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    बच्चों की याददाश्त और स्वभाव बिगाड़ रहा है जंक फूड, जानें पेट और दिमाग का यह गहरा कनेक्शन

    Updated: Sun, 19 Apr 2026 09:50 AM (GMT+05:30)

    घर में तमाम तरह के स्नैक्स और होमकुकिंग के बाद भी मन भरता है तो बाहर के खाने से। पेट और दिमाग की इस जंग पर प्रकाश डाल रही हैं न्यूट्रिशनिस्ट अवनी कौल। ...और पढ़ें

    बच्चों में जंक फूड खाने की आदत है खतरनाक (Picture Courtesy: Freepik)

    बच्चों में जंक फूड खाने की आदत है खतरनाक (Picture Courtesy: Freepik)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दुनियाभर के शोध एक ही चिंता की ओर इशारा कर रहे हैं—किशोरों में बढ़ता मोटापा। अक्सर बच्चे खुद भी जंक फूड छोड़ने का संकल्प लेते हैं, लेकिन सफल नहीं हो पाते। इसकी बड़ी वजह इन खाद्य पदार्थों में छिपे प्रिजर्वेटिव्स और स्वाद बढ़ाने वाले रसायन हैं, जो सीधे दिमाग पर असर करते हैं। इस बारे में बता रही हैं न्यूट्रिशनिस्ट अवनी कौल

    दरअसल, जंक फूड की लत केवल एक खराब आदत नहीं, बल्कि शारीरिक निर्भरता और मानसिक तनाव से निपटने का एक गलत जरिया बन चुकी है। अधिक नमक और चीनी वाले ये फूड्स दिमाग के डोपामीन सिस्टम को कुछ इस तरह सक्रिय करते हैं कि बच्चा न चाहते हुए भी इनकी ओर खिंचा चला जाता है। 

    बार-बार ये चीजें खाने से दिमाग का 'रिवार्ड सिस्टम' गड़बड़ा जाता है, जिससे बच्चों में इन्हें खाने की क्रेविंग और लत पैदा होती है। शोध बताते हैं कि जिन किशोरों में आत्म-नियंत्रण की कमी होती है या जो तनावपूर्ण स्थितियों से गुजर रहे होते हैं, वे इमोशनल ईटिंग का सहारा लेते हैं। उनके लिए जंक फूड अस्थायी राहत पाने का एक जरिया बन जाता है, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है। 

    kid eating junk food (1)

    (Picture Courtesy: Freepik)

    दिमाग मांगता है खाना 

    क्या आप जानते हैं कि जंक फूड बच्चों की भूख को नहीं, बल्कि उनके दिमाग को निशाना बनाता है? बड़ी कंपनियां खाने में नमक, चीनी और फैट का ऐसा जादुई फार्मूला अपनाती हैं कि बच्चा बस खाता ही चला जाए। फूड कंपनियां रिसर्च के जरिए नमक, चीनी और वसा का एक ऐसा सटीक संतुलन तैयार करती हैं जिसे 'ब्लिस पाइंट' कहा जाता है। 

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    यह मिश्रण बच्चों के दिमाग में डोपामीन का संचार बढ़ा देता है, जिससे उन्हें अत्यधिक आनंद मिलता है। नतीजतन, शरीर को पोषण या भूख का एहसास होने के बजाय केवल मजे का अनुभव होता है। इससे बच्चों को खाना पोषण नहीं, बल्कि एक नशे की तरह लगने लगता है। क्योंकि छोटे बच्चों को अपनी इच्छाओं पर काबू पाना नहीं आता, इसलिए पेट भर जाने के बाद भी उनका मन नहीं भरता और वे ओवरईटिंग का शिकार हो जाते हैं।  

    भागदौड़ में पिछड़ी सेहत 

    वर्तमान की भागदौड़ भरी जीवनशैली में समय के अभाव के चलते अभिभावक अक्सर इंस्टेंट या प्रोसेस्ड फूड को प्राथमिकता देने लगे हैं। जब रसोई में इन खाद्य पदार्थों की मौजूदगी बढ़ जाती है, तो बच्चे अनजाने में इन्हें ही अपनी रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा मान लेते हैं। हालांकि, व्यस्तता को ढाल बनाना सही नहीं है; सतर्क माता-पिता अपनी सूझबूझ और बेहतर मील-प्लानिंग के जरिए इस चलन को बदल सकते हैं।

     मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता असर 

    जंक फूड किशोरों के मानसिक विकास के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रोसेस्ड फूड की अधिकता बच्चों की याददाश्त और सीखने की क्षमता को कमजोर कर सकती है। वैज्ञानिक शोधों ने इन खाद्य पदार्थों का सीधा संबंध डिप्रेशन और एडीएचडी जैसी गंभीर समस्याओं से जोड़ा है। 

    दरअसल, हमारे पेट और मस्तिष्क का गहरा जुड़ाव होता है; जंक फूड में मौजूद प्रिजर्वेटिव्स पेट के तंत्र को बिगाड़ देते हैं, जिससे न केवल मेटाबालिज्म धीमा पड़ता है बल्कि बच्चे के व्यवहार और स्वभाव में भी नकारात्मक बदलाव आने लगते हैं। 

    चले घर के खाने का जादू 

    बच्चों को बाहर के चटपटे खाने से दूर रखने का सबसे बेहतरीन तरीका है—घर की रसोई का कायाकल्प! उबाऊ और फीके खाने के बजाय नई कुकिंग तकनीकों जैसे ग्रिलिंग और तड़के का इस्तेमाल करें। मसालों और हर्ब्स की सही जुगलबंदी से घर के पोषण में बाहर जैसा स्वाद लाया जा सकता है। यकीन मानिए, अगर शुरुआत से ही उन्हें घर के लजीज खाने की आदत लग जाए, तो उनकी पहली पसंद हमेशा मां के हाथ का खाना ही होगा। 

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