झारखंड में धान खरीद मियाद बढ़ी: अब 30 अप्रैल तक होगी खरीददारी, लक्ष्य अधूरा रहने पर सरकार का फैसला
झारखंड सरकार ने धान खरीद की अंतिम तिथि 30 अप्रैल तक बढ़ा दी है, क्योंकि मार्च तक लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया था। धीमी खरीद, गोदामों की कमी और भुगतान में ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संवाद सूत्र, राजनगर। राज्य में सरकार किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अंतिम मार्च तक धान खरीद की लक्ष्य हासिल नहीं कर पायी। ऐसे में सरकार ने धान अधिप्राप्ति की मियाद बढ़ाकर अब 30 अप्रैल तक कर दी है। निर्धारित अवधि समाप्त होने के बावजूद बड़ी संख्या में पंजीकृत किसान अब तक अपना धान नहीं बेच पाए हैं। ऐसे में किसानों के लिए यह राहत भरी खबर है।
ज्ञात हो कि राज्य सरकार ने 15 दिसंबर 2025 से धान खरीद शुरू करते हुए 750 से अधिक अधिप्राप्ति केंद्र खोले थे और 60 लाख क्विंटल धान खरीद का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए मार्च 2026 तक की समय-सीमा तय की गई थी। लेकिन खरीद की धीमी रफ्तार, गोदामों में जगह की कमी और भुगतान में देरी के कारण लक्ष्य अधूरा ही रह गया।
शुरुआत में ही भर गए केंद्र, महीनों तक नहीं हुआ उठाव
जानकारी के अनुसार अधिप्राप्ति केंद्रों पर शुरुआती दिनों में ही गोदाम भर गए। इसके बाद लंबे समय तक धान का उठाव नहीं हो सका। नतीजतन, पंजीकृत किसान अपने मोबाइल पर मैसेज का इंतजार करते रह गए और कई किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर धान बेचना पड़ा।
सरायकेला-खरसावां जिले में भी हालात चिंताजनक
जिले में भी धान खरीद की स्थिति संतोषजनक नहीं है। जिले में कुल 27 केंद्र खोले गए, जिसमें पंजीकृत 9177 किसानों से 2.5 लाख क्विंटल धान खरीदने का लक्ष्य है। परन्तु अभी भी लक्ष्य से काफ़ी दूर है। वहीं राजनगर प्रखंड की बात करें तो यहां कुल 4 अधिप्राप्ति केंद्र खेले गए हैं।
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गोविंदपुर (लक्ष्य 14 हजार क्विंटल ), जोनबनी ( लक्ष्य 7 हजार क्विंटल) , जुमाल( लक्ष्य 5 हजार क्विंटल ) और जामबानी लैम्पस (लक्ष्य 10 हजार क्विंटल ) में अधिप्राप्ति केंद्र बनाए गए, लेकिन सभी केंद्र शुरुआती सप्ताह में ही भर गए। राइस मिलों को समय पर सीएमआर उपलब्ध नहीं कराए जाने से उठाव प्रभावित रहा।
लैम्पसों में बिचौलियों का बोलबाला, असली किसान वंचित
धान खरीद व्यवस्था में भी बिचौलिए हावी हैं। सूत्रों के अनुसार बिचौलिए गांव-गांव घूमकर व हाट बाजारों में किसानों से कम दाम में धान खरीदते हैं और ऐसे लोगों के नाम पर आईडी बनवाते हैं, जो खुद खेती नहीं करते या पहले से सेटिंग में होते हैं।
इसके बाद लैम्पस कर्मचारियों और संबंधित लोगों से मिलीभगत कर उन्हीं आईडी पर धान बेच दिया जाता है। जब भुगतान किसानों के खाते में आता है, तो बिचौलिए पैसे निकलवाकर प्रति क्विंटल 100 से 200 रुपये देकर बाकी रकम खुद रख लेते हैं।
इस तरह बिचौलिए कम कीमत पर धान खरीदकर सरकार को एमएसपी पर बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि असली किसान अपने हक से वंचित रह जा रहे हैं। किसानों ने प्रशासन से धान खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने, बिचौलियों पर कार्रवाई करने और सभी पंजीकृत किसानों को प्राथमिकता देने की मांग की है।
मेरा अभी तक मैसेज नहीं आया। धान बेचने के लिए मैसेज का इंतजार कर रहे हैं। यहां व्यापारियों के साथ सेटिंग करके लैम्पस वाले चुपके चुपके सीधे मिल में धान बेचवा दे रहे हैं, हमलोगों को पता नहीं चल पा रहा है। पूछने पर लैम्पस में धान भरा हुआ है बोला जाता है। टाल मटोल जवाब दिया जाता है।
विशेश्वर महतो, चंगुआ
जनवरी से मुझे धान खरीदने का भरोसा दिया जा रहा है। लेकिन अब तक मैसेज नहीं आया। बोरे में धान रखा है और इंतजार कर रहे हैं। लैम्पस में अक्सर व्यापारी दिखते हैं, जिससे लगता है कि व्यापारी के सेटिंग वाले किसानों को ही प्राथमिकता मिल रही है।
नकुल महतो, किसान राजनगर
धान बेचने के लिए शुरू से इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अब तक मैसेज नहीं मिला। लैम्पस में व्यापारियों का दबदबा रहता है। वैसे किसानों सेटिंग रखते हैं, जो धान की खेती नहीं करते हैं और नामांकन करा रखे हैं। व्यापारी उनके माध्यम से धान बेचवाते हैं, ताकि व्यापारी कानूनी प्रिक्रिया में पकड़ से बच सकें।
सिबिल देवगम, किसान कालाझरना