वो भोजपुरी लोकगीत जिसे सुनकर बड़े हुए यूपी-बिहार के बच्चे, लता दीदी ने सुर देकर कर दिया था अमर
जमाना चाहे जितना बदल गया हो, लेकिन इस गीत की मिठास आज भी दिलों में बिल्कुल ताजा है।

मां की गोद का एहसास करता है ये भोजपुरी लोकगीत (Image Source: YT)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन की वो रातें याद हैं, जब दुनिया का सारा सुकून मां की गोद और उसकी गुनगुनाती लोरियों में सिमट जाता था? बिहार की माटी और भोजपुरी की मिठास से उपजी ऐसी ही एक कालजयी लोरी है- "ऐ चंदा मामा आरे आवा..."।
जरा सोचिए, एक मां का वात्सल्य कितना खास होता है कि वह अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए सीधे चांद को ही जमीन पर उतरने का न्योता दे डालती है। पीढ़ियों से चली आ रही इस मासूम मनुहार में ममता का एक पूरा ब्रह्मांड बसा है।

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इस मशहूर भोजपुरी लोरी की कहानी
इस लोरी में एक मां के अपने बच्चे के प्रति अगाध प्रेम और दुलार का वर्णन है, जिसे भोजपुरी लोक संस्कृति की सबसे अमूल्य धरोहरों में से एक माना जाता है। बता दें, यहां "चंदा मामा" को बुलाना दरअसल प्रकृति और बच्चे के बीच एक खूबसूरत रिश्ता जोड़ने का प्रतीक है, जो बच्चे को खुशी और सुकून देता है।
गीत की शुरुआत में मां चंदा मामा से मनुहार करते हुए कहती है:
"चंदा मामा आरे आवा, पारे आवा,
नदिया किनारे आवा..."
यहां मां चंदा मामा से गुहार लगा रही है कि आसमान की दूरियां मिटाकर, नदियों के किनारे से होते हुए वे सीधे उसके बच्चे के पास आ जाएं। वह अपने बच्चे की खुशी के लिए चांद को भी जमीन पर उतार लाना चाहती है।
सोने की कटोरी और 'दूध-भात' का लाड़-दुलार
इस लोरी के बोल भले ही बहुत सीधे और सरल लगते हों, लेकिन इनके पीछे छुपे वात्सल्य के जज्बात बहुत मजबूत हैं। इस गीत की आगे की पंक्तियां मां के दुलार को और बढ़ा देती हैं:
"सोने के कटोरिया में दूध-भात लेले आवा,
बबुआ के मुंहवा में घुटुक..."
इन लाइनों का मतलब है, "हे चंदा मामा, जब तुम आना तो सोने की कटोरी में दूध और चावल लेकर आना, और मेरे प्यारे बच्चे को अपने हाथों से प्यार से खिला जाना।"
यहां सोने की कटोरी बच्चे के लिए मां के सबसे अनमोल सपनों का प्रतीक है और 'दूध-भात' उस सादगी भरे पोषण का, जो हर मां अपने बच्चे को देना चाहती है।

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वात्सल्य रस से सराबोर है यह लोकगीत
इस लोरी की धुन और शब्द इतने मीठे हैं कि यह श्रोता के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। भोजपुरी लोकगीतों की यही खासियत रही है कि उन्होंने रिश्तों की मिठास, बचपन की मासूमियत और मां की ममता को अपने गीतों में बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पिरोया।
पारंपरिक शैली में गाए जाने वाले इस गीत को सुनकर आज भी लोग भावुक हो जाते हैं और उन्हें अपनी मां की याद आ जाती है। यह गीत केवल सुलाने के लिए नहीं, बल्कि उस सुरक्षा और प्यार को महसूस करने के लिए गाया जाता है, जो एक मां की बांहों में मिलता है।
लता दीदी की आवाज ने बना दिया अमर
1965 में बनी भोजपुरी फिल्म 'भौजी' से इस लोकगीत को मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह मिली और लता मंगेशकर ने इसे अपनी आवाज देकर अमर कर दिया। आज भले ही दुनिया बहुत मॉडर्न हो गई है और 'ट्विंकल-ट्विंकल' जैसी अंग्रेजी कविताओं का चलन बढ़ गया है, लेकिन 'ऐ चंदा मामा आरे आवा...' जैसी लोक धुनें हमें हमेशा अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखती हैं।
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