मास्टरशेफ ने बताया कैसे पीढ़ियों तक जिंदा रहता है 'मां के हाथ का स्वाद', शेयर की अपनी फेवरेट बंगाली डिश
मास्टरशेफ पंकज भदौरिया बता रही हैं भारतीय संस्कृति और पारिवारिक विरासत के रूप में कैसे आगे बढ़ रहा है भोजन... ...और पढ़ें

शेफ बनाते हैं नाप-तोलकर, पर मां के 'अंदाजे' में छिपा है असली जादू (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मास्टरशेफ पंकज भदौरिया, नई दिल्ली। गुरुओं ने अगर ज्ञान बचाया, तो महिलाओं ने रसोई की परंपरा को आगे बढ़ाया। पीढ़ियों से चला आ रहा यह स्वाद 'मां के हाथ का खाना' कहलाया। एक पेशेवर शेफ जहां नाप-तोलकर खाना बनाता है, वहीं मां अनुभव और अंदाजे से ही खाने में जादू भर देती है।
मां पहली गुरु होती है- यह कहावत हम सबने सुनी है, लेकिन इस सत्य की सबसे जीवंत तस्वीर अगर कहीं देखने को मिलती है, तो वह है घर की रसोई । रसोई केवल भोजन पकाने की जगह नहीं, बल्कि यादों, संस्कारों और उस 'सीक्रेट रेसिपी' की पाठशाला है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी लिखित दस्तावेज के आगे बढ़ती रही है।
पुराने समय में कोई कुक-बुक नहीं होती थी। स्वाद का विज्ञान दैनिक अभ्यास और त्योहारों की गहमागहमी के बीच सिखाया जाता था। मां का वह 'चुटकी भर नमक' या मसाले भुन जाने के बाद की खास खुशबू ही वह पैमाना था, जिससे स्वाद का जादू बिखरता था। ये पारिवारिक व्यंजन केवल भोजन नहीं, बल्कि परिवार की पहचान थे, जिन्हें सहेजकर रखना हर पीढ़ी की जिम्मेदारी मानी जाती रही। रसोई में खड़े होकर मां के हाथों को चलते हुए देखने का अनुभव आज भी अतुलनीय है। यहां तक कि होटलों में भी घर के स्वाद का ही दावा किया जाता है।

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विरासत में मिला स्वाद
पाक परंपराओं को मौखिक और व्यावहारिक रूप से आगे बढ़ाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी जारी है। मुझे आज भी याद है, बचपन में रसोई के उस छोटे से तख्ते पर बैठकर मां को काम करते देखना। वहीं से मैंने खाना पकाने की बुनियादी बातों से लेकर उसकी सूक्ष्म बारीकियों तक का सफर तय किया । मेरे परिवार की रसोई संस्कृतियों का एक अद्भुत संगम रही है। मेरी मां की थाली में एक तरफ बंगाली व्यंजनों की सौम्यता और शुद्धता थी, तो दूसरी तरफ पंजाबी व्यंजनों का बेबाक स्वाद और गर्माहट। उन्होंने कुछ हुनर अपनी मां (मेरी नानी) से सीखा था और कुछ मेरी दादी से। आज वही मिली-जुली विरासत मेरे हाथों में है।
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सही अनुपात लाता स्वाद
भारतीय घरों में कुछ व्यंजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि एक सामूहिक उत्सव के रूप में बनाए जाते हैं। अचार बनाना भारतीय रसोई का सबसे कठिन और धैर्यपूर्ण अध्याय रहा है। मां या दादी सिखाती हैं कि कैसे आम या नींबू को सही आकार में काटना है, मसालों को धूप में कितना तपाना है और तेल का घेरा कैसे स्वाद को सुरक्षित रखता है। आज भी, दादी के हाथ के उस खास आम के अचार की रेसिपी किसी विरासत की तरह बेटियों और बहुओं को सौंपी जाती है।

