न्यूयॉर्क से लंदन तक बज रहा भारतीय स्वाद का डंका! कैसे दुनिया की पहली पसंद बना भारत का खानपान?
मसालों के देश के रूप में विख्यात रहे भारत को अब इसके भोजन के लिए मिल रही है वैश्विक पहचान। दुनिया भर में भारतीय शेफ कैसे बढ़ा रहे हैं इसका मान, बता रह ...और पढ़ें

भारतीय स्वाद का वैश्विक डंका: मिशेलिन स्टार से दुनिया भर में मिली पहचान (Picture Credit- AI Gnerated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। एक जमाना था जब विदेश जाने वाला भारतीय अपने सूटकेस में कपड़ों से ज़्यादा यादें और यकीन लेकर जाता था- मां के हाथ का अचार, घर का भुना मसाला और यह उम्मीद कि किसी शहर की किसी गली में शायद ऐसा कोई रेस्टोरेंट मिल जाए जहां स्वाद घर की तरह लगे।
लंदन, न्यू यार्क, पेरिस- ये शहर दुनिया की रसोई के ताज थे, मगर भारतीय भोजन वहां अक्सर एक कोने में सिमटा रहता था। करी-हाउस की कतारें थीं, बुफे की थालियां थीं, मगर वह नफासत, वह नजाकत कम ही दिखाई देती थी जो दुनिया फ्रांसीसी या जापानी भोजन में तलाशती थी। दुनिया भारतीय भोजन को रंगीन कहती थी, मसालेदार कहती थी- मगर शायद ही कोई उसे उस गंभीरता से देखता था जिस गंभीरता से वह अन्य महान पाक परंपराओं को देखती थी। लेकिन हर धीमी आंच पर पकने वाली चीज की तरह भारतीय रसोई भी अपने समय का इंतजार कर रही थी।
चमका वो पहला सितारा
और फिर धीरे-धीरे वह समय आया। साल 2004। न्यू यार्क-दुनिया की गैस्ट्रोनामी का केंद्र, वह शहर जहां हर रात हजारों रेस्टोरेंट अपनी रसोई की कहानी सुनाते हैं। उसी शहर में शेफ हेमंत माथुर और मैंने एक छोटा-सा रेस्टोरेंट खोला- ‘देवी’। हमारे पास कोई बड़ी रणनीति नहीं थी। बस एक विश्वास था- कि भारतीय भोजन को उसी सम्मान और शालीनता के साथ पेश किया जा सकता है जिस सम्मान से दुनिया की दूसरी महान रसोइयां पेश की जाती हैं।
हेमंत के हाथों में तंदूर की तपिश थी- राजस्थान की रेत, उसकी रिवायत और उसकी सादगी। और मेरी रसोई में भारत की विविधता की धड़कन थी- दिल्ली की गलियों से लेकर केरल के तटों तक। हमने देवी में वही किया जो हमें स्वाभाविक लगा। मसालों को संतुलित किया, स्वादों को स्पष्ट रखा और हर प्लेट को एक कथा की तरह परोसा। 2007 में जब मिशेलिन गाइड पहली बार न्यू यार्क पहुंची और देवी को स्टार मिला, तब ऐसा लगा जैसे भारतीय भोजन ने चुपचाप दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मेज पर अपनी जगह बना ली हो।
खबरें और भी
जुनून इस कदर बढ़ा
उसके बाद इतिहास ने एक सुंदर मोड़ लिया। न्यू यार्क में ही कुछ वर्षों बाद विकास खन्ना का रेस्टोरेंट ‘जुनून’ मिशेलिन स्टार पाने वाला दूसरा भारतीय रेस्टोरेंट बना। जुनून की रसोई में पंजाब की गर्माहट थी और न्यू यार्क की आधुनिकता का तेज। विकास ने यह दिखाया कि भारतीय स्वाद केवल परंपरा नहीं, बल्कि नवाचार भी हो सकता है। फिर एक और मोड़ आया। विकास ने केवल रेस्टोरेंट तक खुद को सीमित नहीं रखा।
