150 वर्षों बाद भी हर भारतीय की धड़कन है 'वंदे मातरम्', जानें कैसे बना आजादी की सबसे बुलंद आवाज
वंदे मातरम् वह अमर मंत्र है, जिसने देशवासियों में देशभक्ति और बलिदान की भावना का संचार किया। राजनीतिक आपत्तियों और कालक्रम में हुए परिवर्तनों के बावजू ...और पढ़ें

कैसे 'वंदे मातरम्' बना भारत की सांस्कृतिक पहचान और स्वाधीनता का अमर मंत्र? (Image Source: AI-Generated)
HighLights
150 वर्ष पूरे, प्रधानमंत्री ने बताया राष्ट्रीय चेतना का मंत्र
स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान और देशभक्ति का मूल आधार
कई आपत्तियों के बावजूद 'वंदे मातरम्' की लोकप्रियता बढ़ी
हिमांशु कुमार चतुर्वेदी, शिमला। 7 नवंबर 1875 को ऋषि बंकिम द्वारा रचित वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर भारत के प्रधानमंत्री के कथन 'वंदे मातरम् भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मात्र प्रतीक ही नहीं था अपितु राष्ट्रीय चेतना का मंत्र था', को ऐतिहासिक रूप से मूल्यांकित किए जाने की आवश्यकता है। कार्तिक शुक्ल नवमी अर्थात अक्षय नवमी को जगद्धात्री पूजन के दिन हुई इस रचना का मूल संदेश जननी की आराधना है। भारतीय मान्यताओं में जननी अद्वितीय माता है, अथर्ववेद में इस मान्यता के प्रमाण मिलते हैं। वंदे मातरम् में ’माता’ एक विचार है और ऐसी भावना भी जिसे केवल भूमि या क्षेत्र के माध्यम से समझा नहीं जा सकता। वास्तव में वह स्वयं सभ्यता है, जिस शक्ति की कल्पना का आधार ’स्त्री’ के रूप में किया गया है।
देशभक्ति का धर्म
श्री अरबिंदो के भवानी मंदिर में मां को शक्ति का प्रतीक माना गया एवं विवेकानंद ने इसी शक्ति को भारत माता के स्वरूप में पाया। श्री अरबिंदो वंदे मातरम् को एक पवित्र मंत्र के रूप में स्वीकार्यता प्रदान करते हैं, जिसने देश को देशभक्ति के धर्म में पिरोया। यही मूर्ति जब देशवासियों के हृदयरूपी मंदिर में बस जाती है तब देश के लिए बलिदान का मान जाग्रत होता है और परिणामस्वरूप कोई भी देशवासी तब तक आराम अथवा सुषुप्त अवस्था में नहीं रह सकता, जब तक मां को विदेशी बेड़ियों से मुक्ति न मिल जाए। जिस देश के नागरिकों के हृदय में यह मंत्र स्थापित हो जाएगा वह देश दमनकारियों को कभी स्वीकार नहीं करेगा।
आपत्तियां, सीमांकन और ऐतिहासिक मोड़
1896 से कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन का प्रारंभ वंदे मातरम् गीत से ही होता था, जिसे पूरा गाया जाता था। परंतु 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली ने वंदे मातरम् पर आपत्ति उठाई। इन आपत्तियों के बावजूद वंदे मातरम् की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती गई और इसकी स्वीकार्यता पर कोई प्रभाव नहीं देखा जा सका। परंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि जिस वंदे मातरम् को उन सभी राष्ट्रीय ध्वजों के केंद्र में स्थान प्राप्त था, जिन्हें 1923 के पहले देश के महान राष्ट्रभक्तों द्वारा अभिकल्पित किया गया, 1923 के पश्चात ध्वज से उस वंदे मातरम् का विलोपित होना किस प्रकार की राजनीति का संकेत था? वर्ष 1923 की आपत्ति का प्रकटीकरण 1937 में हुआ जब वंदे मातरम् छह छंदों से दो छंदों में सीमित कर दिया गया, कांग्रेस के अधिवेशनों में। 1937 में वंदे मातरम् का बंटवारा और उसके 10 वर्षों पश्चात भारत का बंटवारा संबंधित घटनाएं मानी जाएं अथवा नहीं, इतिहास को उत्तर खोजने होंगे।
आधुनिक भारत की नींव
सभ्यताएं उन साझा प्रतीकों के सहारे टिकती हैं, जो व्यक्तिगत आस्था से परे होते है। वंदे मातरम् ऐसा ही प्रतीक है। आधुनिक राष्ट्र-राज्य से भी पुराना, राजनीतिक नारों से अधिक गहरा और अस्थायी विवादों से कही अधिक स्थायी। स्वतंत्रता पश्चात् से वंदे मातरम् पर उपजे विभिन्न प्रश्न और 2026 में उसे उचित सम्मान की यात्रा पर अभी गहरी छानबीन की आवश्यकता है। जो गीत मातृभूमि की मुक्ति का मूल मंत्र बना, उसे अपनी ही मातृभूमि में इतने संघर्षों की यात्रा क्यों करनी पड़ी? उत्तर तो तलाशने ही होंगे। भारत 1947 में अचानक प्रकट नहीं हुआ। इसका अस्तित्व अधिकांश राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व में आने से पहले से रहा है। भारत की अवधारणा किसी घोषणा या संधि पर नहीं, बल्कि उससे भी पुरानी नैतिक और सांस्कृतिक नींव पर आधारित है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि राष्ट्र के निर्माण के लिए सभी नागरिक पूरे भारत को अपनी सांझी मातृभूमि मानें और उसके प्रति निष्ठा और सेवा का भाव रखे।
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स्वदेश की मुक्ति का आधार
ऋषि बंकिम ने एक समय कहा था कि अगर मेरी सारी रचनाएं गंगा में प्रवाहित कर दी जाएं तो मुझे कोई कष्ट नहीं होगा, पंरतु वंदे मातरम् अनंत काल तक चिरस्थायी रचना के रूप में स्वीकार्य होगा, यह मेरा विश्वास है। इस कथन के लगभग 25 वर्षों पश्चात् भविष्यवाणी सत्य हुई, जब अगस्त 1905 को कोलकाता के ऐतिहासिक टाउन हाल के मैदान पर सैकड़ों भारतीय जनों द्वारा वंदे मातरम् का उद्घोष किया गया। स्व-देश की मुक्ति के संकल्प का यहीं से आधार बन गया वंदे मातरम्। इस बिंदु से, चाहे बलिदानी हों अथवा सत्याग्रही, सभी की ऊर्जा का स्रोत वंदे मातरम् बना। 1906 में वंदे मातरम् पर पहला प्रतिबंध लगा, शायद ही आंग्ल सरकार ने 1857 के पश्चात इतनी तीव्र प्रतिक्रिया किसी रचना पर की हो। 1905 में ही 'वंदे मातरम् संप्रदाय' की स्थापना हो चुकी थी, जिसमें गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने भी भागीदारी की थी। लगभग उसी समय भगिनी निवेदिता द्वारा बनाए गए भारतीय ध्वज पर वंदे मातरम् का प्रकटीकरण हुआ, जो क्रमशः 1906 में भीकाजी कामा द्वारा बनाए गए भारतीय ध्वज के मध्य में भी स्थापित था।
(लेखक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के निदेशक हैं)
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