'लॉलीपॉप' गाने से बिल्कुल अलग है बिहार का असली संगीत, जन्म से लेकर विदाई तक, हर मौके के लिए हैं खास लोकगीत
फिल्मी भोजपुरी गानों से आज बिहार के संगीत को जज किया जाता है, लेकिन वहां का असली लोक संगीत सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। ...और पढ़ें

बिहार के लोकसंगीत की कहानी (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भोजपुरी गानों का नाम सुनते ही दिमाग में लॉलीपॉप और जान लेबु का हो जैसे गाने आते हैं, लेकिन बिहार का असली संगीत इन फिल्मी गानों से काफी अलग है।
बिहार का असली संगीत यहां के लोकगीतों में छिपा है। जन्म हो, शादी, विदाई या कोई त्योहार, यहां हर मौके के लिए गाना है। चैत्र के महीने में चैती, सावन में कजरी, कार्तिक महीने में शारदा सिन्हा जी की आवाज में गूंजते छठ के गीत बिहार के असली संगीत की पहचान हैं। आइए जानें बिहार में गाए जाने लोक संगीत के बारे में।
सोहर
बच्चे के जन्म पर महिलाएं सोहर गाती हैं। जुग-जुग जिय सु ललनवा सबसे पुराने सोहर में से एक है, जिसकी गूंज हर घर में बच्चे के जन्म पर सुनाई देती है। इन गीतों के जरिए महिलाएं नए मेहमान को आशीर्वाद देती हैं और परिवार के लिए अपनी खुशी जाहिर करती हैं।
समदाउन और कोहबर गीत
समदाउन विदाई के गीत होते हैं, जिन्हें मिथिलांचल क्षेत्रों में खूब गाया जाता है। “बड़ा रे जतन से राम, सिया धिया पोसलहुं राम, ओहो धिया राम ले ले जाय…” जैसे गीत समदाउन होते हैं, जिनमें बेटी की विदाई के दुख और उसके लिए अपने प्रेम को जाहिर किया जाता है।
कोहबर गीत
शादी के बाद जब दुल्हा-दूल्हन कोहबर में जाते हैं, तब कोहबर गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में नवविवाहित जोड़े के भविष्य की मंगल कामना और आशीर्वाद होता है।
छठ पर्व के गीत
छठ महापर्व बिहार की आस्था का प्रतीक है। कार्तिक महीने में शारदा सिन्हा जी की आवाज में “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…” और “उगी हे दीनानाथ…” से पूरा बिहार भक्ति के रंग में रंग जाता है। इन गीतों को छठी मैया और सूर्य देवता की पूजा के लिए गाया जाता है। जब अर्घ्य देने के लिए लोग गंगा के किनारे आते हैं, तो हर घाट पर छठ पूजा के गीत सुनने को मिलते हैं।
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कजरी और चैती
सावन के महीने में कजरी गाई जाती है। इसमें बारिश के मौसम की सुंदरता और अपने प्रेमी से विरह के दर्द को बयां किया जाता है। वहीं चैत्र महीने में बिहार चैती गीतों में रम जाता है। इन गीतों में प्रकृति की सुंदरता और वसंत के उल्लास को बयां किया जाता है।
बिदेसिया
बिदेसिया को मशहूर करने में भिखारी ठाकुर का अहम योगदान है। ये गीत प्रवासी मजदूरों के घर छोड़कर जाने के दुख और उनके परिवार के वियोग को बहुत खूबसूरती से जाहिर करता है। पलायन का दर्द, विरह और सामाजिक कुरीतियां बिदेसिया के आधार हैं।
रोपनी के गीत
धान के खेतों में धान के पौधे रोपते समय महिलाएं रोपनी के गीत गाती हैं। इन गीतों से मनोरंजन भी होता है और रोपाई की थकान भी कम होती है। साथ ही, इन गीतों में वे इंद्र देवता से अच्छी बारिश की प्रार्थना करती हैं।