हर समय बेचैन रहता है मन? प्रेमानंद महाराज ने बताया इसे काबू में करने का सही तरीका
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि अगर इंसान गलत आचरण करे और सिर्फ अपने मन के मुताबिक चले, तो इसका परिणाम हमेशा दुर्भाग्य ही लाता है। ...और पढ़ें

अपने मन के इशारों पर बिना सोचे चलना है दुखों का कारण (Image Source: Flickr & Magnific)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण क्या है? संत प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब हम बिना सोचे-समझे अपने मन के इशारों पर चलने लगते हैं और गलत आचरण करते हैं, तो जीवन में दुर्भाग्य आना तय माना जाता है।
वे कहते हैं, "हमारा मन लगातार हमारे भीतर दो अलग-अलग तरह की इच्छाएं पैदा करता रहता है, इसलिए इसे सही दिशा दिखाना बेहद जरूरी है।"
सिर्फ सख्ती से नहीं मानेगा मन
हममें से कई लोग सोचते हैं कि मन को सिर्फ डराकर या नकारात्मक विचारों से दबाया जा सकता है, लेकिन महाराज जी साफ करते हैं कि यह तरीका कभी काम नहीं आता। उनका कहना है कि किसी भी इंसान को, या खुद अपने मन को काबू में करने के लिए हमेशा दो चीजों का संतुलन चाहिए- प्यार और कंट्रोल।
मन की जायज मांगों को दें दुलार
मन की हर बात बुरी नहीं होती। महाराज जी समझाते हैं कि अगर आपका मन कोई ऐसी मांग करता है जो धार्मिक है और सही है, तो उसे प्यार से स्वीकार करें।
उन्होंने इस बात को एक उदाहरण के जरिए भी समझाया। मान लीजिए आपका मन कह रहा है, "आज मुझे रसगुल्ला खाना है।" ऐसे में तुरंत खुद से तीन सवाल पूछें:
- क्या मेरी यह इच्छा गलत है?
- क्या यह धर्म के विरुद्ध है?
- क्या ऐसा करना कोई पाप है?
अगर इन सभी सवालों का जवाब 'नहीं' है, तो अपने मन की बात सुनें और खुशी-खुशी उस रसगुल्ले का आनंद लें।
बुरी इच्छाओं पर लगाना होगा ब्रेक
मन का दूसरा पहलू वह है जहां यह आपसे गलत काम करवाना चाहता है या कुछ बुरा देखने की जिद करता है। प्रेमानंद जी महाराज हमें सावधान करते हैं कि ऐसी ही बुरी इच्छाओं के आगे झुककर हमने अपने न जाने कितने ही जन्म बर्बाद कर दिए हैं। जब भी मन ऐसी कोई नेगेटिव डिमांड करे, तो वहां प्यार नहीं, बल्कि आपके कंट्रोल की जरूरत होती है।
मन को साधना है जरूरी
मन रूपी घोड़े की लगाम कसने के लिए आपको इन दो रुझानों का ही इस्तेमाल करना होगा। महाराज जी इसे एक बहुत ही सीधे और स्पष्ट नियम में बांधा है:
- अगर इच्छा धार्मिक है, तो बेझिझक उसका आनंद लें।
- अगर इच्छा अधार्मिक है, तो बिना किसी हिचकिचाहट के अपने मन को वहीं काबू में कर लें।
यही वह आसान तरीका है जिससे आप अपने मन को अपना सबसे अच्छा दोस्त बना सकते हैं और दुर्भाग्य से बच सकते हैं।