अब सिर्फ स्वाद नहीं, स्टाइल भी परोस रही है भारतीय रसोई... तेजी से बदल रही है तस्वीर
जायका ही नहीं, अपनी रसोई को भी इस कदर अपग्रेड कर रहे हैं भारतीय कि रश्क करे दुनिया। अब यहां पकाने के तरीके से लेकर परोसने के सलीके तक है रेस्त्रां जैसा प्रीमियम अनुभव...

महंगे उपकरण नहीं, सीखने की बेचैनी बनाती है 'मास्टरशेफ' (Image Source: AI-Generated)
HighLights
रसोई अब घर का दिल, स्वाद और स्टाइल का केंद्र
लोग खाना पकाने की तकनीक और विज्ञान सीख रहे हैं
उत्कृष्ट रसोइया जिज्ञासा और जुनून से बनता है, उपकरणों से नहीं
मिशेलिन शेफ सुबीर सरन, दिल्ली। कुछ बरस पहले 'फूड एंड वाइन' पत्रिका की एक टीम अमेरिका में मेरे अपस्टेट न्यू यार्क वाले फार्म पर आई। वे मेरे खाने और मेरी जिंदगी पर एक फीचर कर रहे थे। जैसे ही वे रसोई में दाखिल हुए, कुछ पल के लिए सब खामोश हो गए। फिर उनमें से एक ने मुस्कुराकर कहा, 'यह तो किसी अच्छे रेस्त्रां की रसोई से भी बड़ी है।' मैंने हंसकर जवाब दिया, 'शायद इसलिए कि यह सिर्फ रसोई नहीं है। यह मेरे घर का सबसे प्यारा कमरा है।'
वहां दो बड़े वाइकिंग ओवन थे; वाक बर्नर, ग्रिल, तवा, ऐसी चिमनी कि 15 घंटे लगातार खाना पकाने के बाद भी घर में जरा-सी महक न ठहरे। बर्फ बनाने वाली मशीन, इतना बड़ा सोप-स्टोन का सिंक कि दोस्त मजाक में कहते थे, 'इसमें बच्चे ही नहीं, फार्म के अल्पाका भी नहा लें।' सूस-वीड के उपकरण, वैक्यूम सीलर मशीनें, आइसक्रीम बनाने की मशीन, जापानी मेजी अंगीठी, पिज्जा का पत्थर और बीचोंबीच इटली की स्मैटिक कंपनी की संगमरमर की विशाल मेज, जिस पर मैं समोसे गढ़ता, पाई बेलता व पास्ता बनाता था। जब उस मेज की तस्वीर पत्रिका में छपी तो पाठक ने उसकी कीमत पूछी। मैंने कंपनी को फोन किया। जवाब मिला- तब कीमत 28 लाख रुपये थी। आज 50 लाख रुपये के आस-पास होगी। पत्रिका ने उसकी कीमत छापी ही नहीं। बस इतना लिखा- 'कीमत जानने के लिए कंपनी से संपर्क करें।'
बदल रहा है भारत
लोग समझते हैं कि यह कहानी दौलत की है। मेरे लिए यह कभी दौलत की कहानी नहीं रही। यह मोहब्बत की कहानी है। रसोई से मोहब्बत। खाना पकाने से मोहब्बत और उन लोगों से मोहब्बत, जिनके लिए खाना बनाया जाता है। मेरी रसोई का सबसे कीमती हिस्सा वे महंगे उपकरण भी नहीं थे। सबसे कीमती था उसका भंडार। दुनिया भर के मसाले, तरह-तरह के आटे, अपने खेत की बेरियों से बने जैम, गर्मी के अचार, भारत से आए मसाले, चटनियां और अनाज। हर चीज की अपनी जगह थी। एक सूची टंगी रहती। जो चीज खत्म होती, उसका नाम उसमें लिख दिया जाता ताकि अगली खरीदारी में भूल न हो। अच्छी रसोई भूख से पहले याददाश्त से चलती है। आज भारत लौटकर मुझे लगता है कि ऐसा ही एक बदलाव यहां भी चुपचाप आकार ले रहा है। दिल्ली में मेरे घर में बिग ग्रीन एग है, वेबर की ग्रिल है, पैकोजेट है, आइसक्रीम बनाने की मशीन है। मेरे कई दोस्तों ने अपने घरों में पिज्जा के लिए अलग भट्ठियां, धुएं में पकाने वाले स्मोकी ग्रिल उपकरण, अनाज पीसने की छोटी चक्कियां और जिलेटो बनाने की मशीनें लगा ली हैं। अलीबाग में एक मित्र के घर के बोगनवेलिया के पेड़ों के नीचे खुली रसोई बनी है। वहां लोग सिर्फ खाने नहीं बैठते, साथ मिलकर पकाते हैं। बातचीत और खाना, दोनों साथ-साथ पकते हैं। यही असली बदलाव है।
तकनीक सीखने की बेचैनी
