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हार्ट अटैक से बचना है तो सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नहीं, इन 5 रिस्क फैक्टर्स पर भी रखें नजर

Published: Tue, 01 Sep 2026 05:20 PM (IST)

रक्त में कोलेस्ट्रॉल का असंतुलन और अन्य 5 जोखिम कारक हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाते हैं, केवल कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण ही ...और पढ़ें

कोलेस्ट्रॉल ही नहीं, हार्ट अटैक से बचने के लिए इन 5 जोखिमों पर भी दें ध्यान (Picture Credit- AI Generated)

कोलेस्ट्रॉल ही नहीं, हार्ट अटैक से बचने के लिए इन 5 जोखिमों पर भी दें ध्यान (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. कोलेस्ट्रॉल के साथ अन्य 5 जोखिम कारक भी हार्ट अटैक बढ़ाते हैं

  2. ICMR अध्ययन: 87.3% वयस्कों में लिपिड प्रोफाइल असंतुलित पाया गया

  3. बच्चों में भी बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा, Lp(a) जांच महत्वपूर्ण

सीमा झा, नई दिल्ली। क्या आप भी कोलेस्ट्राल को अपना दुश्मन मानते हैं? दरअसल, समस्या कोलेस्ट्राल नहीं, बल्कि जीवनशैली व अन्य कारणों से रक्त में इसका संतुलन बिगड़ना है। रक्त में मौजूद यह मोम जैसा पदार्थ कोशिकाओं, हार्मोन और विटामिन डी के निर्माण के लिए आवश्यक है। यह कोशिका के बाहरी परत को मजबूती देता है और लिवर में पित्त बनाकर भोजन बनाने में मदद करता है।

हां, यह नुकसानदायक तब हो जाता है जब रक्त में गुड कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होने लगती है और बैड कोलेस्ट्राल जिसे एलडीएल कहा जाता है, उसकी मात्रा बढ़ जाती है। उल्लेखनीय है कि बैड कोलेस्ट्राल के साथ भी लोग सामान्य जीवन जी रहे होते हैं लेकिन खतरा तब पैदा होता है जब आर्टरीज पर इसका जमाव बढ़ने लगता है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम बढ़ता है। ‘इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च’ (आईसीएमआर) के एक हालिया अध्ययन की मानें तो देश के 87.3 प्रतिशत वयस्कों में लिपिड प्रोफाइल, जिसमें कोलेस्ट्राल का मापन किया जाता है, उसमें खराबी पाई गई है।

खास बात यह है कि इसमें तकरीबन 35.5 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें न डायबिटीज की समस्या है, न ही उच्च रक्तचाप या मोटापे की समस्या। ऐसे में कोलस्ट्राल के बढ़े हुए स्तर को लेकर हमें चिंता क्यों होनी चाहिए, क्या केवल कोलेस्ट्राल नियंत्रण से हृदय रोग या हार्ट अटैक को रोक पाना संभव है, कोलेस्ट्राल बढ़ा है तो इसकी दवा कब शुरू करनी चाहिए? आइए इन सभी पहलुओं के बारे में विस्तार से समझें।

सामान्य कोलेस्ट्राल में भी हो सकता है जोखिम

अगर आप भी सोचते हैं कि कोलेस्ट्राल सामान्य है तो हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम कम हो जाता है तो यह पूरा सच नहीं है। कई मरीजों की संख्या कम नहीं है, जिनका लिपिड प्रोफाइल सामान्य होने के बावजूद वे हार्टअटैक के शिकार हुए हैं। दरअसल, हार्ट अटैक केवल एलडीएल या टोटल कोलेस्ट्राल बढ़ने से नहीं होता, बल्कि धमनियों में सूजन, आनुवंशिक कारण, लिपोप्रोटीन (ए), एपोलिपोप्रोटीन (बी), हाइ ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूमपान, मोटापा और कोरोनरी आर्टरी में कैल्शियम जमा होने जैसे कारणों से भी यह संभव है।

यही कारण है कि हार्ट से जुड़े खतरे का आकलन करते समय केवल एलडीएल या टोटल कोलेस्ट्राल ही नहीं, बल्कि अन्य जोखिम कारकों के बारे में भी जानना उतना ही महत्वपूर्ण है। परिवार में हार्ट से जुड़ी बीमारियों का इतिहास भी इसमें शामिल है। सबसे बेहतर उपाय यही है कि केवल कोलेस्ट्राल के स्तर को नियंत्रित रखने के साथ साथ डायबिटीज, हाइ बीपी और धूमपान की आदतों को लेकर भी सचेत होने की जरूरत है। चिकित्सक से परामर्श लेकर अपनी दिनचर्या और जीवनशैली में आवश्यक बदलाव करना चाहिए।

