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बिना डोनर के लौटेगी आंखों की रोशनी! क्या 'आर्टिफिशियल कॉर्निया' खत्म कर देगा ब्लाइंडनेस का डर?

Published: Fri, 14 Aug 2026 08:05 AM (GMT+05:30)

कार्निया डैमेज होने पर डोनर ढूंढना एक बड़ी चुनौती है जिसका एम्स के डॉक्टरों ने हल निकाला है: आर्टिफिशियल कॉर्निया।

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संक्षेप में पढ़ें

अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। कार्निया खराब होने से आंखों की रोशनी चली जाए और डोनर कार्निया नहीं मिले तो मरीज के सामने इलाज के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं। जिन लोगों की आंखों का कार्निया खराब होता है, उन्हें दिखाई नहीं देता। 

आर्टिफिशियल कार्निया नई उम्मीद

मेडिकल टर्म में इसे कार्नियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है। इसका एक ही उपचार है, वह है कार्निया ट्रांसप्लांट। कार्निया ट्रांसप्लांट करवाने से आंखों की रोशनी वापस लाई जा सकती है। कार्निया ट्रांसप्लांट के लिए डोनर कार्निया की आवश्यकता होती है। 

पर, भारत में यह मांग के अनुरूप नहीं है। ऐसे मरीजों के लिए एम्स के आरपी सेंटर में आर्टिफिशियल कार्निया नई उम्मीद बन रहा है। सेंटर के प्रो. डा. राजेश सिन्हा के अनुसार अब तक करीब 20 मरीजों में आर्टिफिशियल कार्निया लगाया जा चुका है। परिणाम उत्साहजनक रहे। 

डोनर की कमी कितनी बड़ी? 

देश में हर साल करीब एक लाख मरीजों को कार्निया प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले 2022-23 में 62,370, 2023-24 में 66,434 और 2024-25 में 69,848 डोनर कार्निया एकत्र हुए। यानी हाल के तीन वर्षों में प्रति एक लाख की आवश्यकता पर औसतन करीब 66 हजार कार्निया ही एकत्र हो पाए। यानी करीब 34 हजार नागरिक डोनर कार्निया के अभाव में अंधेरे में जीवन जीने को अभिशप्त हैं। वर्तमान में देश में 396 नेत्र बैंक इस दिशा में काम कर रहे हैं। 

क्या है आर्टिफिशियल कार्निया?

आर्टिफिशियल कार्निया का तकनीकी नाम केराटोप्रोस्थेसिस है। यह डोनर टिश्यू नहीं, बल्कि विशेष सामग्री से बना कृत्रिम उपकरण होता है। इसमें पारदर्शी आप्टिकल हिस्सा होता है, जो खराब कार्निया के कारण बंद हुए रोशनी के रास्ते को फिर से खोलता है। और रेटिना तक रोशनी पहुंचाने का मार्ग तैयार करता है। 

कैसे लौटती है रोशनी?

आर्टिफिशियल कार्निया का पारदर्शी हिस्सा रोशनी को आंख के अंदर जाने देता है। प्रकाश रेटिना तक पहुंचता है और वहां से आप्टिक नर्व के जरिए दृश्य संकेत मस्तिष्क तक पहुंचते हैं। यानी यह रेटिना या आप्टिक नर्व को ठीक नहीं करता, बल्कि खराब कार्निया की जगह रोशनी के लिए नया रास्ता देता है। 

किन मरीजों को फायदा?

यह हर कार्नियल ब्लाइंड मरीज के लिए नहीं है। इसका इस्तेमाल खासकर उन जटिल मरीजों में किया जाता है, जिनमें सामान्य कार्निया ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता या उसके सफल होने की संभावना कम होती है। आर्टिफिशियल कार्निया लगने के बाद अब तक उपचार पाए मरीजों की दृष्टि पहले की तुलना में बेहतर हो गई है। 

हालांकि, यह आवश्यक नहीं कि हर मरीज को बिल्कुल सामान्य आंख जैसी दृष्टि मिल जाएगी, क्योंकि यह रेटिना, आप्टिक नर्व और आंख की दूसरी संरचनाओं की स्थिति पर निर्भर करता है। पर, गंभीर कार्नियल बीमारी के कारण लगभग कुछ भी न देख पाने वाले मरीजों में उपयोगी दृष्टि लौटना भी बड़ा लाभ है। 

क्या है लागत?

भारत में केराटोप्रोस्थेसिस की सामान्य लागत करीब दो से चार लाख रुपये बताई जाती है। वास्तविक खर्च उपकरण, अस्पताल और मरीज की स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।

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