शिकायतें तुरंत, मगर तारीफ में देरी! क्यों हम भूल जाते हैं कि भगवान कहलाने वाले डॉक्टर भी एक इंसान हैं?
आज 1 जुलाई के दिन भारत में हर साल की तरह राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस (National Doctors Day 2026) मनाया जा रहा है। ...और पढ़ें

मरीजों की जान बचाते-बचाते खुद को भूल रहे हैं डॉक्टर्स (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जब हम किसी डॉक्टर के क्लिनिक या अस्पताल में कदम रखते हैं, तो हमारी स्वाभाविक उम्मीद यही होती है कि वे पूरी तरह से शांत, चौकन्ने और हमारे लिए सबसे सही मेडिकल फैसले लेने के लिए तैयार होंगे।
जिंदगी के सबसे नाजुक और कमजोर पलों में हम उनकी काबलियत पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि उस सफेद कोट के पीछे भी एक इंसान है। एक ऐसा इंसान जो लगातार काम के लंबे घंटों, मानसिक तनाव और दूसरों की जान बचाने की भारी जिम्मेदारी से जूझ रहा है।
आज हेल्थकेयर सेक्टर में डॉक्टरों का 'बर्नआउट' एक ऐसी बड़ी चुनौती बन चुका है, जिस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। सबसे अहम बात यह है कि अब यह सिर्फ डॉक्टरों की पर्सनल परेशानी नहीं रह गई है, बल्कि इसका सीधा असर मरीजों की सुरक्षा और उन्हें मिलने वाले इलाज की गुणवत्ता पर पड़ने लगा है।

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थकान से अलग होता है 'बर्नआउट'
बर्नआउट का मतलब दिनभर की भागदौड़ के बाद होने वाली सामान्य थकान नहीं है। यह असल में लंबे समय तक काम के भारी दबाव से पैदा होने वाली शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक थकावट है। इसकी वजह से डॉक्टर अंदर से खुद को भावनात्मक रूप से खाली महसूस करने लगते हैं और अपने पेशे की लगातार बढ़ती मांगों के बोझ तले दब जाते हैं।
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डॉक्टरों पर इतना दबाव क्यों?
आज की मेडिकल दुनिया पहले से कहीं ज्यादा चैलेंजिंग हो गई है। डॉक्टरों को हर दिन बढ़ती मरीजों की संख्या, जटिल बीमारियों, कागजी काम, डिजिटल रिकॉर्डिंग और इलाज के तेजी से बदलते तौर-तरीकों को संभालना पड़ता है। गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी जैसी स्पेशलिटी में तो कई मरीजों को लंबे समय तक देखभाल और लगातार काउंसलिंग की जरूरत होती है।
बीमारी का पता लगाने और इलाज करने के अलावा, डॉक्टरों को अक्सर मरीजों और उनके परिवारों को बीमारी के मुश्किल दौर, लाइफस्टाइल में बदलाव और अनिश्चितता के बीच मानसिक सपोर्ट भी देना पड़ता है। समय के साथ ये जिम्मेदारियां इतनी बढ़ जाती हैं कि अत्यधिक दबाव उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है।
मरीजों की सुरक्षा पर कैसे पड़ता है असर?
डॉक्टरों की इस थकावट का खामियाजा सिर्फ उन्हें ही नहीं भुगतना पड़ता। कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि लंबे समय तक रहने वाली मानसिक थकान से एकाग्रता, सही निर्णय लेने की क्षमता और बातचीत के तरीके पर बुरा असर पड़ता है। भले ही डॉक्टर अपनी तरफ से बेहतरीन इलाज देने के लिए पूरी तरह समर्पित हों, लेकिन लगातार बनी रहने वाली थकावट से गलतियों की आशंका बढ़ सकती है, काम की गति धीमी हो सकती है और मरीजों के साथ अच्छी तरह जुड़ना मुश्किल हो सकता है।

