कभी नूरजहां के रॉयल फैशन की शान थी लखनवी चिकनकारी, पर इस कढ़ाई का 'चिकन' से क्या कनेक्शन? पढ़ें दिलचस्प इतिहास
आज लखनऊ की जो चिकनकारी फेमस है, उसका इतिहास मुगलों के जमाने से जुड़ा हुआ है।

लखनऊ की चिकनकारी का मुगल काल से कनेक्शन (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लखनऊ की चिकनकारी के बारे में कौन नहीं जानता, आज भारत समेत दुनियाभर में यह शाही अंदाज कपड़ों की शान बना हुआ है। कपड़े पर बारीक धागे सी की गई कारीगरी को ही चिकनकारी तो कहा जाता है पर सवाल है कि आखिर क्यों? इसका नाम ‘चिकन’ से ही क्यों पड़ा? इसके लिए हमें लखनऊ की कारीगरी का इतिहास जानना होगा।
लखनऊ की चिकनकारी का मुगल काल से कनेक्शन
मुगलों के परिधान में चिकनकारी एक खास स्थान रखती थी, इसकी शुरुआत की कहानी मुगल बादशाह जहांगीर की पत्नी नूरजहां से जुड़ी हुई है। किस्सा ऐसा है कि जहांगीर की पत्नी नूरजहां एक फैशन डिजाइनर थीं। उन्हें इंडो-पर्सियन शैली की जटिल कढ़ाई में महारत हासिल थी।
उनकी कारीगरी में कभी राजस्थान की झलक दिखती थी तो कभी कश्मीर की। कहते हैं कि नूरजहां ने फारस के कोह मेहर प्रांत से संबंध रखने वाले कारीगर बुलाए थे। इन सभी कारीगरों को अवध के परिवारों के साथ अपना काम सिखाने की जिम्मेदारी दी गई थी।
नूरजहां की बांदी से जुड़ा है दूसरा किस्सा
दूसरा किस्सा भी नूरजहां बेगम से ही जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि नूरजहां की बिस्मिल्लाह नाम की एक बांदी हुआ करती थी। वह जब दिल्ली से लखनऊ गई तो उसने चिकनकारी कला का हुनर दिखाया। नूरजहां को यह कढ़ाई इतनी पसंद आई कि उन्होंने भी सीख ली। इस तरह चिकनकारी लखनऊ की पहचान बन गई।
फूलों की कढ़ाई का मैगस्थनीज ने किया था जिक्र
चिकनकारी में की जाने वाली फूलों की खास कढ़ाई का उल्लेख ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के समय से मिलता है। कहते हैं कि उस समय प्रसिद्ध यूनानी राजदूत और इतिहासकार मेगस्थनीज ने फूलों की कढ़ाई वाले मलमल के कपड़े का जिक्र किया था, पर उसमें मॉडर्न चिकनकारी जैसी डिजाइन वाली खूबियां नहीं थीं।
इसे चिकनकारी ही क्यों कहा गया?
चिकनकारी के नाम पर जाएं तो इसको लेकर कई अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं। एक मत यह है कि चिकन तुर्की के शब्द चिक से बना है, जिसका मतलब होता है छोटे-छोटे छेद करना। वहीं, कुछ इतिहासकार इसे फारसी के मूल शब्द चाकिन से भी जोड़कर देखते हैं। फारसी में चाकिन शब्द से मतलब कपड़े पर काशीदकारी करना, नाजुक कढ़ाई करना और बेलबूटे उभारना है। इसी वजह से इस कढ़ाई को चिकनकारी नाम दिया गया।

