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90s Nostalgia: पेन फाइट से लेकर बुक क्रिकेट तक... आज भी याद आते हैं क्लासरूम की लास्ट बेंच वाले 5 गेम्स

Published: Sat, 30 May 2026 10:31 AM (IST)

इस आर्टिकल में 90s के बच्चे क्लासरूम की लास्ट बेंच पर खेले जाने वाले गेम्स की यादें ताजा कर सकेंगे।

90s Nostalgia: बैकबेंचर्स के वो क्लासिक गेम्स जिन्हें खेलते हुए स्कूल में पकड़े जाने का अलग ही डर था (Image Source: AI-Generated)

90s Nostalgia: बैकबेंचर्स के वो क्लासिक गेम्स जिन्हें खेलते हुए स्कूल में पकड़े जाने का अलग ही डर था (Image Source: AI-Generated) 

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 90 के दशक का स्कूल और वो क्लासरूम की आखिरी बेंच... यह सिर्फ बैठने की जगह नहीं, बल्कि हम बैकबेंचर्स का अपना एक अलग 'गेमिंग जोन' हुआ करता था। जब टीचर ब्लैकबोर्ड की तरफ मुड़कर कोई बोरिंग चैप्टर पढ़ा रहे होते थे, तब पीछे एक अलग ही दुनिया चल रही होती थी।

इन गेम्स में जीतने की खुशी से ज्यादा, टीचर से छिपकर खेलने और पकड़े जाने पर क्लास से बाहर निकाले जाने का 'खौफ' मजेदार होता था। आइए, याद करते हैं वो क्लासिक गेम्स, जो हर 90s किड के दिल के करीब हैं।

90s classroom games

(Image Source: AI-Generated) 

पेन फाइट

WWE से भी ज्यादा रोमांच अगर किसी चीज में था, तो वो थी डेस्क पर होने वाली 'पेन फाइट'। नियम बहुत सिंपल थे- अपने पेन की मदद से सामने वाले के पेन को मारकर डेस्क से नीचे गिराना। इसके लिए खास तौर पर भारी और मोटे पेन चुने जाते थे।

जैसे ही पेन नीचे गिरकर आवाज करता और टीचर मुड़कर पूछती, "ये आवाज कहां से आई?" तब सबकी सांसें अटक जाती थीं और हम ऐसे प्रिटेंड करते थे जैसे पेन गलती से फिसल गया हो।

बुक क्रिकेट

जब मैदान में खेलने जाने का मौका नहीं मिलता था, तो हमारी रफ कॉपी या मैथ्स की मोटी किताब ही हमारा स्टेडियम बन जाती थी। किताब का पन्ना खोलना और पेज नंबर के आखिरी अंक (0, 2, 4, 6) को अपना रन मान लेना। अगर पेज नंबर 8 पर खुला, तो मतलब सीधा आउट।

जब हम छक्का लगने पर बिना आवाज किए खुशी मनाते थे और अचानक टीचर की नजर हम पर पड़ जाती थी। उस वक्त अपनी खुशी को छिपाकर सीरियस चेहरा बनाना एक अलग ही टैलेंट था।

राजा, मंत्री, चोर, सिपाही

कागज के चार छोटे टुकड़े और उन पर लिखे चार नाम। यह गेम बैकबेंचर्स के बीच बिना कोई आवाज किए खेला जाता था। पर्चियां डेस्क के नीचे से ऐसे पास की जाती थीं, जैसे हम कोई बहुत बड़ा सीक्रेट मिशन अंजाम दे रहे हों। मंत्री को चोर का पता लगाना होता था और अगर वो फेल हो गया, तो उसके सारे पॉइंट जीरो।

अगर पर्ची पास करते समय टीचर ने देख लिया, तो पर्ची सीधा डस्टबिन में जाती थी और हमें "क्लास के बाहर खड़े हो जाओ" की सजा मिलती थी।

जीरो-कांटा और FLAMES

हर स्टूडेंट की रफ कॉपी का आखिरी पन्ना एक 'गेमिंग बोर्ड' हुआ करता था। जीरो-कांटा खेलते-खेलते पूरा पन्ना कब भर जाता था, पता ही नहीं चलता था। और जब कुछ ज्यादा ही खाली समय मिलता, तो FLAMES खेलकर यह पता लगाया जाता था कि किस दोस्त की किस क्रश के साथ शादी होगी या दुश्मनी।

ऐसे में, टीचर का अचानक राउंड लगाते हुए पीछे आ जाना और कॉपी के उस रंगे हुए पन्ने को देख लेना, सचमुच डर का पल हुआ करता था।

डॉट्स और बॉक्सेस

यह गेम धैर्य और रणनीति का असली टेस्ट था। रफ कॉपी के पन्ने पर एक बड़ा सा बॉक्स बनाकर उसमें ढेर सारे डॉट्स बनाए जाते थे। हर प्लेयर को अपनी बारी में दो डॉट्स को जोड़कर एक लाइन खींचनी होती थी। जिसका बॉक्स पूरा होता, वो उसमें अपने नाम का पहला अक्षर लिख देता था।

जब हम बहुत ध्यान से लाइन खींच रहे होते थे और टीचर अचानक आकर कॉपी मांग लेती थीं। पूरी कॉपी में काम कम और पीछे डिब्बे ज्यादा नजर आते थे।

आज के बच्चों के पास भले ही हाई-टेक स्मार्टफोन्स, पबजी और प्लेस्टेशन मौजूद हों, लेकिन 90 के दशक के उन कागजी और डेस्क वाले गेम्स का अपना एक अलग ही स्वैग था। टीचर की डांट का वो डर, छिपकर खेलने का वो रोमांच और दोस्तों के साथ बिताए वो पल... सच में, वो दिन भी क्या दिन थे।

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