पाकुड़ में कोयला प्रदूषण पर एनजीटी का चाबुक, झारखंड सरकार को नोटिस जारी; 23 अप्रैल को होगी सुनवाई
पाकुड़ में कोयला खनन और ढुलाई से हो रहे भीषण प्रदूषण पर एनजीटी ने कड़ा रुख अपनाया है। अधिवक्ता मदन लाल अग्रवाल की शिकायत पर एनजीटी ने इसे औपचारिक मुकद ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
गणेश पांडेय, पाकुड़। पाकुड़ जिले में कोयला खनन और परिवहन से हो रहे भीषण प्रदूषण के विरुद्ध एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। शिकायत के बाद कोयला प्रदूषण के मामले को गंभीरता से लिया है।
पाकुड़ कोर्ट के अधिवक्ता मदन लाल अग्रवाल ने इस मामले से एनजीटी को अवगत कराया था। इसे गंभीरता से लेते हुए एनजीटी ने औपचारिक मुकदमे के रूप में दर्ज कर लिया है और झारखंड सरकार को जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया है।
अधिवक्ता ने एनजीटी को बताया था कि कैसे अमड़ापाड़ा से पाकुड़ के लोटामारा के बीच कोयले की ढुलाई के कारण उड़ने वाली धूल लोगों के फेफड़ों में जहर घोल रही है। एनजीटी ने अधिवक्ता को पत्र भेजकर अवगत कराया है कि इस मामले की सुनवाई हेतु 23 अप्रैल की तिथि निर्धारित की गई है।
एनजीटी ने आदेश दिया है कि सुनवाई के दिन व्यक्तिगत रूप से या वीडिया कांफ्रेंसिंग के माध्यम से अभिकरण के समक्ष उपस्थित हो और आवेदन में किए गए दावों के समर्थन में उपलब्ध सामग्री/साक्ष्य प्रस्तुत करें।
क्या है मामला
शहर के सिंधीपाड़ा हरिणडांगा बाजार निवासी और पाकुड़ न्यायालय के अधिवक्ता मदन लाल अग्रवाल ने दो जुलाई 2025 को एनजीटी को पत्र भेजा था। इस पत्र में क्षेत्र की पर्यावरणीय समस्याओं की ओर अधिकरण का ध्यान आकर्षित किया गया था। कोलकाता पीठ ने इस पत्र को मूल आवेदन के रूप में पंजीकृत कर लिया है।
इस मामले की सबसे खास बात यह है कि इस याचिका का मुख्य आधार दैनिक जागरण में छपी वह रिपोर्ट बनी, जिसमें कोयले की कालिख से काले हो रहे जल, जंगल और जमीन की भयावह तस्वीर पेश की गई थी।
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अधिवक्ता मदन लाल अग्रवाल ने इसी खबर का हवाला देते हुए एनजीटी को बताया था कि कैसे अमड़ापाड़ा से पाकुड़ लोटामारा के बीच कोयले की ढुलाई के कारण उड़ने वाली धूल लोगों को नुकसान पहुंच रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एनजीटी द्वारा पत्र याचिका को स्वतः संज्ञान में लेना यह दर्शाता है कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर अदालतें अब काफी सक्रिय है। पाकुड़ जैसे क्षेत्र, जो खनन और स्टोन क्रशर उद्योगों के लिए जाने जाते हैं, वहां इस तरह की याचिकाओं का भविष्य में बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
सांस की बीमारियों से जूझ रहे हैं ग्रामीण
अधिवक्ता द्वारा दायर याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि कोयले की धूल के कारण कृषि क्षेत्र, जंगल और पानी के स्रोत पूरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं। धूल के कणों की मोटी परत न केवल प्रकृति को नष्ट कर रही है, बल्कि स्थानीय जनजातीय आबादी में सांस की गंभीर बीमारियां पैदा कर रही है।
हालांकि इस मामले में स्थानीय ग्रामीण भयवश कुछ बोलना नहीं चाह रहे हैं, लेकिन गंभीरतापूर्वक मामले की जांच की जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी। एनजीटी कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि आवेदक अपने सभी साक्ष्यों और दस्तावेजों (अखबार की कटिंग व अन्य सबूतों) के साथ अदालत के समक्ष पेश हों।