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    महंगाई डायन खाए जात है...पंचायत के प्रधानजी ने गाया बुंदेलखंड का यह लोकगीत, आज भी बयां करता है आम आदमी का दर्द

    Updated: Tue, 16 Jun 2026 02:05 PM (IST)

    बुंदेलखंड का मशहूर लोकगीत 'महंगाई डायन खाए जात है', जो गयाप्रसाद प्रजापति ने लिखा था, आम आदमी के दर्द को बयां करता है। यह गीत मध्य प्रदेश के बड़वाई गा ...और पढ़ें

    बुंदेलखंड का लोकगीत जो बना आम आदमी की जुबां (Picture Credit- Youtube)

    बुंदेलखंड का लोकगीत जो बना आम आदमी की जुबां (Picture Credit- Youtube)

    HighLights

    1. 'महंगाई डायन खाए जात है' बुंदेलखंड का प्रसिद्ध लोकगीत है

    2. यह गीत पीपली लाइव फिल्म से देश-दुनिया में मशहूर हुआ

    3. रघुबीर यादव ने गांव की मंडली संग इसे आवाज दी

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कला और संस्कृति से समृद्ध भारत ने आज भी अपनी कई अनोखी लोककलाओं को सहेज रखा है। हमारे पारंपरिक लोकगीत और नृत्य पूरी दुनिया में मशहूर हैं। महानगरों की चकाचौंध और आसमान चूमती इमारतों के शोर से दूर, सच्चे भारत की आत्मा और धड़कन आज भी हमारे छोटे और खूबसूरत गांवों में ही बसती है।

    ऐसी ही खूबसूरती मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बसे बुंदेलखंड में देखने को मिलती है। यहां आपको सिर्फ हवाओं की सोंधी महक ही नहीं, बल्कि एक ऐसा जादुई संगीत भी मिलता है, जो सीधे मिट्टी से जुड़ा होता है। आज इस आर्टिकल में हम एक ऐसे ही लोकगीत के बारे में जानेंगे, जो लंबे समय से आम आदमी के दर्द को उजागर करता आया है और इसी वजह से यह गीत बॉलीवुड का हिस्सा भी बना, जिससे इसे काफी लोकप्रियता भी मिली। 

    छोटे से गांव से निकला लोकगीत

    हम बात करे रहे हैं- बुंदेलखंड के मशहूर लोकगीत महंगाई डायन खाए जात है कि। गांवों के चौपालों से निकला यह एक साधारण-सा देहाती गीत, पूरे देश और दुनिया की आवाज बन गया। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह मशहूर गीत मध्य प्रदेश के एक छोटे-से गांव 'बड़वाई' का है। वहां की गलियों और आंगनों में गूंजने वाले इस गीत के जन्म की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। इसे किसी नामी गीतकार ने नहीं, बल्कि गांव के ही एक लोकगीत गायक गयाप्रसाद प्रजापति ने लिखा था।

    बड़े पर्दे से मिली पहचान

    शुरुआती दौर में इसे गांव की ही एक छोटी-सी संगीतमय टोली, 'बड़वाई विलेज मंडली' अपने लोगों का दुख-दर्द बांटने और उनका मनोरंजन करने के लिए गाती थी। यह बस एक क्षेत्रीय धुन थी, जिसे ग्रामीण गाकर अपनी दिन भर की थकान मिटाते थे, लेकिन इसकी किस्मत तब रातों-रात चमक उठी, जब 2010 में आई बॉलीवुड फिल्म 'पीपली लाइव' ने इसे पूरी दुनिया के सामने पेश किया। खास बात यह थी कि फिल्म में उसी असली ग्रामीण मंडली ने मशहूर अभिनेता रघुबीर यादव के साथ मिलकर इस गीत को अमर बना दिया।

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    आम जन का दर्द बयां करता गीत

    इस गीत के लोकप्रिय होने की एक वजह यह भी है कि इसमें आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन का दर्द और संघर्ष साफ झलकता है। दरअसल, यह भारतीय लोक कला और ग्रामीण कहानी कहने की उस महान परंपरा का बेहतरीन उदाहरण है, जो हमेशा से मजदूर और कामकाजी वर्ग की परेशानियों को आवाज देती आई है।

    इस गीत में सामाजिक और राजनीतिक हालातों पर बहुत ही गजब का तीखा व्यंग्य यानी 'डार्क ह्यूमर' किया गया है। इसमें लगातार बढ़ती महंगाई को किसी आम समस्या की तरह नहीं, बल्कि एक भयानक और आदमखोर 'डायन' के रूप में बताया गया है, जो एक गरीब इंसान की खून-पसीने की कमाई को बेरहमी से निगल जाती है।

    देसी संगीत और बुंदेलखंडी बोली की मिठास

    इस गाने की सबसे बड़ी खूबी इसका संगती और इसकी सादी बोली है। यह गाना देसी अंदाज का एक परफेक्ट उदाहरण है, जिसे सुनते ही हारमोनियम की मीठी तान, ढोलक की जोरदार थाप और मंजीरे की छन-छन सुनाई देती है। वहीं, बात करें इसकी बोली की, तो चूंकि इसे मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र की ठेठ देहाती हिंदी बोली में गाया गया है, इसलिए इसके बोल कानों में पड़ते ही एक गहरा अपनापन महसूस कराते हैं। इसे एक तरह का पारंपरिक 'लोक-व्यंग्य' या 'श्रम गीत' भी कह सकते हैं।

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