Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    क्या आपका बच्चा भी रहता है बात-बात पर चिड़चिड़ा? जानिए कैसे 'विटामिन' कर सकते हैं इस समस्या का इलाज

    Updated: Fri, 06 Mar 2026 08:35 AM (GMT+05:30)

    एक नए क्लिनिकल शोध से पता चला है कि माइक्रोन्यूट्रिएंट्स किशोरों में गंभीर चिड़चिड़ेपन को काफी हद तक कम कर सकते हैं। ...और पढ़ें

    रिसर्च का दावा- विटामिन्स से 64% किशोरों के व्यवहार में हुआ जबरदस्त सुधार (Image Source: AI-Generated)

    रिसर्च का दावा- विटामिन्स से 64% किशोरों के व्यवहार में हुआ जबरदस्त सुधार (Image Source: AI-Generated) 

    HighLights

    1. माइक्रोन्यूट्रिएंट्स किशोरों में गंभीर चिड़चिड़ापन कम करते हैं

    2. 'BEAM' ट्रायल ने मूड और डिप्रेशन में सुधार दिखाया

    3. यह सुरक्षित, सुलभ उपचार आत्महत्या के विचारों को भी घटाता है

    कन्वर्सेशन, क्राइस्टचर्च (न्यूजीलैंड)। किशोरावस्था में बच्चों का बात-बात पर गुस्सा करना या चिड़चिड़ा होना एक आम बात लग सकती है, लेकिन कई बार यह समस्या बच्चों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ी परेशानी बन जाती है। आमतौर पर गंभीर चिड़चिड़ेपन के लिए साइकोथेरेपी या दवाओं का सहारा लिया जाता है। हालांकि, ये उपचार हर किसी के लिए कारगर नहीं होते और कई बार आम लोगों की पहुंच से बाहर भी होते हैं।

    लेकिन, अब माता-पिता के लिए एक अच्छी खबर है। एक नए क्लिनिकल शोध से यह साबित हुआ है कि माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (यानी विटामिन्स और मिनरल्स) किशोरों में इस गंभीर चिड़चिड़ेपन को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

    micronutrients

    (Image Source: AI-Generated) 

    बढ़ता चिड़चिड़ापन बन सकता है डिप्रेशन की वजह

    चिड़चिड़ापन केवल खराब मूड नहीं है, इसका मुख्य लक्षण नकारात्मक बातों पर बहुत अधिक और तेज प्रतिक्रिया देना है। इसके कारण बच्चों के व्यवहार में अचानक गुस्सा और गंभीर उतार-चढ़ाव आते हैं।

    शोध बताते हैं कि यह समस्या केवल गुस्से तक सीमित नहीं रहती, बल्कि चिंता, डिप्रेशन और एकाग्रता में कमी जैसी अन्य मानसिक परेशानियों को भी जन्म देती है। इसलिए, एक ऐसे सुरक्षित और सुलभ इलाज की सख्त जरूरत थी जिसके साइड इफेक्ट कम हों।

    क्या कहता है नया शोध?

    हाल ही में हुए बैलेंसिंग इमोशंस ऑफ एडोलसेंट्स विद माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (BEAM) नाम के एक क्लिनिकल ट्रायल में इस विषय पर गहराई से अध्ययन किया गया। इस शोध में 12 से 17 साल की उम्र के 132 ऐसे किशोरों को शामिल किया गया, जो किसी अन्य तरह की दवा नहीं ले रहे थे।

    खबरें और भी

    कैसे हुआ परीक्षण?

    इन किशोरों को रैंडम तरीके से दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को 8 हफ्तों तक दिन में तीन बार माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (विटामिन और मिनरल) की चार गोलियां दी गईं, जबकि दूसरे समूह को 'सक्रिय प्लेसबो' दिया गया। इसके अलावा, हर महीने एक क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक द्वारा ऑनलाइन माध्यम से इनकी जांच और निगरानी की गई।

    हैरान कर देने वाले रहे नतीजे

    हालांकि, अध्ययन में हिस्सा लेने मात्र से कई बच्चों ने अपने व्यवहार में सुधार महसूस किया, लेकिन जिन बच्चों ने विटामिन और मिनरल्स लिए, उनके नतीजे कहीं अधिक शानदार और चौंकाने वाले रहे:

    • गंभीर मामलों में बड़ी सफलता: 'व्यवधानकारी मूड डिरेगुलेशन विकार' यानी गंभीर रूप से खराब और हिंसक मूड वाले बच्चों पर इसका सबसे मजबूत असर दिखा। विटामिन लेने वाले 64% बच्चों में जबरदस्त सुधार देखा गया, जबकि प्लेसबो लेने वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 12.5% था। मनोचिकित्सा के क्षेत्र में यह एक असामान्य और बहुत बड़ा सकारात्मक प्रभाव है।
    • माता-पिता की संतुष्टि: विटामिन लेने वाले बच्चों के माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चों के सामाजिक और सामान्य व्यवहार में बहुत तेजी से सुधार आया।
    • जीवन की गुणवत्ता में सुधार: बच्चों में क्लिनिकल स्तर का चिड़चिड़ापन कम हुआ, डिप्रेशन में कमी आई और खुद बच्चों ने अपनी जिंदगी को पहले से बेहतर महसूस किया।
    • आत्महत्या के विचारों में कमी: इस शोध की शुरुआत में लगभग 25% बच्चों ने आत्महत्या के विचारों की बात स्वीकारी थी। लेकिन राहत की बात यह रही कि समय के साथ, विटामिन (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) लेने वाले बच्चों के विचारों में बहुत अधिक सकारात्मक बदलाव आया और ऐसे नकारात्मक विचार कम हुए।

    यह शोध साबित करता है कि विटामिन और मिनरल्स पारंपरिक मनोचिकित्सीय उपचारों का एक बेहद सुरक्षित, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकने वाला और जैविक रूप से आधारित बेहतरीन विकल्प हैं। यह उन परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण है, जो अपने बच्चों के चिड़चिड़ेपन और गुस्से से परेशान हैं।

    यह भी पढ़ें- लिवर फेलियर का खतरा अब पहले ही चलेगा पता: एंटीबायोटिक्स को लेकर वैज्ञानिकों ने किया बड़ा खुलासा

    यह भी पढ़ें-  विटामिन बी12 की कमी से रुक सकता बच्चे का दिमागी विकास, PGI के शोध में साबित हुई यह बात, माता- पिता समय पर दें ध्यान