पेरेंट्स की ये एक गलती बच्चों को धकेल रही है नशे के दलदल में, सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
बच्चे जितना इंटरनेट की दुनिया में खोए रहेंगे, उनका बुरी संगति और आदतों का खतरा उतना ही बढ़ता जाएगा। ...और पढ़ें

108 स्कूलों के छह हजार से ज्यादा बच्चों पर सर्वे (Image Source: AI Generated)

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प्रेट्र, नई दिल्ली। स्कूली किशोर देश का भविष्य हैं और उन्हें लेकर हाल ही में आई एक स्टडी ने पेरेंट्स के साथ ही टीचर्स की भी चिंता बढ़ा दी है। हम सभी जानते हैं कि टीनेज एक ऐसी उम्र है जिसमें बच्चों का सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि गलत संगत और आदतें उनका पूरा जीवन खतरे में डाल सकती है। इसी को लेकर सामने आई स्टडी ने होश ही उड़ा दिए हैं। दरअसल, यह स्टडी बताती है कि टीनेज उम्र के बच्चे नशीले पदार्थ उपयोग करने के मामले में सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।
108 स्कूलों के छह हजार से ज्यादा बच्चों पर सर्वे
हाल ही में एक सर्वेक्षण अध्ययन में बड़ी ही चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। 108 स्कूलों के छह हजार से अधिक किशोरों पर किए गए इस सर्वेक्षण में पाया गया है कि हर पांचवां किशोर मादक पदार्थों के उपयोग करने के मामले में मध्यम से उच्च प्रवृत्ति जोखिम वाला हो सकते है। यह अध्ययन "द लैंसेट रीजनल हेल्थ-साउथईस्ट एशिया" जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
सर्वे में कई राज्यों का डेटा शामिल
इस सर्वे में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, असम के कामरूप, महाराष्ट्र के नागपुर, गुजरात के राजकोट, झारखंड के देवघर और पुडुचेरी के सरकारी और निजी स्कूलों को शामिल किया गया। सर्वे में 21.4 प्रतिशत किशोरों को मध्यम (10.3 प्रतिशत) या उच्च (11.1 प्रतिशत) मादक पदार्थों के उपयोग की आशंका के जोखिम वाली कैटेगरी में रखा गया है। इसमें भी जान लेने वाली बात यह है कि गुवाहाटी और देवघर के स्कूलों में उच्च जोखिम वाले किशोरों का अनुपात अधिक था, जबकि नागपुर और पुडुचेरी में सबसे कम जोखिम वाले किशोरों की अधिकता रही। शोधकर्ताओं ने डब्ल्यूएचओ के स्क्रीनिंग टेस्ट का उपयोग किया।
बच्चों का डिजिटल एक्सपोजर सबसे बड़ी वजह
अध्ययन केवल किशोरों के नशीले पदार्थों के उपयोग से जुड़े जोखिम की बात नहीं करता बल्कि इसकी वजहों पर भी ध्यान केंद्रित करता है। इस सर्वे में पाया गया है कि डिजिटल एक्सपोजर इसकी सबसे बड़ी वजह है। यह रिपोर्ट बताती है कि ज्यादा डिजिटल एक्सपोजर और नशीले पदार्थों की उपलब्धता के चलते किशोरों में इनका जोखिम बढ़ा है। इसी के साथ, उन्होंने सुझाव दिया है कि रोकथाम की रणनीतियों को बहु-स्तरीय हस्तक्षेपों की ओर बढ़ाना चाहिए, जिसमें सामुदाय आधारित या साथी के नेतृत्व वाला हस्तक्षेप शामिल हैं।