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लाहौरी, अजमेरी और कश्मीरी गेट! क्या सच में इन शहरों तक जाते थे दिल्ली के ये रास्ते? पढ़ें इनका असली इतिहास

Updated: Mon, 17 Aug 2026 07:00 AM (IST)

दिल्ली में सफर करते हुए बहुत से ऐतिहासिक दरवाजे देखे होंगे, आज उनकी कहानी जान लीजिए!

दिल्ली के सभी ऐतिहासिक दरवाजों के इतिहास (Image Source: AI Generated)

दिल्ली के सभी ऐतिहासिक दरवाजों के इतिहास (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज आप दिल्ली दर्शन पर निकलें तो आपको जगह-जगह गेट दिखेंगे, अलग-अलग नामों के गेट। कहीं पर कश्मीरी गेट लिखा मिलेगा, कहीं अजमेरी गेट तो कहीं पर दिल्ली गेट; इन्हें पढ़ने पर ऐसा लगता है जैसे ये गेट कश्मीर, अजमेर और दिल्ली के ही खुफिया दरवाजे हों। 

लेकिन क्या आप इनके पीछे का इतिहास जानते हैं? आखिर इन गेटों के नाम किसने रखें और इसके पीछे वजह क्या थी? आइए आपको दिल्ली के इस पुराने इतिहास के सफर पर ले चलते हैं। 

कश्मीरी गेट 

दिल्ली से बाहर कहीं जाना हो तो लोग कश्मीरी गेट आईएसबीटी का रुख करते हैं पर इसका इतिहास नहीं जानते। इस गेट का निर्माण 17 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहां ने करवाया था। इस गेट की दिशा उत्तर-पश्चिम है जो कश्मीर की भी है। इसी वजह से यह गेट कश्मीरी गेट कहलाया। 

इतिहास में 1857 के विद्रोह के साथ कश्मीरी गेट का खास कनेक्शन है। ऐसा इसलिए क्योंकि जब स्वतंत्रता सेनानियों ने दिल्ली की घेराबंदी शुरू की तो यहीं पर कब्जा कर रणनीति बनाई थी। 

अजेमरी गेट 

शाहजहां ने जब शाहजहानाबाद नाम से दिल्ली को बसाया था तब इन गेटों का निर्माण करवाया था। इनमें से एक गेट अजमेरी गेट भी है जिसका निर्माण भी 17वीं शताब्दी में हुआ। दरअसल, दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित इस गेट का रास्ता राजस्थान के अमजेर शरीफ की ओर जाता है। 

दिल्ली गेट 

शाहजहां की राजधानी शाहजहानाबाद का मुख्य प्रवेश द्वार दिल्ली गेट ही था। यह उनकी राजधानी का दक्षिणी दरवाजा था। इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से हुआ था, जिसका इस्तेमाल शाही काफिलों के आने-जाने में किया जाता था। कहा जाता है कि मुगल काल में बादशाह इसी रास्ते से नमाज अदा करने जाते थे। 

तुकर्मान गेट 

अगर आप कनाट प्लेस से पुरानी दिल्ली की ओर जाएंगे तो आपको रामलीला मैदान के पास एक गेट मिलेगा, उसका नाम तुर्कमान गेट है। इसका नाम किसी क्षेत्र के नाम पर नहीं, बल्कि सूफी संत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया। मुगल काल में यहां दरगाह हुआ करती थी। इस तरह यह गेट आने-जाने का मार्ग होने के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान भी रखता है। 

मोरी गेट 

मोरी गेट का इतिहास सिखों और मुगलों दोनों से जुड़ा हुआ है। साल 1783 में शाह आलम द्वितीय के समय मुगलों का आतंक बढ़ता जा रहा था। ऐसे में सिखों ने इस अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद की और पंजाब से बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह अहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया के नेतृत्व में लगभग 40 हजार घुड़सवार सिख सैनिक दिल्ली की ओर रवाना हो गए। 

इस बारे में जैसे ही शाह आलम को मालूम हुआ, उसने आदेश देकर दिल्ली के सभी दरवाजों को बंद करवा दिया। इसी समय सिखों को मालूम हुआ कि एक गेट ऐसा है जहां से दीवार तोड़कर किले के अंदर प्रवेश मिल सकता है। इस तरह सिखों ने जिस जगह पर छेद किया था, इसे ही मोरी गेट नाम दिया गया। 

लाहौरी गेट 

लाल किले का मुख्य पश्चिमी द्वार लाहौरी गेट दिल्ली और आगरा दोनों जगहों पर है। इस गेट से निकलने वाला शाही मार्ग सीधे लाहौर की तरफ जाता था, इसी वजह से शाहजहां ने इस दरवाजे का नाम लाहौरी रखा। आज हर साल भारत के आजादी दिवस पर यहीं से ध्वजारोहण और प्रधानमंत्री का भाषण समारोह आयोजित किया जाता है।