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    पेंशन पर झारखंड हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, संविदा सेवा को नजरअंदाज नहीं कर सकती सरकार

    Updated: Wed, 01 Jul 2026 07:53 PM (IST)

    झारखंड हाई कोर्ट ने पारा शिक्षकों को बड़ी राहत दी है, जिसमें नियमित शिक्षक बनने के बाद उनकी संविदा सेवा को भी पेंशन गणना में शामिल करने का निर्देश दिय ...और पढ़ें

    झारखंड हाई कोर्ट का फैसला: पारा शिक्षकों की संविदा सेवा भी पेंशन में गिनी जाएगी।

    झारखंड हाई कोर्ट का फैसला: पारा शिक्षकों की संविदा सेवा भी पेंशन में गिनी जाएगी।

    HighLights

    1. पारा शिक्षकों की संविदा सेवा पेंशन में जुड़ेगी।

    2. नियमित नियुक्ति में अनुभव माना, पेंशन में भी मानें।

    3. पेंशन कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है, दया नहीं।

    राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य के उन पारा शिक्षकों को बड़ी राहत दी है, जो बाद में नियमित इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक बने और सेवानिवृत्त हुए। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमित नियुक्ति से पहले पारा शिक्षक के रूप में दी गई संविदा सेवा को भी पेंशन की गणना में जोड़ा जाएगा।

    कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने नियमित नियुक्ति के लिए पारा शिक्षक के अनुभव को पात्रता का आधार बनाया था, तब उसी सेवा को पेंशन के समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने धनबाद, गिरिडीह, रामगढ़ और पाकुड़ के पांच सेवानिवृत्त शिक्षकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

    प्रार्थियों का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता मनोज टंडन और सिद्धार्थ रंजन ने अदालत को बताया कि प्रार्थी पहले आठ से 12 वर्षों तक पारा शिक्षक रहे और बाद में चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियमित इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त हुए।

    नियमित सेवा के दौरान वे 10 वर्ष की अनिवार्य अवधि से कुछ दिन या कुछ महीने कम रहने के कारण पेंशन से वंचित हो गए थे। अदालत ने कहा कि नियमित शिक्षकों की 50 प्रतिशत सीटें ऐसे पारा शिक्षकों के लिए आरक्षित थीं, जिन्होंने कम से कम दो वर्ष की लगातार सेवा दी थी।

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    जब सरकार ने नियुक्ति के समय उसी अनुभव को मान्यता दी, तो पेंशन के मामले में उस सेवा को नहीं गिनना उचित नहीं है। कोर्ट ने इसे राज्य का विरोधाभासी रुख बताया। कोर्ट ने यह भी कहा कि पेंशन कोई दया या अनुग्रह नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है।

    यदि किसी कर्मचारी ने पहले संविदा पर और फिर उसी विभाग में नियमित रूप से सेवा दी है, तो उसकी पूरी सेवा को पेंशन के लिए माना जाना चाहिए। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया। राज्य सरकार की इस दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं ने 10 वर्ष की नियमित सेवा पूरी नहीं की है।

    कोर्ट ने कहा कि इन शिक्षकों ने बिना किसी सेवा व्यवधान के पहले पारा शिक्षक और फिर नियमित शिक्षक के रूप में एक ही विभाग में कार्य किया है, इसलिए उनकी संविदा सेवा को पेंशन के लिए जोड़ा जाना चाहिए।

    हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी प्रार्थियों की पारा शिक्षक के रूप में दी गई सेवा अवधि को पेंशन की निर्धारित सेवा में शामिल कर उनके पेंशन एवं अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का पुनर्गणना कर निर्धारित अवधि में भुगतान किया जाए।

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