गुमला का 17वीं सदी का नागवंशी कीर्ति स्तंभ खतरे में, जिसे मुगलों के दौर में बनाया गया; सरकारी लापरवाही से होने जा रहा जमींदोज
गुमला में 17वीं सदी का नागवंशी एकाश्मक प्रस्तर स्तंभ तालाब गहरीकरण के कारण खतरे में है। पुरातत्वविदों ने इसके संरक्षण की मांग की है, जबकि अधिकारी अब इ ...और पढ़ें

गुमला का 17वीं सदी का नागवंशी कीर्ति स्तंभ खतरे में, संरक्षण की मांग। (फोटो: जागरण)
HighLights
गुमला में 17वीं सदी का नागवंशी स्तंभ खतरे में।
तालाब गहरीकरण से एकाश्मक प्रस्तर स्तंभ को नुकसान।
पुरातत्वविदों ने तत्काल संरक्षण की आवश्यकता बताई।
संजय कृष्ण, रांची। 17वीं शताब्दी का निर्मित एकाश्मक प्रस्तर खतरे में पड़ गया है। गुमला जिले के सिसई बसिया रोड पर नवरतनगढ़ से पहले नगर बगल टोली मोड़ के दाहिनी ओर एक प्राचीन तालाब है और उसी तालाब में यह कीर्ति स्तंभ है।
इसके शिखर पर कमल के आकार की आकृति बनी है और कैथी लिपि में कुछ लिखा हुआ है। संभवत: झारखंड का यह इकलौता प्रस्तर स्तंभ है जो 20 फीट लंबा एकाश्मक प्रस्तर का है। इसका निर्माण संभवत: नागवंशी राजा रघुनाथ शाह ने 17वीं शताब्दी में कराया होगा।
उन्होंने 1663 में अपने पिता राम शाह का स्थान लिया था। उनकी राजधानी नवरतनगढ़ थी। उन्होंने अपने शासनकाल में कई मंदिरों का भी निर्माण करवाया था। देखरेख व उपेक्षा के कारण इस स्तंभ की स्थिति बहुत खराब है। जहां यह स्तंभ है, वहां प्राचीन तालाब हुआ करता था।
गुमला जिले का भूजल संरक्षण विभाग इस प्राचीन तालाब को और अधिक गहरा कर रहा है और इस क्रम में यह स्तंभ भी खतरे में आ गया है। तालाब के बीचोबीच स्थित प्राचीन स्तम्भ के आसपास तक की मिट्टी हटा दी गई है, जिससे यह स्तंभ कभी भी जमींदोज हो सकता है।
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एक ओर झाराखंड के पर्यटन, कला संस्कृति, खेल एवं युवा मामले के मंत्री सुदिव्य कुमार धरोहरों को संरक्षित करने की घोषणा कर रहे हैं, वहीं, सरकार के कुछ अधिकारी धरोहरों को नष्ट करने में अपनी प्रतिभा को लगा रहे हैं।

सांस्कृतिक वैभव संपन्न झारखंड
पुराविद डाॅ नीरज मिश्र ने बताया कि झारखंड का क्षेत्र ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पुरावैभव से संपन्न है। झारखंड के प्रत्येक क्षेत्र में पुरातात्त्विक साक्ष्यों का भंडार देखा जा सकता है। यह बहुत कम विदित है कि नागवंश के राजाओं ने भी एक स्तंभ लेख को निर्मित किया था। इसलिए, इस स्तंभ का ऐतिहासिक स्तंभ है।
इस क्रम में नागवंश के शासकों द्वारा वर्तमान गुमला के सिसई प्रखंड में निर्मित प्राचीन डोइसानगर अर्थात नवरतनगढ़ के क्षेत्र में बहुसंख्यक स्थापत्य संरचनाएं, वास्तु अवशेष, निर्मित मंदिर, राजमहल, सैन्य महत्व की संरचनाएं सहित कई महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य देखे जा सकते हैं।
इस क्रम में यह भी उल्लेखनीय हैं कि प्राचीन परंपराओं में भारतवर्ष के अन्य राजाओं द्वारा जो स्तंभ लेख की स्थापना के प्रमाण बहुतायत मिलते हैं, जैसे अशोक मौर्य के स्तंभ लेख, गुप्त राजाओं के स्तंभ लेख सहित मध्यकाल में निर्मित तोरण एवं कीर्ति स्तंभ की परंपरा निरंतर प्रवाहमान रही है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ व जिम्मेदार
स्तंभ के ऊपरी भाग के पश्चिम भाग में एक खिले कमल का अंकन है, जबकि अन्य तीन और अभिलेख हैं। यह स्तंभ लगभग 20 फीट का है। स्थानीय ग्रेनाइट पत्थर को तराशकर इसे बखूबी निर्मित किया गया है। इसे बचाने का हर हाल में प्रयास किया जाएगा। इसके चारों ओर मिट्टी डालकर और सीमेंट-ईंट से संरक्षित किया जाना चाहिए।
-डाॅ नीरज कुमार मिश्र, सहायक अधीक्षण पुरातत्त्वविद, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, रांची मंडल रांची
अभी मेरे संज्ञान में आया है। तालाब का गहरीकरण किया जा रहा है। हमें पता नहीं था। इसे अब संरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। पहले जानकारी होती तो ऐसा नहीं होता। चूंकि पुराना तालाब था और उसका गहरीकरण किया जा रहा है। तालाब के बीच में ही यह स्तंभ भी है। अब जानकारी मिल गई है। इसे बचाया जाएगा।
-आशीष प्रताप, जिला भूमि संरक्षण पदाधिकारी, गुमला।
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