वह भारत लौटे और ‘मास्टरशेफ इंडिया’ के मंच पर जज बने- एक ऐसा मंच जिसने लाखों घरों में पाक कला के सपनों को जन्म दिया। अब विकास फिर न्यू यार्क लौटे हैं- अपने नए रेस्टोरेंट ‘बंगला’ के साथ। मैनहैटन की सड़कों पर उस रेस्टोरेंट के बाहर लंबी कतारें लगी रहती हैं। लोग इंतज़ार करते हैं- एक टेबल के लिए, एक अनुभव के लिए, भारतीय भोजन के लिए। सोचिए-दुनिया के सबसे बड़े शहर में, गैस्ट्रोनामी के सबसे बड़े मंच पर- एक भारतीय रेस्टोरेंट इतनी धूम मचा रहा है।
स्वाद की यह आकाशगंगा
कहीं न कहीं यह वही कहानी है जो 2004 में देवी से शुरू हुई थी और 2026 में बंगला तक आकर एक नई ऊंचाई पर पहुंच गई है। लेकिन इस यात्रा में कई और मिशेलिन सितारे भी हैं। लंदन में विनीत भाटिया और अतुल कोचर ने भारतीय भोजन को फाइन-डाइनिंग की दुनिया में नई पहचान दी। उनकी रसोई ने दुनिया को यह सिखाया कि मसाले शोर नहीं करते- वे संगीत रचते हैं। बैंकाक में गरिमा अरोड़ा ने अपने रेस्टोरेंट ‘गा’ के साथ भारतीय स्वादों को एक बिल्कुल नई भाषा दी- जहां परंपरा और प्रयोग एक साथ चलते हैं।
दुबई में विनीत भाटिया ने अपनी रसोई से यह साबित किया कि भारतीय भोजन की उड़ान सीमाओं से परे है। ‘इंडिगो’ और ‘इंडया’ के साथ वह आज भी दुनिया के सबसे सम्मानित भारतीय शेफ में गिने जाते हैं। सिंगापुर में जितिन जोशी अपने रेस्टोरेंट ‘रिवाल्वर’ के साथ भारतीय मसालों को एक आधुनिक, साहसी रूप दे रहे हैं- जहां तंदूर की आग और वैश्विक तकनीक मिलकर एक नई कहानी रचते हैं। अमेरिका के पश्चिमी तट पर, सैन फ्रांसिस्को में, शेफ श्रीजीत गोपीनाथन अपने रेस्टोरेंट ‘एटना’ के साथ भारतीय स्वादों को एक नई पहचान दे रहे हैं- जहां हर डिश भारत की विविधता की एक झलक बन जाती है!
दुनिया खोज रही है देसी भोजन
ये सब शेफ मिलकर एक नई परंपरा गढ़ रहे हैं-जहां भारतीय भोजन केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि एक अनुभव बन जाता है। लेकिन इस कहानी में केवल रसोई की मेहनत नहीं है। इसमें भारत के आत्मा का भी योगदान है। दुनिया ने भारत को केवल मसालों के देश के रूप में नहीं देखा। दुनिया ने भारत को विचारों के देश के रूप में भी जाना है। शायद इसी कारण जब हम शेफ-विकास, मैं, हेमंत और दुनिया भर के अन्य भारतीय-अपनी रसोई लेकर विदेश पहुंचे, तो दुनिया ने हमें खुले दिल से स्वीकार किया। आज एक दिलचस्प विडंबना भी है।
भारत में अभी भी कई लोग भारतीय भोजन को कुछ गिने-चुने व्यंजनों तक सीमित समझते हैं- बटर चिकन, दाल मखनी, बिरयानी और कबाब। लेकिन न्यू यार्क, लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों में आज लोग भारतीय घरों के साधारण भोजन को खोज रहे हैं। करेले की सब्जी, कद्दू की भुजिया, सहजन की फली, बाजरे की रोटी; ये सब अब वैश्विक रसोई में नए सम्मान के साथ प्रवेश कर रहे हैं। दुनिया भारतीय रसोई को केवल मसालों के लिए नहीं, बल्कि उसकी विविधता और गहराई के लिए पहचान रही है। कभी भारतीय भोजन दुनिया के लिए एक जिज्ञासा था, आज वह दुनिया की जरूरत बन चुका है!