एग्जाम का प्रेशर हो या हार्ट ब्रेक, क्यों बढ़ जाती है जंक फूड की तलब? समझें इमोशनल ईटिंग का साइंस
क्या आप भी ज्यादा स्ट्रेस में या उदास होने पर खाना शुरू कर देते हैं? इसे ही इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। ...और पढ़ें

क्यों इमोशनल ईट करते हैं कुछ लोग? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आपने देखा होगा कि कुछ लोग जब किसी एग्जाम के स्ट्रेस में होते हैं, ऑफिस के काम से परेशान होते हैं या फिर अकेला महसूस कर रहे होते हैं, तो उनका हाथ सीधे फ्रिज या स्नैक्स के डिब्बे की तरफ बढ़ता है। इसे इमोशनल ईटिंग कहते हैं।
इसका मतलब है कि व्यक्ति भूख की वजह से नहीं, बल्कि स्ट्रेस, उदासी, एंग्जायटी या बोरियत जैसी भावनाओं से निपटने के लिए खा रहा है। आइए डॉ. गौरव गुप्ता (सीनियर साइकायट्रिस्ट, सीईओ, तुलसी हेल्थ केयर, नई दिल्ली) से जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है और खाना कैसे भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है।
कोर्टिसोल हार्मोन का खेल
जब हम किसी तनाव वाली स्थिति से गुजरते हैं, तो हमारा शरीर फाइट या फ्लाइट मोड में आ जाता है। इस दौरान शरीर में कोर्टिसोल तेजी से रिलीज होता है, जो स्ट्रेस हार्मोन है।
कोर्टिसोल का काम शरीर को एनर्जी देना है, लेकिन जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो यह हार्मोन हमारे दिमाग को यह संकेत देता है कि शरीर को तुरंत ताकत की जरूरत है। यही वजह है कि तनाव में लोगों को मीठा, नमकीन और ज्यादा फैट वाले फूड्स, जैसे- पेस्ट्री, चिप्स, चॉकलेट या पिज्जा खाने की क्रेविंग होती है।
कंफर्ट फूड और डोपामाइन का कनेक्शन
इन अनहेल्दी फूड्स को अक्सर कंफर्ट फूड कहा जाता है, क्योंकि इन्हें खाते ही हमारे दिमाग में डोपामाइन नाम का फील-गुड केमिकल रिलीज होता है। डोपामाइन हमें कुछ समय के लिए खुशी और सुकून का अहसास कराता है।
खबरें और भी
हालांकि, यह राहत बहुत कम समय की होती है। जैसे ही खाना पचता है, तनाव का स्तर वापस वहीं पहुंच जाता है और व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा खाने के लिए पछतावा होने लगती है।
हंगर हार्मोन्स में गड़बड़ी
दिमाग अक्सर खाने को भावनात्मक सुरक्षा से जोड़ लेता है, जैसे- अगर बचपन में किसी बच्चे को रोने पर या उदास होने पर मीठा देकर चुप कराया गया हो, तो उसका दिमाग वयस्क होने पर भी तनाव से निपटने के लिए इसी तरीके को अपनाता है।
इसके अलावा, लगातार रहने वाला तनाव हमारे भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन्स, घ्रेलिन और लेप्टिन के संतुलन को बिगाड़ देता है। इस वजह से व्यक्ति को यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि उसे सच में भूख लगी है या वह सिर्फ अपनी भावनाओं को दबाने के लिए खा रहा है।

(AI Generated Image)
इस आदत को कैसे सुधारें?
- ट्रिगर्स को पहचानें- जब भी बिना भूख के खाने का मन करे, खुद से पूछें कि क्या आप सच में भूखे हैं या सिर्फ परेशान हैं?
- माइंडफुल ईटिंग- खाते समय टीवी या फोन बंद रखें और खाने के हर निवाले का स्वाद लेकर धीरे-धीरे खाएं।
- स्ट्रेस मैनेजमेंट- जब तनाव महसूस हो, तो खाने के बजाय 10 मिनट के लिए मेडिटेशन करें, जर्नलिंग करें या किसी करीबी से बात करें।
- पूरी नींद और एक्सरसाइज- अच्छी नींद और नियमित एक्सरसाइज से शरीर में कोर्टिसोल का लेवल नेचुरली कम होता है।