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90s Nostalgia: टीवी एंटीना हिलाकर छत से चिल्लाते थे- 'आया क्या?', चेहरे पर मुस्कान ले आएंगी 5 यादें

Published: Sat, 16 May 2026 10:48 AM (IST)

इस आर्टिकल को पढ़कर 90 के दशक के बचपन की यादें ताजा हो जाएंगी, जब लाइफ स्क्रीन और इंटरनेट के बिना भी बेहद मजेदार थी।

90s Nostalgia: इंटरनेट के 'डेटा' से ज्यादा मजबूत होती थी 'यारों की दोस्ती' (Image Source: AI-Generated)

90s Nostalgia: इंटरनेट के 'डेटा' से ज्यादा मजबूत होती थी 'यारों की दोस्ती' (Image Source: AI-Generated) 

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के बच्चों को देखकर कभी-कभी बहुत अचंभा होता है। उनकी दुनिया स्क्रीन, इंस्टाग्राम रील्स और वाई-फाई के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन एक ऐसा भी दौर था, जब हमारे पास ये सब नहीं था, फिर भी हमारा बचपन आज से कहीं ज्यादा रंगीन और खुशहाल था।

जी हां, हम बात कर रहे हैं 90 के दशक की। उस समय न तो हाथों में महंगे स्मार्टफोन थे और ना ही 5G इंटरनेट। फिर भी हमारे पास वक्त ही वक्त था और चेहरों पर सच्ची मुस्कान थी। आइए आज इस आर्टिकल में उन्हीं सुनहरी यादों की बात करते हैं, जिन्हें 90s के बच्चे आज भी बहुत मिस करते हैं।

Childhood Core Memories

(Image Source: AI-Generated)

रविवार का इंतजार और दूरदर्शन का जादू

90 के दशक में टीवी का मतलब सिर्फ 'दूरदर्शन' हुआ करता था। रविवार की सुबह का इंतजार हम पूरे हफ्ते करते थे। सुबह की शुरुआत 'रंगोली' से होती थी और फिर 'महाभारत', 'जंगल बुक', 'डकटेल्स' और 'शक्तिमान' जैसे शोज हमारी जान थे। शक्तिमान शुरू होने से पहले बच्चे टीवी के सामने ऐसे बैठते थे जैसे कोई बहुत जरूरी काम हो। और हां, टीवी का एंटीना खराब होने पर एक का छत पर जाकर उसे घुमाना और नीचे से चिल्लाकर पूछना- "आया क्या?" यह अपने आप में एक अलग ही रोमांच था।

गली के खेल और मिट्टी की महक

आजकल बच्चे मोबाइल पर वीडियो गेम्स खेलते हैं, लेकिन 90s के बच्चों का असली प्ले-ग्राउंड उनकी गलियां और मोहल्ले थे। छुपम-छुपाई, गिल्ली-डंडा, कंचे, पिठ्ठू और गली वाला क्रिकेट- ये वो खेल थे जो हमें घंटों तक घर से बाहर रखते थे। शाम ढलने पर जब तक मम्मी की जोरदार डांट नहीं पड़ती थी, तब तक कोई घर वापस नहीं लौटता था। उन खेलों में जो मजा और सुकून था, वो आज के महंगे प्ले-स्टेशन या मोबाइल गेम्स में कहीं नहीं है।

ऑडियो कैसेट को पेन से गोल-गोल घुमाना

स्पॉटिफाई और यूट्यूब के इस फास्ट जमाने में यह सोचना भी अजीब लगता है, लेकिन उस वक्त म्यूजिक का मतलब ऑडियो कैसेट होता था। रेडियो पर अपने पसंदीदा गानों के आने का इंतजार करना और उन्हें झट से ब्लैंक कैसेट में रिकॉर्ड करना एक बड़ा मिशन हुआ करता था। और सबसे मजेदार बात... जब कैसेट की रील अंदर फंस जाती थी, तो उसे एक पेन या नटराज की पेंसिल डालकर गोल-गोल घुमाकर ठीक करना। वो भी क्या दिन थे, जब गानों को सुनने के लिए भी हमें इतनी मेहनत करनी पड़ती थी।

गर्मियों की छुट्टियां यानी 'नानी का घर'

गर्मियों की छुट्टियों का सीधा सा मतलब होता था 'नानी का घर'। आज की तरह तब फैंसी समर कैंप्स नहीं होते थे। स्कूल की छुट्टियां पड़ते ही बस ट्रेन पकड़ी और पहुंच गए अपने चचेरे-ममेरे भाई-बहनों की पलटन के बीच। रात को छत पर एक साथ कई चारपाइयां बिछती थीं, खुले आसमान के नीचे तारे गिनते हुए दादी-नानी की कहानियां सुनना और पानी वाले कूलर की ठंडी-ठंडी हवा- वो सुकून आज किसी फाइव-स्टार होटल के एसी कमरे में भी नहीं मिलता।

ग्रीटिंग कार्ड और लैंडलाइन फोन की वो घंटी

आजकल हम वॉट्सएप पर एक सेकेंड में 'हैप्पी बर्थडे' का मैसेज भेज देते हैं, लेकिन 90s में नए साल, दीवाली या जन्मदिन पर बाजार जाकर सबसे खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड चुनना और उसमें अलग-अलग रंगों के पेन से अपने हाथ से संदेश लिखना एक बड़ा काम था। इसके अलावा, घर के बीचों-बीच रखा वो गोल डायल वाला या बटन वाला लैंडलाइन फोन। दोस्तों से छुप-छुप कर बात करना और अचानक पापा के कमरे में आते ही फोन काट देना, ये एक ऐसा थ्रिल था जिसे हम आज भी याद करके मुस्कुरा देते हैं।

90 का दशक सिर्फ एक समय नहीं था, वो एक एहसास था। माना कि आज तकनीक ने हमारी जिंदगी बहुत आसान बना दी है, लेकिन वो मासूमियत, वो बिना गैजेट्स वाली सच्ची दोस्ती और वो छोटी-छोटी चीजों में खुशियां ढूंढने की कला कहीं पीछे छूट गई है। 90s का वो दौर भले ही वापस न आए, लेकिन उसकी यादें हमेशा हमारे दिलों में एक मीठी मुस्कान बनकर जिंदा रहेंगी।

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यह लेख 90 के दशक के बचपन की यादें ताज़ा करता है, जब जीवन स्क्रीन और इंटरनेट के बिना भी खुशहाल था।