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    जन्म से लेकर शादी-ब्याह तक, 'बाल मिठाई' के बिना अधूरा है हर पहाड़ी जश्न, 170 साल पुराना है इतिहास

    Updated: Wed, 15 Jul 2026 02:39 PM (IST)

    उत्तराखंड की वादियां अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों के लिए तो दुनियाभर में मशहूर हैं ही, लेकिन यहां का स्वाद भी कुछ कम नहीं है। इन्हीं खास ज ...और पढ़ें

    'बाल मिठाई' की दिलचस्प कहानी (Image Source: AI-Generated)

    'बाल मिठाई' की दिलचस्प कहानी (Image Source: AI-Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देवभूमि उत्तराखंड सिर्फ अपने खूबसूरत पहाड़ों और तीर्थ स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अनूठे खान-पान के लिए भी मशहूर है। इसी पहाड़ी जायके की एक बेहद खास पहचान है- 'बाल मिठाई'।

    गहरे भूरे रंग की यह मिठाई और उस पर सजी सफेद चीनी की छोटी-छोटी मोतियों जैसी गोलियां, इसे देश की बाकी सभी पारंपरिक मिठाइयों से एकदम अलग बनाती हैं। मुख्य रूप से मावे से बनने वाली यह मिठाई पूरे कुमाऊं क्षेत्र, खासकर अल्मोड़ा की सांस्कृतिक पहचान है।

    history of bal mithai

    (Image Source: AI-Generated)

    ब्रिटिश दौर से जुड़ा है इसका दिलचस्प इतिहास

    इस लाजवाब मिठाई की कहानी कोई आज की नहीं, बल्कि एक सदी से भी ज्यादा पुरानी है। बात साल 1856 की है, जब अल्मोड़ा में अंग्रेजों का शासन हुआ करता था और वहां भारी तादाद में सेना की तैनाती रहती थी। उसी दौरान अल्मोड़ा के जोग लाल साह नाम के व्यक्ति ने दूध की मिठाइयों के साथ एक नया प्रयोग किया और 'बाल मिठाई' का आविष्कार किया।

    शुरुआत में इसे खास तौर पर सैनिकों के लिए तैयार किया गया था। इसकी वजह यह थी कि पहाड़ों के शुद्ध दूध से बने खोए की लाइफ काफी अच्छी होती थी और यह लंबे समय तक खराब नहीं होता था। सैनिकों के लिए बनी यह मिठाई जल्द ही अपने जादुई स्वाद के कारण आम जनता की भी पहली पसंद बन गई।

    आज भी कायम है पकाने का वही पारंपरिक तरीका

    बाल मिठाई का असली जादू इसे बनाने की 170 साल पुरानी पारंपरिक विधि में छिपा है। इसे बनाने में आज भी मशीनों या किसी केमिकल का सहारा नहीं लिया जाता।

    • धीमी आंच पर पकता है खोया: शुरुआत पहाड़ी गायों के दूध से बने ताजा और बेहतरीन क्वालिटी के खोए से होती है। इस खोए को एक बड़ी कड़ाही में बहुत ही धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए घंटों तक भूना जाता है। इसी वजह से इसका रंग धीरे-धीरे गहरे भूरे रंग में बदल जाता है और एक शानदार खुशबू आने लगती है।
    • चीनी के गोल दानों की सजावट: जब यह मिश्रण गाढ़ा हो जाता है, तो इसे घी लगी हुई ट्रे में जमाकर ठंडा किया जाता है। इसके बाद इसे चौकोर टुकड़ों में काटकर, हर टुकड़े पर हाथ से सफेद चीनी की बारीक गोलियां लपेटी जाती हैं। यही चमकदार सफेद परत बाल मिठाई की सबसे बड़ी पहचान है, जो खाते वक्त एक बेहतरीन 'क्रंच' देती है।

    bal mithai story

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    (Image Source: AI-Generated)

    स्वाद के साथ सेहत का भी खजाना

    चूंकि बाल मिठाई पूरी तरह से शुद्ध दूध और खोए से बनती है, इसलिए यह सिर्फ मीठी ही नहीं होती, बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद होती है। इसमें कैल्शियम, प्रोटीन और ऊर्जा भरपूर मात्रा में पाई जाती है।

    अल्मोड़ा की 170 साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत

    आज अगर आप अल्मोड़ा जाएंगे, तो आपको बाल मिठाई की दर्जनों दुकानें मिल जाएंगी, लेकिन जोग लाल साह द्वारा शुरू की गई वो ऐतिहासिक दुकान आज भी अपनी उसी जगह पर मौजूद है। पिछले करीब 170 सालों से यह दुकान स्वाद की इस अनमोल विरासत को संजोए हुए है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक खासतौर पर इस ऐतिहासिक दुकान की बाल मिठाई का स्वाद चखने आते हैं।

    आज के समय में बाल मिठाई सिर्फ एक पकवान नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुकी है। चाहे कोई शादी-ब्याह हो, बच्चे का जन्म हो, त्योहार हो या कोई धार्मिक अनुष्ठान, पहाड़ की हर खुशी और हर जश्न बाल मिठाई की इस मिठास के बिना अधूरा ही माना जाता है।

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