जिस चमातू सिंह को रैयत बता जालसाजी की गई, वह अस्तित्व में ही नहीं था; झारखंड में 500 करोड़ का वन भूमि घोटाला
बोकारो के तेतुलिया मौजा में 103 एकड़ जमीन के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है। जांच में सामने आया कि जालसाजों द्वारा रैयत बताया गया चमातू सिंह अस्तित्व म ...और पढ़ें

बोकारो तेतुलिया जमीन घोटाला: 103 एकड़ भूमि के फर्जीवाड़े की बुनियाद ही निकली झूठी।
HighLights
बोकारो के तेतुलिया मौजा में 103 एकड़ जमीन घोटाला।
जालसाजों का रैयत चमातू सिंह अस्तित्व में नहीं मिला।
कोर्ट ने जमीन को सरकारी घोषित कर फर्जीवाड़ा रद्द किया।
राज्य ब्यूरो, रांची। बोकारो के तेतुलिया मौजा की 103 एकड़ जमीन की फर्जी तरीके से खरीद-बिक्री मामले में एक नई व चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। वन विभाग की याचिका पर जांच के बाद बोकारो कोर्ट में भी यह साबित हो चुका है कि जालसाजों ने तेतुलिया मौजा की जमीन को हड़पने के लिए जो कहानी तैयार की थी, उसकी बुनियाद ही फर्जी थी।
जिस चमातू सिंह को रैयत बता उसे जमीन सरेंडर व निलामी में शामिल कराया, जांच में उस चमातू सिंह का कोई अस्तित्व ही नहीं मिला था। जमीन की खरीद-बिक्री करने के आरोपित इजहार हुसैन व अख्तर हुसैन ने दावा किया था कि उनके दादा समिरुद्दीन अंसारी ने वर्ष 1933 में रैयत चमातू सिंह से सरेंडर व निलामी में उक्त जमीन हासिल की थी।
जब चमातू सिंह की कहानी ही फर्जी निकली तो निलामी व उसके आगे की कहानी का फर्जीवाड़ा अपने आप उजागर हो रहा है। बोकारो कोर्ट के आदेश में भी इसका जिक्र है। झारखंड उच्च न्यायालय ने भी अपील पर सुनवाई के दौरान इस आदेश को बरकरार रखा है।
बोकारो के सिविल कोर्ट ने टाइटल सूट संख्या 3/1987 में 29 जून 2012 को राज्य सरकार के पक्ष में निर्णायक फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि को सरकारी घोषित किया था और फर्जी जमाबंदी को रद करने के फैसले को बरकरार रखा था।
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झारखंड हाई कोर्ट ने भी अपील से संबंधित याचिका 64/2015 में 25 मार्च 2025 के फैसले में भी इसे पुष्ट किया है। यह बात सामने आ चुकी है कि इजहार अंसारी, शैलेश कुमार सिंह आदि ने मनगढ़ंत कहानी रची थी।
चमातु सिंह के पक्ष में कोई रैयती बंदोबस्त नहीं
जांच में यह खुलासा हुआ है कि तेतुलिया मौजा की जमीन की रैयती बंदोबस्ती चमातु सिंह के पक्ष में नहीं हुई थी। 1893 में अंतिम सर्वेक्षण दस्तावेज में बंदोबस्त दर्ज किया गया था, जिसे अंतत: वर्ष 1922 में प्रकाशित किया गया था।
वर्ष 1922 में आयोजित सर्वे में चमातु सिंह को रैयती अधिकार के रूप में नहीं दिखाया गया है। चूंकि चमातू सिंह के पास कोई रैयती अधिकार नहीं था, इसलिए 1933 में निलामी व सरेंडर की कहानी मनगढ़ंत है। पूरे मामले की जांच ईडी, सीआईडी और वन विभाग तीनों कर रही है।