(Image Source: AI-Generated)
एक अच्छा इलाज सिर्फ क्लिनिकल ज्ञान से नहीं, बल्कि भरोसे और सही संवाद से भी होता है। मरीज अक्सर इस बात को याद रखते हैं कि घबराहट के समय डॉक्टर ने उनकी बात कैसे सुनी या बीमारी को कैसे समझाया। जब डॉक्टर मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं, तभी वे मरीजों को पूरी हमदर्दी के साथ केयर दे पाते हैं।
सिस्टम में बदलाव की सख्त जरूरत
इस समस्या को दूर करने के लिए केवल डॉक्टरों से और ज्यादा मजबूत बनने की उम्मीद करना काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए पूरे सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। हेल्थकेयर संस्थाओं को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां सही काम के घंटे, पर्याप्त स्टाफ, मेंटल हेल्थ से जुड़ी सुविधाएं और प्रोफेशनल ग्रोथ के मौके मिलें।
इसके अलावा, बेवजह की कागजी कार्रवाई के बोझ को कम करने और तकनीक का सही इस्तेमाल करने से डॉक्टरों का काफी समय बच सकता है, जिसे वे अपने मरीजों को दे सकते हैं। साथ ही, एक ऐसा माहौल बनाना भी उतना ही जरूरी है जहां मानसिक भलाई के लिए मदद मांगना सामान्य बात हो। जिस तरह डॉक्टर अपने मरीजों को समय पर इलाज लेने की सलाह देते हैं, उसी तरह उन्हें भी बिना किसी झिझक या डर के मदद मांगने में सहज महसूस करना चाहिए।
शिकायतें तुरंत और तारीफ में देरी क्यों?
इस दिशा में मरीजों और समाज का भी एक अहम रोल है। डॉक्टर के साथ आपकी मुलाकात भले ही चंद मिनटों की हो, लेकिन उससे पहले वह अक्सर घंटों तक मरीजों की देखभाल, इमरजेंसी प्रक्रियाओं और मुश्किल मेडिकल फैसले लेने की प्रक्रिया से गुजर चुका होता है।
ऐसे में आपकी थोड़ी सी सहनशीलता, सम्मानजनक बातचीत और समझदारी डॉक्टर-मरीज के रिश्ते को मजबूत बनाती है। आज की दुनिया में जहां शिकायतें तुरंत की जाती हैं लेकिन तारीफ करने में देरी होती है, हमें यह याद रखना चाहिए कि डॉक्टर भी इंसान हैं। थोड़ा-सा सब्र, भरोसा और तारीफ न केवल मरीजों को, बल्कि डॉक्टर-मरीज के रिश्ते को भी ठीक कर सकती है।
डॉक्टरों के लिए 'सेल्फ-केयर' है जरूरी
डॉक्टरों को भी यह समझना होगा कि दूसरों की देखभाल करने के लिए खुद की देखभाल करना बहुत जरूरी है। सही आराम, नियमित एक्सरसाइज, अच्छा खान-पान, माइंडफुलनेस और परिवार-दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना उनकी पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों जिंदगियों को बेहतर बनाता है। खुद का ध्यान रखना कोई ऐशो-आराम नहीं है, बल्कि यह एक प्रोफेशनल जिम्मेदारी है ताकि वे मरीजों को सुरक्षित और प्रभावी इलाज दे सकें।
बात बिल्कुल साफ है- स्वस्थ डॉक्टर ही स्वस्थ मरीज बना सकते हैं। डॉक्टरों की मेंटल हेल्थ का ध्यान रखने का मतलब उनसे उम्मीदें कम करना नहीं है, बल्कि ऐसा माहौल तैयार करना है जिसमें वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दे सकें। बर्नआउट को डॉक्टरों की व्यक्तिगत कमजोरी मानने के बजाय इसे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मानकर, हम एक ऐसा हेल्थकेयर सिस्टम बना सकते हैं जो ज्यादा सुरक्षित, संवेदनशील और हर मरीज की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार हो।
- डॉ. नीलम मोहन (वरिष्ठ निदेशक - गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोलॉजी, लिवर ट्रांसप्लांट एवं गैस्ट्रोसाइंसेज, मेदांता गुरुग्राम) से बातचीत पर आधारित।
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