कभी बिना पेटीकोट के पहनी जाती थी साड़ी! जानें कब और कैसे बना यह इस आउटफिट का जरूरी हिस्सा?
बात जब भी भारतीय परिधानों की होती है, तो साड़ी का नाम सबसे पहले आता है। यह एक ऐसा आउटफिट है, जिसे आज भी क्लासिक माना जाता है। साड़ी के साथ पेटीकोट जरू ...और पढ़ें

साड़ी के साथ पेटीकोट पहनने की शुरुआत कैसे हुई (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। साड़ी एक ऐसा आउटफिट है, जिसे आज भी क्लासिक लुक के लिए कई महिलाएं पहनना पसंद करती हैं। फॉर्मल आउटफिट हो या ट्रेडिशनल ओकेजन, साड़ी हमेशा से ही पहली पसंद रही है। यह भारतीय सभ्यता का दर्शाता एक ऐसा परिधान है, जो नारी की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है।
आज साड़ी को कई तरीकों से पहना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा भी आखिर आज हम साड़ी को जिस तरह से कैरी करते हैं, आखिर उसकी शुरुआत कैसे हुई? आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिस साड़ी के साथ आज आप ब्लाउज और पेटीकोट पहनते हैं, वो कभी साड़ी का हिस्सा था ही नहीं। आइए आज इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि कैसे हुई साड़ी के साथ पेटीकोट पहनने की शुरुआत-
भारत में साड़ी का इतिहास
भारत में कई समय से महिलाएं साड़ी पहनती आई हैं। पहले के दौर में साड़ी पहनने का तरीका आज के तरीके से काफी अलग था। उस दौर में महिलाएं बिना सिलाई वाले एक कपड़े को साड़ी की तरह खुद पर लपेटा करती थीं। उस समय वह बिना किसी रोक-टोक या झिझक के साड़ी को एक अनस्टिच कपड़े की तरह पहना करती थीं और उस समय में साड़ी पहनने का यह तरीका काफी आम हुआ करता है।
फिर हुई भारत में अंग्रेजों की एंट्री
भारत की महिलाएं सालों से यहां साड़ी को अपने पारंपरिक अंदाज में बिना किसी ब्लाउज या पेटीकोट पर शरीर पर लपेटकर पहना करती थीं। लेकिन फिर आया 1800 का दशक और भारत में ब्रिटिशर्स की एंट्री हुई। अंग्रेजों के साथ ही भारत में उनकी सोच की भी एंट्री हुई, जिसके तहत साड़ियों को शरीर पर इस तरह लपेटना 'अजीब' या 'शर्मनाक' माना जाने लगा।
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उनका ऐसा मानना था कि साड़ी शरीर के काफी सारे हिस्से को दिखाती है और इसलिए शिक्षण संस्थानों, रेलवे और दफ्तरों में "शालीन" ड्रेस कोड तय किए जाने लगे। आज हम जिस तरह से साड़ी पहनते हैं, उसका थोड़ा बहुत क्षेय इस ड्रेस कोड को जाता है और सबसे ज्यादा क्रेडिट ज्ञानदानंदिनी देवी को जाता है।
कौन थीं ज्ञानदानंदिनी देवी?
आप में से शायद बहुत कम लोगों ने ही ज्ञानदानंदिनी देवी का नाम सुना होगा। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि वह कोई आम महिला नहीं थीं। दरअसल, वह महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर की पत्नी थीं और साड़ी के साथ ब्लाउज और पेटीकोट पहनने की शुरुआत करने वाली पहली महिला भी थी।
एक घटना ने बनाई साड़ी और पेटीकोट की जोड़ी
बात उस दौर की है, जब ज्ञानदानंदिनी देवी अपने पति के साथ मुंबई रहने लगी थी। वहीं एक बार जब वह ब्रिटिश राज के एक एलीट क्लब में जा रही थीं, तो उन्हें क्लब में एंट्री करने से रोक दिया गया। इसका कारण उनकी पारंपरिक तरीके से पहनी गई साड़ी थी, जो अंग्रेजों के लिए उस समय असभ्य थी। दरअसल, उस दौर में साड़ी के साथ शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने के लिए कोई ब्लाउज या शर्ट नहीं था।
इस एक घटना से ज्ञानदानंदिनी देवी पर इतना गहरा असर छोड़ा कि उन्होंने न सिर्फ साड़ी पहनने के पारंपरिक तरीके को बदल डाला, बल्कि आज पूरी दुनिया को साड़ी पहनने का नया तरीका भी सिखाया।
ऐसे हुआ पेटीकोट और ब्लाउज का जन्म
अपने मजबूत इरादे के साथ आगे बढ़ते हुए ज्ञानदानंदिनी ने बॉम्बे की पारसी महिलाओं से प्रेरणा ली और इस तरह भारत में साड़ी के साथ पेटीकोट पहनने की शुरुआत हुई। उन्होंने साड़ी पहनने के लिए उसे पारसी तरीके लपेटना शुरू किया, जिसके नीचे 'पेटीकोट' भी पहना जाता था। साथ ही शरीर के ऊपरी हिस्से को ढंकने के लिए कॉलर वाला एक 'ब्लाउज' तैयार करवाया।
इसके साथ ही उन्होंने साड़ी की प्लीट्स बनाईं और पल्लू को बाएं कंधे पर डालना शुरू किया। बस फिर इस तरह साड़ी के साथ पेटीकोट और ब्लाउज पहनने की शुरुआत हुई। साथ ही उल्टे पल्ले वाली साड़ी का ईजाद भी इसी तरह हुआ। अपने मजबूत इरादों के दम पर ज्ञानदानंदिनी देवी ने पूरे भारत की महिलाओं के लिए साड़ी का नया 'सिग्नेचर स्टाइल' बनाया, जिसे आज भी कई महिलाएं फॉलो करती हैं।