90s Nostalgia: मिस्टर इंडिया की घड़ी से संजू की पेंसिल तक, याद हैं बचपन की वो 5 अजीबोगरीब ख्वाहिशें?
आज हम भले ही हाईटेक गैजेट्स और एआई के युग में जी रहे हों, पर दिल के एक कोने में अब भी 90 के दशक की मासूम ख्वाहिशें ताजा हैं। ...और पढ़ें

90s Nostalgia: बचपन की वो 5 ख्वाहिशें जो आज भी यादों को ताजा कर देंगी (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 90 का दशक... एक ऐसा दौर जब हमारे पास इंटरनेट, स्मार्टफोन या सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन हमारी कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं थी। टीवी पर आने वाले शोज सिर्फ हमारा एंटरटेनमेंट नहीं करते थे, बल्कि वो हमारी दुनिया हुआ करते थे। स्कूल से लौटकर टीवी के सामने बैठना और अपने पसंदीदा किरदारों की तरह बनने के सपने देखना, हमारे दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा था।
आज जब हम बड़े हो गए हैं और असल जिंदगी की उलझनों में फंसे हैं, तो बचपन की वो मासूम ख्वाहिशें याद करके हंसी आ जाती है। आइए, आज एक बार फिर से यादों के उस सुनहरे बक्से को खोलते हैं और उन 5 अजीबोगरीब ख्वाहिशों को याद करते हैं जो 90 के दशक के हर बच्चे ने कभी न कभी जरूर की थीं।

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मिस्टर इंडिया की लाल घड़ी
अनिल कपूर की फिल्म 'मिस्टर इंडिया' देखने के बाद हर बच्चे की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही थी कि उसे वो लाल चश्मे वाली घड़ी मिल जाए। हम सब सोचते थे कि अगर वो घड़ी मिल गई, तो हम उसे पहनकर गायब हो जाएंगे। कोई स्कूल का होमवर्क न करने पर टीचर की डांट से बचने के लिए इसे चाहता था, तो कोई चुपके से रसोई में जाकर मम्मी से छुपकर मिठाइयां खाने के लिए। मुगैम्बो खुश हो या न हो, वो घड़ी पाने का सपना हमें जरूर खुश कर देता था।
संजू की जादुई पेंसिल
शाका लाका बूम बूम 90s के आखिर और 2000s की शुरुआत में आया था, लेकिन इस शो का क्रेज हर 90s किड के सिर चढ़कर बोला। संजू की वो पेंसिल, जिससे पेपर पर कुछ भी बनाओ और वो सच में बाहर आ जाए- वाह! क्या कमाल का आइडिया था। हमने न जाने कितनी ही बार अपनी आम नटराज या अप्सरा की पेंसिलों से कॉपी पर साइकिल, क्रिकेट बैट या चॉकलेट की ड्रॉइंग बनाई, इस उम्मीद में कि शायद ये भी सच में बाहर आ जाएं।
खबरें और भी
शक्तिमान की तरह गोल-गोल घूमकर उड़ना
मार्वल और डीसी के सुपरहीरोज तो बहुत बाद में आए, हमारा पहला और इकलौता देसी सुपरहीरो तो 'शक्तिमान' ही था। संडे दोपहर 12 बजे का मतलब था टीवी के सामने चिपक जाना। शक्तिमान को गोल-गोल घूमकर आसमान में उड़ते देख, हमने भी छत या आंगन में दोनों हाथ ऊपर करके खूब गोल-गोल घूमने की कोशिश की। ऐसा करते हुए चक्कर खाकर गिरना और फिर मम्मी से डांट खाना, लगभग हर घर की कहानी थी।
मोगली बनकर जानवरों से बातें करना
"जंगल जंगल बात चली है, पता चला है..." यह गाना सुनते ही आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 'द जंगल बुक' का मोगली हमारा हीरो था। चड्डी पहनकर पेड़ों पर कूदना, बगीरा और भालू जैसे जानवरों को अपना दोस्त बनाना और शेर खान को मजा चखाना- यही हमारा सपना था। हम सब चाहते थे कि काश हम भी जानवरों की भाषा समझ पाते और उनके साथ जंगल में एक रोमांचक जिंदगी जी पाते।
सोनपरी और अल्तू अंकल का जादू
"इत्तु बित्तु झिम पतुता..." यह जादुई मंत्र किसे याद नहीं? फ्रूटी की तरह हम भी चाहते थे कि जब भी हम किसी मुसीबत में फंसे, तो एक प्यारी सी सोनपरी और मजेदार अल्तू अंकल हमारी मदद के लिए आ जाएं। खासकर जब बात मैथ्स के मुश्किल होमवर्क की हो या कमरे की सफाई करने की! हम सोचते थे कि बस एक बार सोनपरी अपनी जादुई छड़ी घुमा दे और हमारे सारे काम अपने आप हो जाएं।
आज ये ख्वाहिशें भले ही बचकानी लगें, लेकिन ये हमारी जिंदगी का सबसे मासूम और खूबसूरत हिस्सा थीं। आज भी जब उन दिनों की याद आती है, तो बिना किसी वजह के चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कान आ ही जाती है।