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    झारखंड का सच: शहरों में अस्पताल, गांवों में रेफरल…और रास्ते में मौत; रांची में ही क्यों सिमटी सुविधाएं?

    Updated: Tue, 07 Apr 2026 09:50 AM (IST)

    World Health Day: झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में जिलों के बीच गंभीर असमानता है। रांची जैसे बड़े शहरों में अधिकांश अस्पताल और बेड केंद्र ...और पढ़ें

    झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं का असमान वितरण बड़े शहरों में केंद्रित ग्रामीण क्षेत्रों में कमी।

    झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं का असमान वितरण बड़े शहरों में केंद्रित ग्रामीण क्षेत्रों में कमी।

    HighLights

    1. रांची सहित बड़े शहरों में 90% स्वास्थ्य संस्थान केंद्रित हैं।

    2. कई जिलों में आईसीयू बेड और चिकित्सकों की भारी कमी।

    3. झारखंड के स्वास्थ्य सूचकांक राष्ट्रीय औसत से बेहतर हुए हैं।

    नीरज अम्बष्ठ, रांची। झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में जिलों के बीच काफी असमानता है। जानकार इसे चिंताजनक बताते हैं, क्योंकि कुछ खास जिलों या शहरों में स्वास्थ्य सुविधाओं के सिमटने से अन्य जिलों व शहरों के मरीजों को समय पर इलाज नहीं हो पाता। विश्व स्वास्थ्य दिवस के मौके पर पड़ताल।

    रेफरल मामलों में समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने से कई बार मरीज की मौत रास्ते में हो जाती है। जिलों के बीच असमानता का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि टाप चार ज़िलों में सभी सुविधाओं का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि नीचे के चार ज़िलों में नौ प्रतिशत से कम का हिस्सा है।

    राज्य में कुल 4,996 अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध हैं। इन स्वास्थ्य संस्थानों का जिलों के हिसाब से बंटवारा करें तो रांची 450 संस्थानों के साथ सबसे आगे है।

    उसके बाद पश्चिमी सिंहभूम (405), पूर्वी सिंहभूम (328) और दुमका (302) का स्थान है। दूसरी तरफ, रामगढ़ (98), कोडरमा (102) और लोहरदगा (114) में सबसे कम स्वास्थ्य संस्थान उपलब्ध हैं।

    हृदय रोग विशेषज्ञ डाॅ. पंकज रंजन बताते हैं कि इस असमानता कुछ हद तक ज्योग्राफ़िकल एरिया और आबादी के आकार से समझा जा सकता है, लेकिन यह नए स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना तथा पुराने स्वास्थ्य केंद्रों को बड़े अस्पतालों में अपग्रेड करने की संभावनाओं की ओर भी इशारा करता है।

    राज्य में उपलब्ध बेड की बात करें तो राज्य में 16,719 सरकारी हाॅस्पिटल बेड उपलब्ध हैं। इनमें अकेले रांची में 3,688 बेड उपलब्ध हैं, जो राज्य के कुल बेड का 22 प्रतिशत है। इसके बाद पूर्वी सिंहभूम (1,165), धनबाद (1,117), और पश्चिमी सिंहभूम (1,059) का स्थान है।

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    कम बेड क्षमता वाले जिलों में लोहरदगा (199), रामगढ़ (233) और कोडरमा (296) सम्मिलित हैं। जानकारों के अनुसार, कुछ शहरी क्षेत्रों में बेड कैपेसिटी का केंद्रित होने का मतलब है कि आसपास के जिलों के मरीज़ों को अक्सर इनपेशेंट केयर के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

    कम बेड की उपलब्धता वाले जिलों में जिला (सदर) और अनुमंडल में बेड कैपेसिटी बढ़ाने से रिम्स जैसे संस्थानों पर निर्भरता कम करने और आबादी के करीब सेकेंडरी केयर तक पहुंच बेहतर करने में मदद मिलेगी।

    आईसीयू की उपलब्धता में भी असमानता

    यह भौगोलिक असमानता जिलों के अस्पतालों में उपलब्ध आईसीयू में भी है। निर्धारित मानकों के अनुसार किसी भी अस्पताल में प्रति सौ बेड पर 15 आईसीयू बेड अनिवार्य रूप से होना चाहिए।

    पूरे राज्य की बात करें तो जहां प्रति सौ बेड पर 15 आईसीयू बेड होना चाहिए, वहीं औसत तीन आइसीयू बेड ही उपलब्ध हैं। राज्य के 18 जिले ऐसे हैं जहां आसीयू बेड या तो नहीं हैं या काफी कम हैं।

    चिकित्सकों व नर्सों की कमी

    राज्य में चिकित्सकों, नर्सों एवं अन्य पारा मेडिकल कर्मियों की कमी है। हालांकि स्वीकृत पदाें में रिक्त पदों की संख्या 20 से 40 प्रतिशत ही है। जैसे, राज्य में चिकित्सा पदाधिकारियों के 2,280 पद के विरुद्ध 1,613 पद भरे हुए हैं। इस तरह, 70.7 प्रतिशत पद भरे हुए हैं।

    ए ग्रेड नर्स की बात करें तो 1,325 पद के विरुद्ध 810 पद भरे हुए हैं। इसके लगभग 39 प्रतिशत पद रिक्त हैं। राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों के अधिसंख्य पद रिक्त हैं। राज्य सरकार ने इन पदों को भरने के लिए टेंडर के माध्यम से तीन लाख रुपये मासिक मानदेय पर चिकित्सकों की नियुक्ति का निर्णय लिया है, जो काफी हद तक सफल रहा है।

    स्वास्थ्य सूचकांकों में राष्ट्रीय औसत से बेहतर झारखंड का औसत

    इन सभी के बीच अच्छी बात यह है कि विभिन्न स्वास्थ्य सूचकांकों में झारखंड की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। हाल के वर्षों में मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आने से यह संभव हुआ है।

    झारखंड में मातृ मृत्यु दर वर्ष 2016 में 165 (एक लाख जीवित जन्म पर) था जो वर्ष 2021-23 में घटकर 54 हो गई, जबकि सस्टनेवल डवलपमेंट गोल (एसडीजी) का लक्ष्य 70 है।

    इसी तरह, शिशु मृत्यु दर घटकर एक हजार जीवित जन्म पर 25 हो गई है, जबकि एसडीजी का लक्ष्य 28 है। झारखंड में नवजात मृत्यु दर 17 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 19 है।

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