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‘डाली डाली पे अनार...’ ब्याह में महफिल जमा देता है ये हरियाणवी लोकगीत, थिरके बिना नहीं रह पाते भाभियों के कदम

Published: Sun, 27 Sep 2026 07:44 PM (IST)Updated: Wed, 30 Sep 2026 01:04 PM (IST)

शादी की शहनाइयां हों या डीजे का शोर, जब तक हरियाणवी लोकगीतों की तान न छेड़ी जाए, तब तक हर जश्न अधूरा-सा लगता है।

हरियाणवी ब्याह की महफिल में रंग जमा देता है यह लोकगीत (Image Source: AI-Generated)

हरियाणवी ब्याह की महफिल में रंग जमा देता है यह लोकगीत (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज हम आपको एक ऐसे पारंपरिक हरियाणवी लोकगीत के बारे में बताने जा रहे हैं, जो सोशल मीडिया रील्स से लेकर शादी के मंडपों तक छाया हुआ है। जी हां, इसे सुना तो आपने भी जरूर होगा, मगर शायद ही ढोलक की थाप और डीजे की बीट्स के बीच इस गाने में पिरोए गए ठेठ हरियाणवी शब्दों के असली मायनों पर ध्यान दिया हो। 

दरअसल, इस मस्ती भरे गीत की तह में उतरें, तो इसके पीछे हरियाणा की लहलहाती किसानी, संयुक्त परिवार की गर्माहट और एक नई-नवेली दुल्हन की प्यारी-सी अठखेलियों का खूबसूरत ताना-बाना नजर आता है। आइए, गांव के खेतों से निकलकर मॉडर्न पार्टीज की शान बनने वाले इस सदाबहार लोकगीत के दिलचस्प पहलुओं और इसके पीछे छिपे असल अर्थ को करीब से समझते हैं।

'मेरे ससुर ने बाग लगाया रे' का असल मतलब

यह गाना हरियाणा की पारंपरिक लोक गायन शैली में रचा गया एक बेहद पुराना और प्रसिद्ध गीत है। पुराने समय में जब जीवन पूरी तरह से खेती-किसानी और बागवानी पर निर्भर था, तब महिलाएं खेतों और बागों के काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं।

इस लोकगीत की सबसे मशहूर पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं:

"मेरे ससुर ने बाग लगाया रे, डाली डाली पे अनार...
मैं तो भर के टोकरा चाली रे, ले लो-ले लो रे अनार..."

इस गाने में एक नई-नवेली बहू अपने ससुराल की संपन्नता का बखान बड़े ही चुलबुले अंदाज में कर रही है। वह गाते हुए बता रही है कि उसके ससुर ने एक बहुत ही सुंदर बाग लगाया है, जिसकी हर डाली पर रसीले अनार लदे हुए हैं। वह बहू मजाक मस्ती में सिर पर फलों का टोकरा रखकर एक फल बेचने वाली की तरह इतराते हुए चल रही है और कह रही है, "मुझसे ये अनार ले लो।"

हरियाणवी देहात की जान है यह लोकगीत

इस लोकगीत के बोल भले ही बहुत सीधे और मजाकिया लगते हों, लेकिन इनके पीछे हरियाणा के देहाती जीवन और पारिवारिक रिश्तों की एक मजबूत डोर छिपी है। यह गीत सिर्फ अनार बेचने के बारे में नहीं है, बल्कि यह एक ससुर और बहू के बीच के खुशमिजाज रिश्ते को भी दर्शाता है।

यह गाना दिखाता है कि एक बहू अपने ससुराल की तरक्की और लहलहाते बागों को देखकर कितनी खुश और गर्वित है। टोकरा उठाकर चलने का जिक्र उस दौर की मेहनतकश महिलाओं के आत्मविश्वास और उनके जीवन की सादगी का प्रतीक है।

चुलबुले बोलों में छिपी महिलाओं की हंसी-ठिठोली

इस गाने की धुन इतनी जीवंत और शब्द इतने ठेठ हैं कि यह तुरंत जुबान पर चढ़ जाता है। जब भी शादियों में महिला संगीत होता है, तो ढोलक की थाप पर महिलाएं इस गीत को गाए बिना नहीं रह पातीं। यह गीत सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं गाया जाता, बल्कि यह महिलाओं को घूंघट की आड़ में भी अपनी खुशी जाहिर करने और आपस में हंसी-ठिठोली करने का एक बेहतरीन जरिया देता है।

हर जगह है इस हरियाणवी गाने का जलवा

एक वक्त था जब यह गीत सिर्फ हरियाणा के गांवों के आंगनों तक ही सीमित था, लेकिन आज के दौर में यह बड़े शहरों की हाई-प्रोफाइल पार्टियों में भी जमकर बजता है।

इसे नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाने में सोशल मीडिया और नए संगीतकारों का बड़ा हाथ रहा है। इस पारंपरिक गीत को जब नए रैप और मॉडर्न बीट्स के साथ रीमिक्स किया गया, तो यह इंटरनेट पर वायरल हो गया। आज यह गाना युवाओं की पार्टियों की शान बन गया है, और हर कोई इसके हुक स्टेप पर रील बनाता नजर आ जाता है।

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