पाकुड़ में 329 साल पुरानी राजशाही परंपरा आज भी कायम, मुगलकाल में भी नहीं रुकी कुलदेवता की रथयात्रा
पाकुड़ की 329 साल पुरानी ऐतिहासिक रथयात्रा आज भी उसी श्रद्धा और राजशाही गरिमा के साथ जारी है, जो मुगलकाल से लेकर आधुनिक भारत तक के इतिहास की जीवंत तस् ...और पढ़ें

रथयात्रा की फाइल फोटो
HighLights
पाकुड़ की रथयात्रा 329 साल पुरानी राजशाही परंपरा है।
भगवान मदनमोहन की यह यात्रा 1697 में शुरू हुई थी।
रानी ज्योतिर्मयी ने 1931 में भव्य पीतल का रथ बनवाया।
भारतेंदु त्रिवेदी, पाकुड़। इतिहास जब अपनी सबसे जीवंत तस्वीर दिखाता है, तो वह किसी किताब के पन्नों पर नहीं, बल्कि परंपराओं के रूप में समाज के बीच दिखाई देता है।
पाकुड़ की ऐतिहासिक रथयात्रा ऐसी ही अमर विरासत है, जो पिछले 329 वर्षों से समय के हर उतार-चढ़ाव को पार करते हुए आज भी उसी श्रद्धा, राजशाही गरिमा और उसी जनआस्था के साथ आगे बढ़ रही है।

रथ सजाने में जुटे मजदूर
जब गुरुवार की शाम भगवान मदनमोहन राधिका संग भव्य रथ पर विराजमान होकर राजबाड़ी से मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे, तब केवल एक धार्मिक शोभायात्रा नहीं निकलेगी, बल्कि मुगलकाल से लेकर आधुनिक भारत तक का जीवंत इतिहास पाकुड़ की सड़कों पर उतर आएगा।
सैकड़ों साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
यह रथयात्रा केवल भगवान की यात्रा नहीं, बल्कि तीन शताब्दियों से अधिक समय से संतालपरगना की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक गौरव की प्रतीक रही है।
राजवंश बदले, शासन बदले, सीमाएं बदलीं, राजधानी बदली, रथ का स्वरूप बदला और यात्रा का मार्ग भी बदला, लेकिन भगवान मदनमोहन की रथयात्रा कभी नहीं रुकी।
यही इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक शक्ति और पहचान है। पहले रथयात्रा राजबाड़ी से निकलकर शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए रानी ज्योतिर्मयी स्टेडियम तक जाती थी, जहां भगवान आठ दिनों तक मौसीबाड़ी में विराजमान रहते थे।
प्रशासनिक कारणों से यात्रा मार्ग बदला और अब रथ भगतपाड़ा स्थित बिल्टू स्कूल तक जाकर वापस लौटता है, लेकिन यात्रा का स्वरूप बदलने के बावजूद श्रद्धा का प्रवाह कभी कम नहीं हुआ।
कंचनगढ़ से जली आस्था की अखंड ज्योति
वर्ष 1697 में पाकुड़ राज के प्रथम राजा स्वर्गीय पितृ चंद्र शाही ने तत्कालीन राजधानी कंचनगढ़ से भगवान मदनमोहन और रुक्मिणी माता की रथयात्रा प्रारंभ की।
भगवान मदनमोहन पाकुड़ राज के कुलदेवता थे और राजपरिवार स्वयं राजशाही परंपरा के अनुसार रथयात्रा का नेतृत्व करता था। आज भी कंचनगढ़ की ऐतिहासिक राजबाड़ी के खंडहर उस स्वर्णिम अतीत की गवाही देता है।
पहाड़िया विद्रोह ने राजधानी बदली परंपरा नहीं
वर्ष 1739 में द्वितीय राजा सितेश चंद्र शाही ने राजपाट संभाला। उनके शासनकाल में रथयात्रा आदिम जनजाति पहाड़िया और आदिवासी समाज के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल हो गई।
वर्ष 1802 में पहाड़िया विद्रोह और अस्थिर परिस्थितियों के बाद वर्ष 1815 में राजपरिवार ने कंचनगढ़ छोड़कर मोहनपुर में नया राजपाट स्थापित किया, लेकिन भगवान का रथ वहां भी उसी श्रद्धा और वैभव के साथ निकलता रहा। उस समय विशाल नीम की लकड़ी का रथ लोगों की आस्था का केंद्र था।
वर्ष 1856 में पाकुड़ बना रथयात्रा का स्थायी धाम
वर्ष 1826 में तृतीय राजा स्वर्गीय गोपीनाथ पांडेय ने राजपाट संभाला और वर्ष 1856 में पाकुड़ आकर बस गए। इसके बाद राजापाड़ा स्थित राजबाड़ी से रथयात्रा निकालने तथा विशाल मेले के आयोजन की परंपरा शुरू हुई। यही परंपरा आज भी पूरे वैभव के साथ जीवित है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
वहीं, वर्ष 1921 में चतुर्थ राजा स्वर्गीय कुमार कालीदास पांडेय ने रथयात्रा की परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके निधन के बाद वर्ष 1931 में रानी ज्योतिर्मयी देवी ने पुरानी लकड़ी के रथ के स्थान पर लगभग 20 फीट ऊंचे पीतल के भव्य रथ का निर्माण कराया। लगभग एक शताब्दी बाद भी यही रथ पाकुड़ की पहचान और श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।