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    90s Nostalgia: 'स्किप ऐड' के जमाने में याद करें बचपन के ये 5 जिंगल्स, आप भी कहेंगे- 'क्या दिन थे वो'

    Updated: Sat, 04 Apr 2026 12:33 PM (IST)

    90 का दशक... यह वो दौर था जब एंटरटेनमेंट का मतलब सिर्फ दूरदर्शन और कुछ गिने-चुने चैनल हुआ करते थे। ...और पढ़ें

    90s Nostalgia: आज 'स्किप ऐड' दौर में क्या आपको याद हैं पुराने जिंगल्स? (Image Source: AI-Generated)

    90s Nostalgia: आज 'स्किप ऐड' दौर में क्या आपको याद हैं पुराने जिंगल्स? (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जरा सोचिए... आप अपने पुराने घर के आंगन में बैठे हैं, टीवी पर 'चित्रहार' या संडे की फिल्म शुरू होने वाली है, और अचानक एक ऐसी धुन बजती है जो आपको टीवी स्क्रीन से बांध लेती है। आज के दौर में जब यूट्यूब पर ऐड आते ही हमारी उंगलियां 'Skip Ad' का बटन ढूंढने लगती हैं, 90 का दशक एक ऐसा सुनहरा समय था जब हम विज्ञापनों का भी बेसब्री से इंतजार करते थे।

    उस दौर के विज्ञापनों में कोई भारी-भरकम स्पेशल इफेक्ट नहीं होते थे, बल्कि उनमें होती थी सादगी, अपनापन और एक ऐसी जादुई धुन, जो सीधे हमारे दिल में उतर जाती थी। ये जिंगल्स सिर्फ प्रोडक्ट बेचने का तरीका नहीं थे, बल्कि ये तो हमारे बचपन का बैकग्राउंड म्यूजिक थे। आइए, आज इस आर्टिकल में आपको याद करवाते हैं 90 के दशक के वो 5 आइकॉनिक जिंगल्स, जिन्हें भुला पाना नामुमकिन है।

    1) "वॉशिंग पाउडर निरमा..."

    "दूध-सी सफेदी निरमा से आई, रंगीन कपड़ा भी खिल-खिल जाई..." 

    अगर आप 90 के दशक के बच्चे हैं, तो यह असंभव है कि आपने इस लाइन को बिना गाए पढ़ा हो। सफेद फ्रॉक पहने हुए गोल-गोल घूमती वो छोटी-सी लड़की और यह कैची धुन- यह भारत के हर घर की पहचान बन गया था। यह जिंगल इतना मशहूर था कि मोहल्ले के बच्चे खेलते समय इसे गाते थे। निरमा के इस विज्ञापन ने यह साबित कर दिया था कि अगर म्यूजिक में दम हो, तो एक साधारण-सा वॉशिंग पाउडर भी घर-घर का सुपरस्टार बन सकता है। 

    2) "विको टरमरिक, नहीं कॉस्मेटिक..."

    "विको टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम, कील मुहांसे जड़ से मिटाए, हल्दी चंदन के गुण इसमें समाएं!"

    रविवार शाम 4 बजे टीवी पर फिल्म शुरू होने से ठीक पहले यह विज्ञापन आना तय था। सबसे मजेदार बात यह है कि यह जिंगल किसी गाने की तरह नहीं, बल्कि एक पूरे पैराग्राफ की तरह था। फिर भी, उस दौर के दर्शकों को यह बिना अटके, एक सांस में याद रहता था। हल्दी और चंदन की अहमियत बताने वाला यह विज्ञापन और इसमें दिखाई जाने वाली वो पारंपरिक शादी की झलकियां किसी ब्लॉकबस्टर गाने से बिल्कुल कम नहीं थीं।

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    3) "जलेबी!..."

    "धारा, धारा, शुद्ध धारा..."

    एक छोटा-सा बच्चा जो अपनी मां से रूठकर, अपना छोटा सा बैग कंधे पर टांगकर घर छोड़कर जा रहा है। तभी रेलवे स्टेशन पर उसे रामू काका मिलते हैं और उसे वापस ले जाने के लिए दुनिया का सबसे अचूक नुस्खा आजमाते हैं- "घर पर गरमा-गरम जलेबी बन रही है!"

    बच्चे की बड़ी-बड़ी आंखें, उसके मुंह से निकला वो मासूम-सा शब्द "जलेबी?" और बैकग्राउंड में बजती बांसुरी की वो मीठी धुन। धारा रिफाइंड ऑयल के इस विज्ञापन ने कभी चीख-चीख कर अपना तेल नहीं बेचा, इसने बस एक प्यारा-सा अहसास बेचा, जो सीधा हमारे दिलों में घर कर गया।

    4) "हमारा बजाज..."

    "बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर... हमारा बजाज!"

    यह सिर्फ एक जिंगल नहीं था, यह उस दौर के भारतीय मिडिल क्लास का इमोशन था। जब टीवी पर यह विज्ञापन आता था, तो इसमें भारत की अलग-अलग संस्कृतियों, गलियों और आम लोगों की जिंदगी को दिखाया जाता था। उस समय घर के आंगन में 'चेतक' स्कूटर का खड़ा होना किसी लग्जरी कार से कम नहीं माना जाता था। इस जिंगल की धुन में एक अजीब सा गर्व और सुकून था, जो आज भी सुनने पर रोंगटे खड़े कर देता है।

    5) "ओहो हो स्कूल टाइम..."

    "क्लास वर्क, होम वर्क, पनिशमेंट... ओहो हो स्कूल टाइम, एक्शन का स्कूल टाइम!"

    संडे की शाम ढलते ही जब यह विज्ञापन टीवी पर आता था, तो बच्चों को याद आ जाता था कि कल सुबह स्कूल जाना है, लेकिन इसके बावजूद, कोई भी इस ऐड से नफरत नहीं करता था। घुंघराले बालों वाला वो प्यारा-सा बच्चा, जो अपने जूतों के फीते बांधते हुए स्कूल जाने के लिए तैयार होता था, उसने 'एक्शन शूज' को हर बच्चे का सपना बना दिया था। इस जिंगल ने स्कूल जाने जैसी बोरिंग चीज को भी 'कूल' बना दिया था।

    एक दौर जो अब लौटकर नहीं आएगा

    आज विज्ञापन करोड़ों के बजट से बनते हैं, बड़े-बड़े सुपरस्टार्स उनमें काम करते हैं, लेकिन वो ठहराव, वो मासूमियत और वो धुनें अब कहीं गायब हो गई हैं। 90 के दशक के ये जिंगल्स सिर्फ प्रोडक्ट नहीं बेचते थे, ये हमें एक-दूसरे से जोड़ते थे। आज जब भी कहीं गलती से ये पुरानी धुनें कानों में पड़ जाती हैं, तो एक पल के लिए ही सही, हम सब वापस उसी दूरदर्शन वाले दौर में लौट जाते हैं, जहां जिंदगी भले ही थोड़ी धीमी थी, लेकिन बहुत खूबसूरत थी।

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