बचपन का मोटापा है और भी खतरनाक, भविष्य में बन सकता है डायबिटीज और हार्ट डिजीज की वजह
डायबिटीज जैसी बीमारियों की शुरुआत मोटापे से होती है और मोटापे की शुरुआत ही अगर बचपन में ही हो जाए, तो सेहतमंद जीवन दांव पर लग सकता है। ...और पढ़ें

बच्चों में तेजी से बढ़ रहा है मोटापा (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जीवनशैली से उपजा मोटापा ऐसा विकार है, जो रोजाना की भागदौड़, तनाव, अव्यवस्थित दिनचर्या और खराब खानपान के साथ अनियंत्रित होता जाता है। ऐसे में अगर कोई बचपन से मोटापे का शिकार हो जाए, तो जवानी और बुढ़ापे में बीमारी की पटकथा पहले से ही तैयार हो जाती है।
डायबिटीज, कैंसर, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के बढ़ते बोझ और हर साल इससे होने वाली लाखों के मौतों के पीछे मोटापे की केंद्रीय भूमिका होती है। हाल ही में जारी 'वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस' के नवीनतम संस्करण के अनुसार, बच्चों में बढ़ते मोटापे के मामले में भारत अब चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। वर्ष 2025 तक के अनुमानित आंकड़ों की मानें तो चार करोड़ से अधिक बच्चों का वजन (बॉडी मास इंडेक्स) सामान्य से अधिक हो चुका है और लगभग डेढ़ करोड़ बच्चे मोटापाग्रस्त हैं।
बीमारियों के संभावित शिकार हैं दो करोड़ बच्चे
एटलस के अनुसार, 2040 तक भारत में दो करोड़ बच्चे मोटापाग्रस्त होंगे और 5.6 करोड़ बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स तय दायरे के बाहर जा चुका होगा, यानी 5 से 19 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को अगर गैर संचारी रोगों से बचाना है, तो अभी से अलग-अलग स्तरों पर प्रयास बढ़ाना होगा। वयस्कों जैसा ही हाइपरटेंशन और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का संकट इन बच्चों पर भी मंडरा रहा है।
रिपोर्ट का ही अनुमान है कि इस अवधि में 5.7 करोड़ बच्चों में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों (उच्च ट्राग्लिसिराइड) और 4.3 करोड़ बच्चों में हाइपरटेंशन के शुरुआत लक्षण दिखने शुरू हो जाएंगे। इसका प्राथमिक कारण यही है कि 11-17 वर्ष के आज तीन चौथाई पर्याप्त शारीरिक गतिविधियों से दूर हो चुके हैं।
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ऐसे बच्चे शुगर वाले पेय और डिब्बाबंद भोजन के आदी भी हो चुके हैं। कुल मिलाकर कहें, तो बच्चों को मोटापा और बीमारियों से बचाना है तो भोजन और शारीरिक सक्रियता दोनों हो मोर्चों पर अब तैयार होना होगा। ओबिसिटी एटलस को भारत के लिए भविष्य की एक बड़ी चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए।
स्कूलों में स्वस्थ खानपान की व्यवस्था से लेकर हानिकारक पैकेटबंद भोजन, शुगर की अधिकता वाले बेवरेज को लेकर अब सख्त होने की जरूरत है। इसी तरह प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के स्तर पर ही स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
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(Picture Courtesy: Freepik)
दो तरह का होता है मोटापा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, अत्यधिक और असंतुलित रूप से शरीर में वसा के जमाव को मोटापा कहा जाता है। इसे बॉडी मास इंडेक्स (व्यक्ति के कुल वजन (किग्रा.) में लंबाई (वर्ग मी.) से भाग देकर प्राप्त किया जाता है) मापा जाता है। गत वर्ष लांसेट कमीशन ने मोटापे के दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया- क्लीनिक मोटापा और प्री-क्लीनिकल मोटापा। नई परिभाषा में वजन, लंबाई, कमर का घेरा, मांसपेशियों के द्रव्यमान और अन्य अंगों की कार्यक्षमता आदि को भी शामिल किया गया है।
क्लीनिकल मोटापा-
इसमें डॉक्टर सांस फूलने, घरघराहट, स्लीप एप्निया, उच्च ट्राई ग्लिसिराइड, मेटाबोलिक समस्याएं, फैटी लिवर, रिप्रोडक्टिव सिस्टम में हो रहे बदलाव को भी देखते हैं। इस तरह के मोटापा में सामान्य लोगों की तुलना में हार्ट फेल होने, कमजोरी, जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं की आशंका अधिक रहती है। उपचार से पहले डाक्टर दैनिक जीवन की गतिविधियों के बारे में जानते हैं।