एलपीए है महत्वपूर्ण मार्कर

हार्ट से जुड़ी बीमारियों को लंबे समय तक कोलेस्ट्राल, उच्च रक्तचाप, मोटापे आदि से जोड़ा जाता रहा है, पर हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण मार्कर जुड़ा है लिपोप्रोटीन (ए) यानी एलपीए। ब्लड में मौजूद यह घटक अब हार्ट अटैक, स्ट्रोक व शुरुआती तौर पर हार्ट से जुड़ी बीमारियों की पहचान करने या उसकी भविष्यवाणी करने में मददगार है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति हार्ट अटैक का शिकार होता है तो हमें एकदम से आश्चर्य होता है, लेकिन इसके अनेक कारण हैं जिसमें उसका बढ़ा हुआ एलपीए का स्तर भी है जो कि आर्टरीज को नुकसान पहुंचाता है।

इसके कारण वे सख्त और संकुचित होने लगती हैं। बता दें कि जिन व्यक्तियों में एलपी(ए) का स्तर 50 मिलीग्राम/डीएल से अधिक होता है, उन्हें कम उम्र में ही हार्ट से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका अधिक होती है। ऐसे में अगर परिवार में हार्ट अटैक व हार्ट से जुडी बीमारियों का इतिहास रहा है, तो आपको कोलेस्ट्राल की जांच के साथ एलपी(ए) की जांच भी करा लेनी चाहिए। इससे आप अचानक हार्ट से जुड़ी समस्याओं के चपेट में आने से भी बच सकते हैं।

बच्चों में बढ़ता खतरा, किस उम्र में कराएं जांच

हमें समझने की जरूरत है कि 10-12 वर्ष की उम्र में मेटाबोलिज्म तेजी से बदलता है। ऐसे में अगर बच्चों की आदतें स्वस्थ हैं, वे खानपान और खेलकूद व्यायाम आदि नियमित रूप से करते हैं तो उनका स्वाभाविक विकास अपेक्षाकृत बेहतर होता है। लेकिन इन दिनों जिस तरह से बच्चों के सामान्य आहार में जंक फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, स्वीट ड्रिंक्स और अत्यधिक तेल-मसाले वाला खानपान शामिल हो रहा है, वह नए तरह के जोखिम पैदा कर रहा है। इससे बैड कोलेस्ट्राल उनके आर्टरीज में छोटी उम्र से ही जमा होने लगते हैं।

घंटों मोबाइल/कंप्यूटर पर बैठे रहना, नींद पूरी न लेना, पढ़ाई व करियर का तनाव ऐसे कई कारक हैं जो बच्चों के हार्ट पर दबाव डाल रहे हैं। इससे कम उम्र में ही हार्ट की बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है। प्रयास करें कि 10 वर्ष की उम्र में बच्चे का पहला लिपिड प्रोफाइल जांच अवश्य करा लें। इससे उनमें हाइपोकोलेस्ट्रिमिया का पता चल सकता है। परिवार में अगर कोलेस्ट्राल का इतिहास रहा है, तब यह और भी जरूरी है। इसके बाद 20 की उम्र में दूसरा लिपिड प्रोफाइल चेक कराएं। फिर एक साल में और उसके बाद हर 4-5 साल में चेक कराते रहें।

ये है आपका लिपिड प्रोफाइल

रक्त जांच से लिपिड प्रोफाइल से ही कोलेस्ट्राल के स्तर का पता चलता है। इसमें मुख्य घटक मापे जाते हैं :

  • कुल कोलेस्ट्राल : ब्लड में कुल कोलेस्ट्राल की मात्रा।
  • एचडीएल (गुड कोलेस्ट्राल): इसकी मात्रा जितनी अच्छी होगी, हार्ट की बीमारी का जोखिम उतना ही कम हो सकता है, इसलिए इसे गुड कोलेस्ट्राल भी कहते हैं। यह आर्टरीज में जमा बैड कोलेस्ट्राल को लेकर वापस लिवर तक पहुंचाता है, फिर लिवर उस बैड कोलेस्ट्राल को शरीर से बाहर निकाल देता है।
  • एलडीएल (बैड कोलेस्ट्राल):  यह आर्टरीज में जमने वाला कोलेस्ट्राल होता है जो हार्ट स्ट्रोक या अटैक का कारण बनता है। रक्त में इसकी मात्रा अधिक होने पर आर्टरीज संकरी और कठोर बन जाती है। इससे रक्तसंचार बाधित होने लगता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम बढ़ता है।
  • ट्राइग्लिसराइड्स: रक्त में मौजूद एक तरह का फैट, जिसका बढ़ा हुआ स्तर हार्ट से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ा देता है।

ऐसे बढ़ जाएगा बैड कोलेस्ट्राल

  • लगातार लंबे समय तक बैठे रहना
  • आहार के प्रति असजगता व लापरवाही
  • नियमित कसरत से दूरी
  • अच्छी नींद में कोताही या नींद से जुड़ी स्वच्छता का ध्यान न रखना
  • तनाव प्रबंधन न कर पाना
  • धूमपान व अल्कोहल का सेवन