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छतों पर खिलती परंपरा
गर्मियों की दोपहर में छत पर सफेद चादर बिछाकर पापड़ बेलना या मूंग की बड़ी तोड़ना एक सामाजिक गतिविधि रही है । पापड़ की लोई कितनी पतली हो और उसे धूप में कितनी देर रखना है, यह ज्ञान किसी किताब में नहीं मिलता । यह प्रत्यक्ष ज्ञान है। जब मां हमें पापड़ बेलने में मदद के लिए बुलाती थीं, तो वे हमें सिखा रही होती थीं कि कैसे एक छोटी सी भूल (जैसे ज्यादा नमी) पूरी मेहनत खराब कर सकती है। यह टीम वर्क और परफेक्शन का पहला पाठ था।
बदलते समय की अटूट कड़ी
आज के दौर में जब हम रेडी-टू-ईट के आदी हो रहे हैं, तब भी घर में बना नींबू का खट्टा-मीठा अचार या मठरी हमें मां की याद दिलाती है। यह सिलसिला थमा नहीं है। आज जब घर से दूर काम पढ़ाई के सिलसिले में आ बसे बच्चे मां से फोन पर पूछते हैं, 'मम्मी, कढ़ी में पकोड़े नरम कैसे बनेंगे?' तो वह मौखिक परंपरा ही आगे बढ़ रही होती है। यह वह अमूल्य ज्ञान है जो मैंने मां के सानिध्य में रसोई के उस तख्ते पर बैठकर पाया था और अब अपनी रेसिपी के माध्यम से दुनिया के साथ साझा कर रही हूं।

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रेसिपी नहीं, यादों का पिटारा है 'फिश पातुरी'
फिश पातुरी एक ऐसा व्यंजन है जो मेरे दिल के बेहद करीब है। इसकी रेसिपी महज मसालों का मिश्रण नहीं, बल्कि इसमें मेरी मां के प्यार और परंपरा की खुशबू है। इस पारंपरिक बंगाली व्यंजन में मछली को मसालों के साथ केले के पत्तों में लपेटकर भाप में पकाया जाता है।
4 लोगों के लिए फिश पातुरी बनाने के लिए
- सफेद मछली के फिलेट : 4 टुकड़े
- काली सरसों का पेस्ट : 2 बड़े चम्मच
- पीली सरसों का पेस्ट : 2 बड़े चम्मच
- पोस्ता दाना (खसखस) का पेस्ट : 1 बड़ा चम्मच
- नारियल का पेस्ट : 1 बड़ा चम्मच
- सरसों का तेल : 3-4 बड़े चम्मच
- हरी मिर्च, हल्दी पाउडर : 2 छोटी चम्मच
- नमक : स्वादानुसार
- केले के पत्तों का पार्सल बनाने के लिए : केले के पत्ते के 4 चौकोर टुकड़े और बांधने के लिए धागा
विधि : मछली के टुकड़ों पर नमक व एक चम्मच हल्दी पाउडर लगाकर मेरिनेट होने के लिए रख दें। एक बड़ी कटोरी में सरसों के दोनों पेस्ट, बची हल्दी, नमक, पोस्ता दाना पेस्ट, नारियल पेस्ट और बड़ा चम्मच सरसों का तेल डालकर अच्छी तरह मिलाएं। केले के पत्तों को हल्की आंच के ऊपर से इस तरह गुजारें कि वो जलें नहीं । इससे पत्ते नरम हो जाएंगे और मोड़ते समय फटेंगे नहीं। मछली के प्रत्येक टुकड़े पर सरसों का तैयार मसाला अच्छी तरह लगाएं और केले के पत्ते के बीच में रखें। ध्यान रहे कि मसाला मछली के दोनों तरफ अच्छी तरह लगा हो। मसाले के ऊपर एक हरी मिर्च रखें और एक छोटा चम्मच सरसों का तेल डालें। अब केले के पत्ते को चौकोर मोड़कर धागे से बांध दें । यदि पत्ता कहीं से फट जाए, तो ऊपर से एक और पत्ता लपेट दें। पैन में एक बड़ा चम्मच सरसों का तेल गर्म करके उस पर तैयार केले के पार्सल रखें। इसे ढककर धीमी आंच पर हर तरफ 10-10 मिनट पकाएं। गरमा-गरम फिश पातुरी को धागा खोलकर सादे उबले हुए चावल के साथ परोसें।