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क्यों 'जन गण मन' को मिला राष्ट्रगान का दर्जा और 'वंदे मातरम' बना राष्ट्रगीत? पढ़िए इन दो महान प्रतीकों के सफर की पूरी कहानी

Updated: Sat, 15 Aug 2026 08:45 AM (IST)

'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' का ऐतिहासिक सफर बेहद रोचक है, चलिए आपको इनका बुनियादी अंतर बताते हैं।

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में क्या है असली अंतर? (Image Source: AI-Generated)

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में क्या है असली अंतर? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत सुनते ही हमारे भीतर देशभक्ति की भावना जाग उठती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों में आखिर बुनियादी फर्क क्या है

दुनिया के कई देशों में राष्ट्रगीत का कोई अलग कॉन्सेप्ट नहीं होता, इसलिए कुछ लोग अक्सर इन दोनों को एक ही मान लेते हैं। आइए, इस साल मनाए जा रहे 80वें स्वतंत्रता दिवस (Independence Day 2026) के मौके पर बहुत ही आसान शब्दों में समझते हैं कि हमारे जन गण मन और वंदे मातरम के बीच क्या अहम अंतर हैं और इनका ऐतिहासिक सफर कैसा रहा है।

national anthem vs national song india difference

(Image Source: Magnific)

राष्ट्रगान

हमारा राष्ट्रगान भारत के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विविधता का जीता-जागता उदाहरण है।

  • इसे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 11 दिसंबर 1911 को लिखा था। मूल रूप से इसे बंगाली भाषा में 'भारोतो भाग्यो बिधाता' के नाम से रचा गया था। पहली बार इसे 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया और 24 जनवरी 1950 को इसे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया।
  • राष्ट्रगान गाने के नियम काफी स्पष्ट हैं। इसे गाने की समय-सीमा 52 सेकंड तय है। इसकी धुन 'राग अल्हैया बिलावल' पर आधारित है और इसे गाते समय सटीक उच्चारण व तय धुन का कड़ाई से पालन करना होता है।
  • यह गान भारत की 'अनेकता में एकता' का जश्न मनाता है। टैगोर ने इसमें 'काल' को भारत का भाग्य विधाता बताया है और देश के नागरिकों को ही असली शासक माना है। इसके बोलों में पंजाब, सिंध, गुजरात, बंगाल और द्रविड़ जैसे क्षेत्रों के साथ-साथ हमारी नदियों, पहाड़ों, किसानों और वीर सैनिकों को सम्मान दिया गया है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A के मुताबिक, राष्ट्रगान का सम्मान करना हर भारतीय का मौलिक कर्तव्य है। संसद ने कुछ विशेष अवसरों पर इसे गाना अनिवार्य भी बनाया है।

राष्ट्रगीत

राष्ट्रगीत हमारे स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है, जिससे आम लोगों का एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव है।

  • वंदे मातरम को 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चटर्जी ने संस्कृत और बंगाली के मिश्रण में लिखा था। यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा था। इसकी शानदार धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने तैयार की थी।
  • 1905 में कांग्रेस द्वारा इसे राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया गया। बंगाल विभाजन और गांधी जी के असहयोग आंदोलन के दौरान यह गीत विरोध और एकता का सबसे शक्तिशाली स्वर बन गया था। 1950 में इसे भी आधिकारिक मान्यता मिली।
  • राष्ट्रगान के उलट, राष्ट्रगीत को अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक विविधताओं के अनुसार अलग-अलग तरीकों से गाया जा सकता है।
  • इसे राष्ट्रगान के बराबर ही सम्मान प्राप्त है, लेकिन संविधान में इसे गाना अनिवार्य नहीं किया गया है और न ही इसे मौलिक कर्तव्यों की सूची में शामिल किया गया है।
  • इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2003 में बीबीसी के एक पोल में वंदे मातरम को दुनिया के दूसरे सबसे महान गीत का दर्जा मिला था।

आखिर 'वंदे मातरम' राष्ट्रगान क्यों नहीं बन पाया?

यह सवाल अक्सर कई लोगों के मन में आता है। इसका जवाब 1941 के एक ऐतिहासिक फैसले में छिपा है। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस बर्लिन गए, तो 2 नवंबर 1941 को उनकी 'आजाद हिंद' टीम ने एक बैठक की। इसी बैठक में जन गण मन को राष्ट्रगान और जय हिंद को अभिवादन के तौर पर चुना गया।

इस फैसले के पीछे मुख्य कारण यह था कि टीम के सदस्य आबिद हसन ने तर्क दिया कि 'वंदे मातरम' गाना आम लोगों के लिए काफी कठिन है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी इस बात से सहमति जताई कि 'जन गण मन' भारत के अलग-अलग हिस्सों और विविधताओं का ज्यादा सटीक प्रतिनिधित्व करता है। इसके कुछ समय बाद ही रेडियो हैम्बर्ग के चैंबर ऑर्केस्ट्रा की मदद से जर्मन-इंडियन सोसाइटी में इस गान का 55 सेकंड का संस्करण पहली बार बजाया गया था।

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