सख्त मिजाज से दोस्ताना अंदाज तक, Millennial और Gen-Z डैड्स कैसे बदल रहे हैं 'फादरहुड' के मायने?
वक्त के साथ फादरहुड के मायने काफी बदल गए हैं। अब मिलेनियल और जेन-जी डैड्स पेरेंटिंग के नए तरीके अपना रहे हैं और बच्चों के लिए पूरा समय निकाल रहे हैं। ...और पढ़ें

कैसे बदल रहे हैं फादरहुड के मायने? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। समय के साथ समाज बदला है और इसके साथ ही माता-पिता की भूमिका भी बदल गई है। पहले पिता से बात करने में बच्चे कतराते थे, उन्हें काफी सख्त और कड़क स्वभाव का समझते थे और पेरेंटिंग में इनकी मुख्य भूमिका सिर्फ परिवार के लिए पैसे कमाने की होती थी।
लेकिन आज मिलनेयिल्स और जेन-जी पीढ़ी के डैड्स फादरहुड की इस डेफिनेशन को बदल रहे हैं। आज के पिता सिर्फ प्रोवाइडर नहीं, बल्कि केयर गिवर की भूमिका भी निभा रहे हैं। यानी वे बच्चों के पालन-पोषण में भी बराबरी की भागीदारी निभा रहे हैं। इस फादर्स डे के मौके पर आइए जानते हैं कैसे ये यंग डैड्स फादरहुड के मायने बदल रहे हैं।
पैरेंटिंग में बराबर की जिम्मेदारी
मिलेनियल्स से पहले की पीढ़ी तक पिता का काम पैसे कमाना और मां का काम बच्चों को संभालना होता था, लेकिन नई पीढ़ी इस फिक्स रोल को चैलेंज कर रही है। आज के मिलेनियल और जेन-जी डैड्स बच्चों के डायपर बदलने, उन्हें खाना खिलाने और सुलाने से लेकर स्कूल प्रोजेक्ट्स और पेरेंट्स मीटिंग में भी उतने ही एक्टिव रहते हैं, जितनी मां रहती हैं। वे इसे मदद करना नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। इसलिए अपने बच्चों की देखभाल के लिए अब पिता छुट्टी लेने में भी संकोच नहीं करते।
इमोशनल सपोर्ट सिस्टम
आमतौर पर माना जाता रहा है कि पिता अपनी भावनाएं छिपाकर रखते हैं, लेकिन आजकल के डैड्स ऐसा नहीं करते। वे बच्चों के सामने खुलकर अपनी भावनाएं जाहिर करते हैं और उनसे दोस्त बनकर बात करते हैं। आज के डैड्स बच्चों को पूरी तरह सुरक्षित इमोशनल स्पेस देने की कोशिश कर रहे हैं।
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जेंडर स्टीरियोटाइप को तोड़ना
बच्चे के डायपर बदलने और खाना खिलाने की जिम्मेदारी सिर्फ मां की है और पिता का काम सिर्फ अनुशासन सिखाने का है। ये पुराने जमाने के जेंडर स्टीरियोटाइप्स हैं, जिन्हें मिलेनियल और जेन-जी डैड्स तोड़ रहे हैं। रसोई में खाना बनाना हो या बच्चों के बाल संवारना, ये डैड्स हर काम को खुशी-खुशी अपना रहे हैं, जिससे बच्चों को बचपन से ही समानता की सीख मिल रही है।
वर्क-लाइफ बैलेंस चुन रहे
पुरानी पीढ़ी के पिता काम के चक्कर में अक्सर बच्चों के जरूरी पल, जैसे स्कूल का एनुअल फंक्शन या पेरेंट्स मीटिंग का हिस्सा नहीं बन पाते थे, लेकिन आज के डैड्स काम के साथ-साथ परिवार के लिए भी समय निकाल रहे हैं। वे बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताने, वीकेंड्स पर घूमने, गेम्स खेलने और साथ में नई हॉबीज सीखने के लिए समय निकाल रहे हैं।
डिजिटल और टेक-सैवी डैड्स
इंटरनेट के दौर में पले-बढ़े ये डैड्स पैरेंटिंग के लिए केवल पुरानी सलाहों को नहीं अपना रहे। वे पैरेंटिंग ऐप्स, पॉडकास्ट और ब्लॉग्स के जरिए बच्चों के विकास और पोषण की नई जानकारियां रखते हैं। साथ ही, वे सोशल मीडिया पर अपनी डैड लाइफ को खुलकर शेयर करते हैं, जिससे समाज में पिता की एक नई, सेंसिटिव और कूल इमेज बन रही है।