साड़ी के साथ नहीं था कभी ब्लाउज पहनने का चलन, जानें फिर कैसे बना यह हमारी संस्कृति का हिस्सा
सदियों पहले भारत में साड़ी के साथ ब्लाउज पहनने का चलन नहीं था। ज्ञानदानंदिनी देवी ने मुंबई में एक घटना के बाद पारसी महिलाओं और अंग्रेजी शर्ट से प्रेरि ...और पढ़ें
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साड़ी के साथ ब्लाउज का इतिहास (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
प्राचीन भारत में साड़ी के साथ ब्लाउज पहनने का चलन नहीं था
ज्ञानदानंदिनी देवी ने साड़ी के साथ ब्लाउज की शुरुआत की
पारसी महिलाओं और अंग्रेजी शर्ट से प्रेरित होकर नया स्टाइल बनाया
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। साड़ी एक ऐसा आउटफिट है, जो हमारी संस्कृति से जुड़ा होने के साथ-साथ एक महिला की खूबसूरती में भी चार चांद लगा देता है। फैशन की दुनिया में इन दिनों साड़ी के साथ कई डिजाइन के ब्लाउज ट्रेंड में हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर 'स्वीटहार्ट', 'हॉल्टर', 'बोट नेक' या 'बैकलेस' जैसी ये डिजाइन्स आखिर शुरू कहां से हुईं?
आज हम साड़ी के साथ जो ब्लाउज पहनते हैं या जिस तरह की साड़ी पहनते हैं, असल में वह कभी हमारे कल्चर का हिस्सा थी ही नहीं। जी हां, आपको जानकर हैरानी होगी कि सदियों पहले भारत में साड़ी के साथ ब्लाउज पहनने का कोई चलन ही नहीं था। प्राचीन भारत में, महिलाएं का साड़ी के साथ ऊपरी शरीर को खुला रखना बेहद आम बात थी। तो सवाल यह उठता है कि आखिर ये ब्लाउज आया कहां से? आइए जानते हैं इसी के बारे में-
कौन थीं ज्ञानदानंदिनी देवी?
आज हम साड़ी के साथ जो ब्लाउज पहनते हैं और जिस तरह से साड़ी पहनते हैं, उसे तैयार करने का पूरी क्रेडिट ज्ञानदानंदिनी देवी को जाता है। वह कोई आम महिला नहीं थीं। वे महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर की पत्नी थीं। 19वीं सदी के बंगाल में महिलाओं पर कई सख्त नियम लागू थे।
महिलाओं को 'परदा प्रथा' के तहत घर की चारदीवारी (जनाना) में ही रहना पड़ता था। हालांकि, उनके पति सत्येंद्रनाथ बहुत खुले विचारों वाले थे और महिला अधिकारों के समर्थक थे, लेकिन परिवार के कड़े नियमों के कारण ज्ञानदानंदिनी के लिए खुली हवा में सांस लेना बहुत मुश्किल था।
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कैसे हुई बदलाव की शुरुआत?
ऐसे में बदलाव की शुरुआत तब हुई जब ज्ञानदानंदिनी अपने पति के साथ अलग घर में रहने लगीं। बाद में जब सत्येंद्रनाथ को बॉम्बे अब के मुंबई में असिस्टेंट कलेक्टर बनाया गया, तो ज्ञानदानंदिनी ने एक नई दुनिया में कदम रखा। यहां उन्हें ऊंचे तबके के लोगों और अंग्रेजी समाज के साथ उठने-बैठने का मौका मिला।
एक घटना बदल दिया साड़ी का इतिहास
मुंबई में रहने के दौरान एक बार जब ज्ञानदानंदिनी देवी ब्रिटिश राज के एक एलीट क्लब में जा रही थीं, तो उन्हें क्लब के दरवाजे पर ही रोक दिया गया। इसका कारण उनके कपड़े थे। उन्होंने जिस पारंपरिक बंगाली तरीके से साड़ी पहनी थी, उसमें शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने के लिए कोई ब्लाउज या शर्ट नहीं था। इसलिए अंग्रेजों को यह पहनावा 'असभ्य' लगा।
इस घटना ने ज्ञानदानंदिनी देवी को अंदर तक झकझोर दिया और फिर उन्होंने ठान लिया कि वह अपनी साड़ी पहनने के तरीके को बदलेंगी, ताकि वह आधुनिक दुनिया में सम्मान के साथ चल सकें, बिना अपनी भारतीय पहचान खोए।
पारसी गारा और मॉडर्न ब्लाउज़ का जन्म
अपनी इस जिद को पूरा करने के लिए उन्होंने ज्ञानदानंदिनी ने बॉम्बे की पारसी महिलाओं से प्रेरणा ली। उन्होंने पारसी तरीके से साड़ी लपेटना शुरू किया, जिसके नीचे एक 'पेटीकोट' पहना जाता था। ऊपरी हिस्से को शालीनता से ढकने के लिए उन्होंने अंग्रेजी शर्ट से प्रेरित होकर कॉलर वाला एक 'ब्लाउज' तैयार करवाया। उन्होंने साड़ी में सामने की तरफ प्लीट्स (चुनटें) बनाईं और पल्लू को बाएं कंधे पर डालना शुरू किया और इस तरह हुई उल्टे पल्ले की साड़ी पहनने की शुरुआत।
और ऐसे हुआ मॉर्डन साड़ी का जन्म
जब वह कोलकाता लौटीं, तो उन्होंने इस नए 'नीवी ड्रेप' स्टाइल को अन्य महिलाओं को सिखाने के लिए क्लासेस लगाईं, जहां सैकड़ों महिलाएं साड़ी का यह नया मॉडर्न रूप सीखने आईं। शुरू में तो लोगों ने 'अश्लील' और 'परंपराओं के खिलाफ' बताया, लेकिन ज्ञानदानंदिनी पीछे नहीं हटीं।
कभी सिर्फ बंगाल की महिलाओं को साड़ी का नया स्टाइल सिखाने वाली ज्ञानदानंदिनी देवी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि यह वह तरीका पूरे भारत की महिलाओं का 'सिग्नेचर स्टाइल' बन जाएगा।