पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ऑटिज्म को पहचानना क्यों होता है मुश्किल? नई रिसर्च में खुलासा
अक्सर ऑटिज्म का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में छोटे लड़कों की छवि उभरती है। लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि यह समस्या कम उम्र के लड़कों में ज्यादा आम ...और पढ़ें

महिलाओं में क्यों होती है ऑटिज्म की देरी से पहचान? (Image Source: AI-Generated)
HighLights
नई रिपोर्ट ने ऑटिज्म पर पुरानी धारणा को चुनौती दी
किशोर लड़कियों में ऑटिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं
महिलाओं में ऑटिज्म का निदान अक्सर देरी से होता है
रॉयटर्स, नई दिल्ली। क्या आपको भी लगता है कि ऑटिज्म केवल लड़कों को होने वाली समस्या है? अगर हां, तो यह खबर आपकी सोच बदल सकती है। सालों से हम यही मानते आए हैं कि यह बीमारी कम उम्र के लड़कों में सबसे ज्यादा होती है, लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस पुराने दावे को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है। विज्ञान की दुनिया में आए इस नए मोड़ ने शोधकर्ताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।

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क्या ऑटिज्म सिर्फ लड़कों को होता है?
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) महिलाओं और पुरुषों दोनों में समान रूप से हो सकता है। यह जानकारी उन प्रचलित दावों का खंडन करती है जो इसे केवल लड़कों की बीमारी मानते थे। शोधकर्ताओं का मानना है कि अब हमें इस समस्या को देखने का नजरिया बदलना होगा।
किशोर लड़कियों में बढ़ते मामले
प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द बीएमजे' में प्रकाशित एक अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि किशोर लड़कियों में ऑटिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत देता है कि बचपन में लड़कियों में इस समस्या की पहचान नहीं हो पाती, और अक्सर किशोरावस्था तक पहुंचने पर ही इसका पता चलता है। यही कारण है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में इसका निदान काफी देरी से होता है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
पिछले तीन दशकों में एएसडी (ASD) के मामलों में व्यापक बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों पर नजर डालें तो अभी भी पहचान का अनुपात पुरुषों के पक्ष में झुका हुआ है- यानी हर एक महिला के मुकाबले तीन पुरुषों में इसकी पहचान हो रही है। आम तौर पर, ऑटिज्म की पहचान बचपन में लगभग 10 वर्ष की आयु तक हो जाती है, लेकिन लड़कियों के मामले में यह पैटर्न बदल रहा है।