रसोई फिर से घर का दिल बन रही है। इस बदलाव को मैंने सबसे खूबसूरती से अपने मित्र मोहित जैन के घर देखा। मोहित बाहर का खाना कम ही खाते हैं। एक शाम मैं उनके घर पहुंचा। सोचा था, साधारण-सा भोजन होगा, लेकिन उन्होंने मुझे हैरान कर दिया। उन्होंने फ्रोजन ग्योजा निकाले। थोड़ा-सा मैदा और पानी मिलाकर पतला घोल बनाया। ले क्रूजे के कास्ट आयरन पैन में ग्योजा सलीके से सजाए, घोल डाला, ढक्कन बंद किया और इंतजार करने लगे। कुछ मिनट बाद जब उन्होंने बर्तन उलटकर थाली में रखा, तो मेरे सामने सुनहरी, महीन जाली से जुड़े ग्योजा थे- जैसे क्योटो की किसी छोटी-सी दुकान में मिलते हैं। मुझे ग्योजा ने नहीं, मोहित ने प्रभावित किया। उन्होंने सिखाया कि सबसे बड़ी दौलत महंगे बर्तन नहीं, बल्कि तकनीक सीखने की बेचैनी है। इसी बेचैनी को कोरोनाकाल ने सबसे ज्यादा हवा दी। जब पूरी दुनिया घरों में बंद थी, तब रसोई खुली थी। मैंने वह दौर अपने दो शागिर्दों- शेफ वर्धन मारवाह और शेफ हरिदाश्व मल्होत्रा के साथ गुजारा। हम रोज कुछ नया बनाते, बिगाड़ते, सुधारते और सीखते।
उसी दौरान अमूल के साथ हमारा सिलसिला शुरू हुआ। हर बुधवार रात दस बजे मैं 'टेन आन टेन' करता था- दस मिनट, एक सामग्री और उसके बहाने स्वाद, इतिहास व विज्ञान की पूरी कहानी। रविवार को हम साथ मिलकर खाना बनाते। मुझे लगा था लोग वक्त काटने आएंगे, लेकिन लोग सीखने आए थे। वे पूछते थे कि पिज्जा और रोटी के आटे में फर्क क्या है, खमीर कैसे काम करता है, पास्ता हाथ से बेलना बेहतर है या मशीन से, लोहे और कार्बन स्टील में क्या अंतर है। मुझे पहली बार महसूस हुआ कि भारत अब सिर्फ अच्छा खाना खाना नहीं चाहता, वह यह भी जानना चाहता है कि अच्छा खाना बनता कैसे है!
हमारा तजुर्बा, उनका विज्ञान
दिलचस्प यह है कि दुनिया जिन तकनीकों को आज आधुनिक कह रही है, वे हमारी रसोइयों में सदियों से मौजूद हैं। खमीर उठाना हो, धीमी आंच पर पकाना, धुंगर देना, अचार डालना, धूप में सुखाना या सिल-बट्टे पर पीसना- भारतीय रसोई हमेशा से स्वाद की एक जीवित प्रयोगशाला रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी दादियां इसे तजुर्बा कहती थीं, आज की दुनिया इसे विज्ञान कहती है।
रसोई का सबसे बड़ा राज
इस जिज्ञासा को मास्टरशेफ इंडिया, मास्टरशेफ आस्ट्रेलिया, यूट्यूब और अनगिनत रसोइयों ने जन्म दिया। उन्होंने लोगों को सिर्फ व्यंजन नहीं सिखाए; यह यकीन दिया कि हर घर की रसोई भी प्रयोगशाला हो सकती है, कला का स्टूडियो हो सकती है, लेकिन एक बात याद रखनी चाहिए। महंगे औजार किसी को बड़ा बावर्ची नहीं बनाते। जैसे महंगा सितार खरीद लेने से कोई उस्ताद नहीं बन जाता, वैसे ही सूस-वीड की मशीन, पैकोजेट या सबसे आधुनिक अवन किसी को महान रसोइया नहीं बना सकते। महान रसोइया बनाती है जिज्ञासा। सब्र। बार-बार कोशिश करने का हौसला और किसी अपने को अपने हाथ का निवाला खिलाने की खुशी।
यहां रिश्ते महकते हैं
क्या रसोई में इस बदलाव से रेस्त्रां खत्म हो जाएंगे? हरगिज नहीं। रेस्त्रां हमें मेहमाननवाजी व जश्न देते हैं, लेकिन घर की रसोई हमें देती है-सृजन का सुख। अपने हाथों से किसी अपने के लिए कुछ बनाने की तसल्ली। आज भी जब मैं दुनियाभर की सबसे आलीशान रसोइयां देखता हूं, तो मेरी याद मां की रसोई में लौट जाती है। वहां न वाइकिंग का अवन था, न पैकोजेट, न कोई विदेशी मशीन, लेकिन उन्हें दाल की पहली उबाल देखकर पता चल जाता था कि अब आंच धीमी करनी है। आटे को छूकर मालूम हो जाता था कि एक चम्मच पानी और चाहिए। तब लगता था कि यह आदत है। आज समझता हूं, यह भी विज्ञान था- बस नाम अलग था। इसी वजह से मुझे यकीन है कि रसोई कभी पुरानी नहीं होगी। वहां सिर्फ खाना नहीं पकता, वहां यादें पकती हैं। रिश्ते गूंथे जाते हैं। मोहब्बत को स्वाद मिलता है और हर घर, आखिरकार अपनी रसोई से ही घर बनता है।
