फास्ट फूड की अंधी दौड़ के बीच लौटें अपनी जड़ों की ओर, योग के लिए अपनाएं 'खेत से प्लेट तक' का सिद्धांत
सही सामग्रियों, संतुलित मसालों और सचेत कुकिंग तकनीकों के माध्यम से दैनिक आहार को योग के अनुकूल बना सकते हैं। ...और पढ़ें

योग के लिए बेहतर आहार भी जरूरी (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सही सामग्रियों के चयन, संतुलित मसालों और सचेत कुकिंग तकनीकों के माध्यम से हम अपने दैनिक आहार को योग के अनुकूल, सुपाच्य और प्राण ऊर्जा से भरपूर बना सकते हैं। जानिए शेफ रविकांत पाठक के नजरिए से...
जब हम आहार को योग के अनुकूल बनाने की बात करते हैं, तो पहला और महत्वपूर्ण विचार सात्विक भोजन का आता है। सात्विक आहार वह है जो शुद्ध, प्राकृतिक, सुपाच्य और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है। अपनी रसोई में योग को उतारने का मतलब स्वाद से समझौता करना नहीं है।
इसका वास्तविक अर्थ यह है कि हम ऐसे व्यंजनों का निर्माण करें जो शरीर में भारीपन या आलस्य पैदा न करें। तामसिक और राजसिक खाद्य पदार्थ, जैसे अत्यधिक तला-भुना खाना, बासी भोजन या बहुत तीखे मिर्च-मसाले, मन को अशांत और शरीर को सुस्त बनाते हैं। इसके विपरीत, सात्विक भोजन शरीर को हल्का रखता है, जिससे योगासनों और ध्यान के अभ्यास में एकाग्रता और शारीरिक लचीलापन बढ़ता है।
ताजी सामग्रियों का सही चयन
योग अनुकूल आहार तैयार करने के लिए हमें 'खेत से प्लेट तक' के सिद्धांत को अपनाना होगा। एक शेफ होने के नाते, मैं हमेशा मौसमी और स्थानीय रूप से उगाई गई सब्जियों और फलों को चुनने की सलाह देता हूं। कोल्ड स्टोरेज में महीनों तक रखे गए फल या रासायनिक प्रिजर्वेटिव्स से युक्त डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में वह जीवंत प्राण ऊर्जा नहीं होती जो योग के अभ्यास के लिए आवश्यक है।
खबरें और भी
उदाहरणस्वरूप जब आप इस मौसम में ताजी लौकी, तोरई, कद्दू, हरी पत्तेदार सब्जियां और मौसमी फलों को अपनी रसोई का हिस्सा बनाते हैं, तो आप सीधे तौर पर प्रकृति की शुद्ध ऊर्जा को अपने भीतर ग्रहण कर रहे होते हैं। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, रिफाइंड शुगर और कृत्रिम रंगों से दूरी बनाना इस यात्रा का सबसे बुनियादी कदम है। इसके अलावा साबुत अनाज जैसे बाजरा, रागी, ज्वार और भूरा चावल न केवल पोषण का खजाना हैं बल्कि पाचन तंत्र को भी सुचारू रखते हैं।
मसालों का संतुलन और महत्व
आमतौर पर लोगों के मन में यह गलतफहमी होती है कि सात्विक भोजन का मतलब बेस्वाद और उबला हुआ खाना होता है। लेकिन एक शेफ के तौर पर मैं इस धारणा को पूरी तरह से खारिज करता हूं और हां, सात्विक भोजन का मतलब वो व्रत वाली भारी-भरकम थाली और मिठाइयां भी नहीं हैं। दरअसल स्वादिष्ट मूंग दाल खिचड़ी, हींग-जीरा की छौंक वाले दाल-चावल से लेकर लाजवाब इडली-सांबर तक, जैन रसोई से लेकर मारवाड़ी भोजन तक, प्रसाद से लेकर मंदिरों के अन्नक्षेत्र तक; भारतीय रसोई में अधिकांश आहार सात्विक और इनमें इस्तेमाल होने वाले मसाले औषधीय गुणों का अनमोल खजाना हैं, बशर्ते उनका संतुलित उपयोग किया जाए। योग अनुकूल आहार में अत्यधिक तीखे मिर्च-मसालों, लहसुन और प्याज के अत्यधिक उपयोग से बचा जाता है, क्योंकि ये शरीर में अत्यधिक गर्मी और मन में चंचलता पैदा करते हैं।
इसके बजाय, हमें पाचक और सौम्य मसालों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, जीरा पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, हल्दी अपने सूजन-रोधी गुणों के लिए जानी जाती है, धनिया शरीर को आंतरिक शीतलता प्रदान करता है और सोंठ या ताजा अदरक जठराग्नि को प्रदीप्त करती है। दरअसल मसालों का संयोजन ऐसा होना चाहिए जो भोजन के प्राकृतिक स्वाद को दबाने के बजाय उसे और निखारे।
पकाने की विधि का रहस्य
भोजन को किस तरह और किस मानसिक स्थिति में पकाया जाता है, इसका उसकी पोषक गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है। जब हम शुद्ध, प्राकृतिक सामग्रियों को सही कुकिंग तकनीकों और सकारात्मक ऊर्जा के साथ मिलाते हैं, तो एक साधारण सा भोजन भी दिव्य और स्वास्थ्यवर्धक बन जाता है। शांत, प्रसन्न और कृतज्ञता के भाव से बनाया गया भोजन शरीर के लिए अमृत के समान काम करता है।
योग अनुकूल आहार के लिए खाना पकाने की प्रक्रिया सौम्य और न्यूनतम होनी चाहिए। सब्जियों को अत्यधिक डीप-फ्राई करने या भोजन को बहुत तेज आंच पर बार-बार गर्म करने से उसके आवश्यक विटामिंस और एंजाइम्स नष्ट हो जाते हैं, जिससे वह भोजन पचने में भारी हो जाता है।
इसके विपरीत, भाप में पकाना, हल्का उबालना या धीमी आंच पर ढंककर पकाना सबसे बेहतरीन योग कुकिंग तकनीकें हैं। इन विधियों से सब्जियों का प्राकृतिक रंग, बनावट और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। विडंबना यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा से उपजी यह कुकिंग तकनीकें स्वस्थ रहने के लिए सचेत पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय हैं जबकि हम फास्ट फूड और पैकेटबंद भोजन की ओर भाग रहे हैं।
सचेत भोजन करने की कला
भोजन का विज्ञान केवल उसे पकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे ग्रहण करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। योग विज्ञान में इसे 'मिताहार' या सचेत होकर खाना (माइंडफुल ईटिंग) कहा जाता है। योग अनुकूल जीवनशैली में भोजन करते समय टेलीविजन, मोबाइल फोन या किसी भी तरह की मानसिक चिंता से पूरी तरह दूर रहना अनिवार्य है। जब आप शांत चित्त होकर बैठते हैं और भोजन के रंग, उसकी सुगंध और वास्तविक स्वाद को महसूस करते हुए उसे चबा-चबाकर खाते हैं, तो आपका शरीर पाचक रसों का सही स्राव करता है। अपनी भूख से थोड़ा कम खाना और थाली में आए अन्न के प्रति सम्मान का भाव रखना ही योग का असली सार है!