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गौरा-महेश का नाम और एक ताल में थिरकते कदम, उत्तराखंड के पारंपरिक लोकनृत्य ‘झोड़ा’ की कुछ कहानी है खास

Published: Fri, 07 Aug 2026 03:19 PM (IST)Updated: Wed, 12 Aug 2026 12:57 PM (IST)

देवभूमि उतराखंड में पग-पग पर संस्कृति की अनोखी झलक देखने को मिलती है, इसी संस्कृति का अहम हिस्सा है यहां का झोड़ा नृत्य।

उत्तराखंड की झोड़ा लोकनृत्य गान परंपरा (Image Source: AI Generated)

उत्तराखंड की झोड़ा लोकनृत्य गान परंपरा (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड को देवों की भूमि कहा जाता है, यहां की खूबसूरत वादियां जहां एक तरफ टूरिस्ट को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं तो वहीं पौराणिक मंदिर भीतर भक्ति की लौ जगाते हैं। इस राज्य की अपनी अनूठी संस्कृति है और इसी संस्कृति का हिस्सा है यहां का लोकप्रिय झोड़ा नृत्य। आज हम उत्तराखंड की इसी संस्कृति का हिस्सा रहे झोड़ा लोक नृत्य की बात करेंगे। 

उत्तराखंड की झोड़ा लोकनृत्य गान परंपरा 

उत्तराखंड में झोड़ा एक सामुदायिक नृत्य है, जिसका संबंध उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्रों जैसे अल्मोड़ा, रानीखेत, सोमेश्वर, द्वाराहाट से है, पर गढ़वाल के कुछ इलाकों में भी काफी लोकप्रिय है। इसके नाम पर जाएं तो यह हिन्दी शब्द जोड़ा से निकलकर झोड़ा बना है। वहीं, नेपाली में झोड़ा का मतलब हाथ जोड़ने से होता है, इस तरह समझें तो हाथ जोड़कर नृत्य करने की कला ही झोड़ा है। 

इसे खासतौर से वसंत ऋतु के आगमन, विशेष तीज-त्योहार और शादियों में किए जाने की परंपरा रही है। यह लोकनृत्य परंपरा को संजोए रखने के साथ ही जात-पात के भेदभाव को भी मिटाता है। सुबह और शाम के समय मनोरंजन के रूप में इसे किया जाता है। 

दो तरह का होता है कुमाऊं में झोड़ा 

उत्तराखंड के कुमाऊं में मुक्तक और प्रबंधात्मक दो तरह से झोड़ा किए जाने का रिवाज है। वैसे इसका मूल रूप प्रबंधात्मक ही है, जिसमें क्षेत्र विशेष के लोक देवी-देवताओं और वीर-पुरुषों का चरित गान होता है। 

एक ही घेरे में नाचता है गांव 

इस लोकनृत्य में हिस्सा लेने वाले सभी लोग सबसे पहले एक गोल घेरा बनाकर और एक दूसरे का हाथ थामकर खड़े हो जाते हैं। इसके बाद हल्का सा झुकते हुए लयबद्ध तरीके से कदम बढ़ाते हैं। हुड़का की पहली ताल पर बायां पैर दाएं पैर को क्रॉस करते हुए जमीन पर पड़ता है। 

फिर दूसरी ताल पर दाएं पैर को हल्का सा कूदते और झुकते हुए बगल की ओर आगे बढ़ता है। इसके बाद फिर से सभी अपनी ओरिजिनल स्टैन्डिंग प्वाइंट पर आ जाते हैं। झोड़ा को करने के लिए कम से कम 6 और ज्यादा से ज्यादा 200 लोग तक भाग ले सकते हैं। एकता और भाईचारे का प्रतीक यह झोड़ा नृत्य स्त्री और पुरुष एक साथ करते हैं। 

शिव-पार्वती की कथाओं से है खास नाता 

झोड़ा के लोकगीतों में शिव-पार्वती जिन्हें वहां गौरा-महेश कहते हैं, का खास स्थान है। इसमें गाई जाने वाली लीलाएं भगवान शिव और माता-पार्वती से जुड़ी हुई हैं। इस तरह इस लोकनृत्य का संबंध केवल परंपरा से ही नहीं आस्था से भी है। 

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