ये हैं हार्ट-फ्रेंडली अच्छी आदतें

  • आहार में नियमित रूप से फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज को शामिल करना
  • वसा कम करने के साथ-साथ नमक की मात्रा भी कम रखना
  • वजन नियंत्रण को प्राथमिकता समझना
  • अगर धूमपान करते हैं तो इसे कम करने या बंद करने के उपायों पर काम करना
  • प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि

जीवनशैली स्वस्थ रखें और स्वास्थ्य जांच कराते रहें

जब हम कोलेस्ट्राल कम करने की बात करते हैं तो इसका अर्थ तेल या वसा को बंद करना नहीं होता। इसका अर्थ है आप वसा लें पर वह स्वस्थ हो। अच्छे फैट नुकसान नहीं करते, लेकिन इसकी मात्रा भी सीमित होनी चाहिए। भारतीयों में एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ा रहता है। कोलेस्ट्राल का स्तर भी उच्च रहता है और साथ में पेट का मोटापा अधिक देखने में आता है, जिसे अब्डोमिनल मोटापा कहते हैं। यह ट्राइग्लाइसिराइड बढ़ाता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा भी बढ़ा देता है। ऐसे में जरूरी है कि हम जो खाना खा रहे हैं, उसे लेकर सजगता बरतें और शारीरिक निष्क्रियता को कम से कम करें। रोजाना व्यायाम फायदेमंद होता है। यह अच्छे कोलेस्ट्राल को बढ़ाता है और खराब कोलेस्ट्राल को कम करता है। जब हम दवा की बात करते हैं, तो यह उनके लिए है है जिनका मार्कर जोखिम भरा रहता है। कोलेस्ट्रोल बढ़ने, एलपीए मार्कर के औसत स्तर अधिक होने पर सतर्कता बढ़ाने की जरूरत होती है। जिनका एलडीएल का स्तर 160-70 रहता है, तो उन्हें इसे कम करने की सलाह दी जाती है। अगर नहीं कम कर पाते तो दवा एक उपाय है, पर हमारी सबसे पहली सलाह होती है जीवनशैली को ठीक करना। अगर नहीं कर पाए तो बाजार में दवाइयां मौजूद हैं। अपना रिस्क फैक्टर अवश्य जानें। ब्लड प्रेशर जांच, कोलेस्ट्राल जांच कराते रहें। सावधानी ही सबसे अच्छा बचाव उपाय है, यह हमेशा याद रखना चाहिए।- डॉ. अशोक सेठ, चेयरमैन, फोर्टिस स्काटर्स हार्ट इंस्टीटयूट, नई दिल्ली

सही आहार नियंत्रण में रखेगा आपका कोलेस्ट्रोल

बेकरी आइटम, कूकीज, केक, फ्रोजन पिज्जा, मट्ठी, रोल, फ्राइड फूड्स जैसे- फ्रेंच फ्राइज, डोनट्स और फ्राइड चिकन आदि। इन दिनों इस तरह के आहार का चलन तेजी से बढ़ा है। इन सभी खाद्य पदार्थों में ट्रांसफैट की अधिकता होती है जो कि खराब कोलेस्ट्रोल के स्तर को बढ़ा देता है और अच्छे गुड कोलेस्ट्राल को कम कर देता है। यह केवल हार्ट ही नहीं, बल्कि लिवर, मोटापा, किडनी सहित कई गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। आपके खानपान में अगर रेड मीट, अंडे की जर्दी, फुल क्रीम दूध, घी, डालडा वनस्पति और सेचुरेटेड फैट की अधिकता है तो बहुत संभव है कि आप उच्च कोलेस्ट्राल के शिकार हों। इसी तरह रसोई में मौजूद रेडी-टू-ईट फूड, डिब्बाबंद खानपान भी सही नहीं है।- डॉ स्वप्ना चतुर्वेदी, पूर्व वरिष्ठ डाइटिशियन, नई दिल्ली

बता दें कि अगर कुल कोलेस्ट्रोल दो मिलीग्राम से अधिक है तो यह आपके लिए एक बड़ी चेतावनी है। इसके बाद आपको तुरंत खानपान की पुरानी आदतों को बदल देनी चाहिए। बैड कोलेस्ट्रोल यानी एलडीएल के पीछे खराब खानपान ही मुख्य कारण है। गुड कोलेस्ट्रोल यानी एचडीएल आपको अच्छी वसा, मुफा युक्त तेल जैसे सरसों, बादाम, कैनोला, राइस ब्रैन तेल से मिल सकता है।

इसके अलावा कोलेस्ट्राल कम करने के लिए अपनी डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ानी चाहिए। इसके लिए साबुत अनाज, जैसे ओटस, जौ, ब्राउन राइस, क्विनोआ के साथ राजमा, मूंग दाल व अन्य दालों का सेवन करना चाहिए। हरी पत्तेदार सब्जियां, संतरे आदि लें, जो फाइबर से भरपूर हैं। इसी तरह, रिफाइंड कार्ब जैसे, मैदा, सफेद ब्रेड, चीनी आदि को आहार से दूर करें जो कि अच्छे कोलेस्ट्राल के स्तर को कम कर देते हैं।

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