प्री-क्लीनिकल मोटापा-
इसे मोटापा के बजाय अत्यधिक वजन मान सकते हैं, यानी उससे पूर्व की अवस्था। ऐसे लोगों के शरीर में वसा का जमाव बढ़ जाता, लेकिन इससे बीमारी का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। इसमें शुरुआती तौर पर बचाव के उपाय किए जा सकते हैं, ताकि संभावित बीमारियों को रोका जा सके।

बचपन में मोटापे के कारण
- अस्वस्थ भोजन- उच्च कैलोरी वाले स्नैक्स, शुगर ड्रिंक्स, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड फूड जैसे कारण बच्चों में मोटापे का कारण बन रहे हैं। पोषणयुक्त और घर में बने भोजन को लेकर बच्चों को जागरूक करने की जरूरत है।
- सक्रियता की कमी- एक तरफ बच्चे अधिक कैलोरी वाले आहार ले रहे हैं, तो वहीं वे खेलकूद और अन्य एक्टिविटी से दूर हो रहे हैं। उनका स्क्रीन टाइम बढ़ गया है, वे पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक मोबाइल/लैपटॉप पर करते हैं। बच्चों को कम से कम दो घंटे खेलकूद जैसी गतिविधियों में शामिल करने के लिए बाहर निकालना चाहिए।
- अच्छी नींद का अभाव- सोने-जागने का समय तय नहीं होने और खराब नींद के चलते मेटाबोलिज्म प्रभावित होता है। अधिक भूख लगने के कारण लोग उच्च कैलोरी वाला भोजन लेने लगते हैं। नींद सही नहीं होने से बच्चों को थकान लगती है, जिससे शारीरिक गतिविधियों से दूर भागते हैं।
- आनुवंशिक और पारिवारिक कारण- कुछ बच्चों को आनुवंशिक कारणों से मोटापे की समस्या होती है। कुछ परिवारों में खानपान और दिनचर्या की अव्यवस्थित आदतों का असर बच्चों पर भी होता है, जिससे वे आसानी से मोटापे की गिरफ्त में आ जाते हैं।
किस तरह का जोखिम
- टाइप-2 डायबिटीज
- उच्च कोलेस्ट्राल, हाइपरटेंशन और हार्ट की समस्या
- जोड़ों और हड्डियों का दर्द
- सांस लेने में तकलीफ, अस्थमा और स्लीप एप्निया
- आत्मविश्वास में कमी
- डिप्रेशन और एंग्जाइटी
मोटापे से बचाव के लिए क्या है उपाय
- बच्चों को पैकेटबंद भोजन के बजाय फलों, सब्जियों और अनाज खाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- अधिक मीठे स्नैक्स या ड्रिंक्स के बजाय प्राकृतिक विकल्पों पर गौर करना चाहिए।
- बाहर के बजाय बच्चों को घर में बना भोजन खिलाना चाहिए।
- साइकिलिंग, स्किपिंग, रनिंग जैसी शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- बैठकर टीवी देखने या गेम खेलने के बजाय उन्हें एक्टिव रहने वाले कार्यों में लगाना चाहिए।
- बच्चों के सोने-जागने के समय तय करें और सोने से पहले इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों से दूर रखें।
परिवार जागरूक और स्कूल बनें सहयोगी
डॉ. आशीष गौतम (प्रिंसिपल डायरेक्टर, रोबोटिक व लेप्रोस्कोपिक सर्जरी, मैक्स हास्पिटल, नई दिल्ली) बताते हैं कि पांच से 19 वर्ष आयु के बच्चों में तेजी से मोटापा बढ़ने का मूल कारण यही है कि बीते 20 वर्षों में उनके खाने, खेलने और पालन-पोषण का तरीका बिल्कुल बदल गया है।
आज लोग अत्यधिक प्रसंस्करित भोजन कर रहे हैं, जिसमें शुगर, नमक और नुकसानदेह वसा की अधिकता होती है। लोगों का चलना-फिरना कम हो गया है, बैठे रहने व स्क्रीन देखने में वे घंटों बिता देते हैं। बच्चे कैलोरी बर्न कम और ग्रहण अधिक कर रहे हैं। इस असंतुलन के चलते मोटापा बढ़ रहा है।
अल्ट्रा प्रोसेस्ड स्नैक्स और शुगर वाले पेय आज आसानी उपलब्ध हैं, जबकि स्वस्थ आहार के विकल्प कम हो गए हैं। बचपन से ही ऐसे भोजन की आदत लग जाने से यह जल्दी छूटती नहीं। ज्यादातर जगहों पर ताजे, सेहत वाले भोजन की उपलब्धता कम हो गई है। साथ ही तनाव, खराब नींद और परिवार में खराब दिनचर्या जैसे कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।
अनेक स्तरों पर सक्रियता बढ़ाने की जरूरत है। परिवार में संतुलित भोजन, सीमित मीठे पेय पदार्थ, सोने की सही आदत और नियमित व्यायाम जैसे उपायों पर गौर करना होगा। स्कूलों में जंक फूड पर रोक और बच्चों के लिए शारीरिक सक्रियता की व्यवस्था करनी होगी। बच्चों को मोटापे से बचाना है तो परिवारों को जागरूक, स्कूलों को सहयोगी बनना होगा।