सिर पर जलती गगरी, पैरों में थिरकन..! बेहद अनोखा है राजस्थान का चरी लोकनृत्य, जिसमें गुर्जर नर्तकियां करती हैं डांस
पानी से भरी गगरी का डांस तो देखा होगा लेकिन आग से जल्दी गगरी का नृत्य अनोखा है!

बूंद-बूंद भरने की कला से जन्मा चरी लोकनृत्य (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान की लोक संस्कृति की बात ही निराली है, यहां लोग संघर्ष में भी मनोरंजन ढूंढ लेते हैं और फिर संस्कृति के साथ उसका ऐसा मेल बिठाते हैं कि वह पारंपरिक गीत और नृत्य बन जाता है। यहां के रेगिस्तानी इलाकों में पानी भरने के लिए मीलों दूर का सफर तय करना पड़ता था जिससे पनिहारी लोकगीत की शुरुआत हुई और इसी पानी भरने की कला को महिलाओं ने नृत्य का रूप भी दे दिया।
हम बात कर रहे हैं राजस्थान की परंपरा में खास स्थान रखने वाले चरी नृत्य की। आइए आपको इस अनोखी लोकनृत्य का दिलचस्प सा इतिहास और इसकी शैली के बारे में बताते हैं।
बूंद-बूंद भरने की कला से जन्मा चरी लोकनृत्य
चरी नृत्य राजस्थान में अजमेर और किशनगढ़ क्षेत्र से संबंध रखता है। यह नृत्य यहां रहने वाली गुर्जर समुदाय की महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसकी उत्पत्ति की बात करें तो इसका जन्म मीलों दूर से पानी भरकर लाने के रोज के संघर्ष और दिनचर्या से हुआ है।
मीलों दूर से पानी भरकर लाना एक मुश्किल काम था। फिर एक गगरी और मटकी पूरे परिवार के लिए पर्याप्त भी नहीं थी। ऐसे में महिलाओं ने इसका तोड़ निकाला और पीतल, कांसे की एक के ऊपर एक गगरी रखकर पानी भरना शुरू किया। पनिहारी का यह संघर्ष सोचने भर से कितना कठिन लगता है, पर यहां भी उन्होंने अपने मनोरंजन का साधन ढूंढ लिया। इस तरह राजस्थान में चरी लोकनृत्य की शुरुआत हुई।
कैसे किया जाता है यह नृत्य?
इस नृत्य को करने के लिए नृत्यांगनाएं राजस्थान की पारंपरिक पोशाक पहनती हैं। वहीं, बाजूबंद, हंसली, तिमनिया, पूंची, मोगरी, गजरा, कड़ली, कणका जैसे गहने पहनकर खुद का शृंगार करती हैं। इसके बाद सिर पर मिट्टी या पीतल की चरी यानी बर्तन को रखा जाता है। फिर इनके ऊपर दीये या तेल में डूबी रूई रख नृत्य शुरू होता है।
इस दौरान, महिलाएं बिना हाथ हिलाए संतुलन बनाते हुए कमर और पैरों का लयबद्ध तालमेल बिठाती हैं। यह भी बताते चलें कि चरी नृत्य वृत्ताकार रूप में होता है।
ढोलक और हारमोनियम वाद्य यंत्र की अहम भूमिका
चरी लोकनृत्य ढोलक की थाप और हारमोनियम की धुन पर किया जाता है। इसके अलावा, नगाड़ा, ढोल, थाली और बैंकिया जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र भी इस्तेमाल होते हैं। बता दें कि इस लोकनृत्य ने अब राजस्थान में व्यावसायिक रूप ले लिया है।

