ममता बनर्जी के साथ क्षेत्रीय दल एकजुट, अखिलेश-तेजस्वी और हेमंत का साथ; बंगाल चुनाव में भाजपा-कांग्रेस अकेले
बंगाल चुनाव राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा रहा है, जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में क्षेत्रीय दल एकजुट हो रहे हैं। हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव और अखिलेश ...और पढ़ें
HighLights
ममता बनर्जी के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती नजदीकियां।
हेमंत सोरेन, तेजस्वी, अखिलेश यादव भाजपा के खिलाफ एकजुट।
कांग्रेस पार्टी की कमजोर स्थिति से क्षेत्रीय दलों को नई राह।
राज्य ब्यूरो, रांची। बंगाल विधानसभा चुनाव ने राष्ट्रीय राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती नजदीकियां विपक्ष की नई धुरी बनने के संकेत दे रही हैं।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राजद के कार्यकारी अध्यक्ष और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और समाजवादी पार्टी प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की राजनीतिक सक्रियता इस दिशा में अहम मानी जा रही है।
तेजस्वी और अखिलेश के बाद जल्द ही हेमंत सोरेन भी ममता बनर्जी के पक्ष में अभियान आरंभ करने के लिए बंगाल का रुख कर सकते हैं।
इन तीनों नेताओं की राजनीति अपने-अपने राज्यों में मजबूत सामाजिक आधार पर टिकी है।
हेमंत सोरेन जहां आदिवासी और क्षेत्रीय मुद्दों को केंद्र में रखते हैं, वहीं तेजस्वी यादव सामाजिक न्याय की राजनीतिक धारा को आगे बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में पिछड़ा-दलित-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश में हैं। अब ये तीनों नेता भाजपा के खिलाफ एक साझा रणनीति के तहत ममता बनर्जी के साथ तालमेल बढ़ाते नजर आ रहे हैं।
खबरें और भी
ममता बनर्जी बन सकती हैं केंद्रीय चेहरा
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की बात लंबे समय से उठती रही है, लेकिन ठोस नेतृत्व का अभाव हमेशा बाधा रहा। ऐसे में ममता बनर्जी का आक्रामक राजनीतिक रुख और भाजपा के खिलाफ उनकी स्पष्ट रणनीति उन्हें इस संभावित गठबंधन का स्वाभाविक चेहरा बना रही है।
बंगाल में उनकी पकड़ और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता इस उभरते समीकरण को मजबूती दे सकती है। इस पूरी कवायद के बीच कांग्रेस की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर दिख रही है। कई राज्यों में संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व को लेकर अस्पष्टता ने उसे विपक्षी एकजुटता की धुरी बनने से रोका है।
क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्तर पर गठजोड़ की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इससे भविष्य में विपक्षी राजनीति का स्वरूप बदल सकता है।
बंगाल चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति का शुरुआती मंच बन सकता है। यदि यह क्षेत्रीय एकजुटता ठोस रूप लेती है तो भाजपा के सामने एक मजबूत और बहुस्तरीय चुनौती खड़ी हो सकती है।