क्या पार्किंसंस की बीमारी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है? न्यूरोलॉजिस्ट ने दिया जवाब
पार्किंसंस एक प्रोग्रेसिव डिजीज है, जो समय के साथ गंभीर होती जाती है।
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क्या पार्किंसंस का इलाज किया जा सकता है? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पार्किंसंस एक न्यूरोडिजेनरेटिव बीमारी है, जो वक्त के साथ धीरे-धीरे गंभीर होती है। इस बीमारी की वजह से व्यक्ति की चाल या काम करने की गति पर असर पड़ता है।
ऐसे में इस बीमारी से जुड़ा एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है? आइए इस बारे में डॉ. संजय पांडेय (हेड ऑफ डिपार्टमेंट, न्यूरोलॉजी, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से जानें।
क्या यह लाइलाज है?
मेडिकल साइंस में इतनी प्रगति होने के बावजूद अभी भी पार्किंसंस का कोई इलाज नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यह एक प्रोग्रेसिव बीमारी है, जिसमें दिमाग के अंदर डोपामाइन पैदा करने वाले न्यूरॉन्स धीरे-धीरे डैमेज होने लगते हैं।
डोपामाइन शरीर की मूवमेंट को कंट्रोल करने वाला एक केमिकल है। एक बार ये न्यूरॉन्स खत्म हो जाएं, तो इन्हें दोबारा जीवित करना फिलहाल संभव नहीं है। हालांकि, इस बीमारी को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन दवाओं की मदद से इसे काफी हद तक मैनेज कर सकते हैं।

पार्किंसंस को मैनेज कैसे कर सकते हैं?
पार्किंसंस का मैनेजमेंट अब केवल गोलियों तक सीमित नहीं रह गया है। इसके इलाज के लिए अब ए मल्टी-डिसिप्लिनरी पॉइन ऑफ व्यू अपनाया जाता है।
- दवाइयां- लेवोडोपा जैसी दवाएं आज भी इलाज का मुख्य आधार हैं। ये दवाएं लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित कर सकती हैं।
- थेरेपी- केवल दवाएं सब कुछ नहीं कर सकतीं। मरीज की गतिशीलता बनाए रखने के लिए फिजियोथेरेपी, बोलने की क्षमता सुधारने के लिए स्पीच थेरेपी और नियमित एक्सरसाइज करना जरूरी है। ये मरीज को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती हैं।
- एडवांस्ड ऑप्शन- कुछ खास मामलों में, जब दवाएं असर करना कम कर देती हैं, तब डीप ब्रेन स्टिमुलेशन जैसी आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जाता है, जो लक्षणों से बड़ी राहत दिला सकती है।
शुरुआती जांच है जरूरी
डॉ. पांडेय बताते हैं कि भारत में पार्किंसंस की स्थिति चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार, हर 1 लाख लोगों में लगभग 15 से 43 लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। भारत में एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कई मरीजों में यह लक्षण 50 वर्ष की आयु से पहले ही दिखने लगते हैं। यह वह उम्र होती है जब व्यक्ति अपने करियर और जीवन में सबसे ज्यादा एक्टिव होता है।
इसलिए समय पर इस बीमारी का पता लगाना इलाज को बेहतर बनाने के लिए काफी जरूरी है। अगर बीमारी को शुरुआती स्टेज में पहचान लिया जाए, तो इसे मैनेज करना आसान हो सकता है।
