है, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी? घटना के बाद अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और सुरक्षा एजेंसी की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग हो रही है।
अस्पताल उपाधीक्षक डा. दिनेश प्रसाद ने कहा कि सदर अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था के लिए कुल 14 सुरक्षा गार्ड तैनात हैं। इनमें 10 सुरक्षा गार्ड कमांडो सिक्योरिटीज के तथा चार गार्ड बाहर से प्रतिनियुक्त हैं। सभी सुरक्षा कर्मी तीन शिफ्टों में 24 घंटे ड्यूटी करते हैं। प्रत्येक सुरक्षा गार्ड को 12 हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाता है।