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    बुंदेलखंड का वो लोकगीत, जिसे सुन आज भी थिरक उठते हैं पैर; अनिल कपूर की 'सूबेदार' का भी बना हिस्सा

    Updated: Tue, 09 Jun 2026 02:30 PM (IST)

    बुंदेलखंड का मशहूर लोकगीत "चिलम तंबाकू को डब्बा" गांव की चौपाल से निकलकर इंटरनेट पर वायरल हुआ और फिर बॉलीवुड फिल्म 'सूबेदार' का हिस्सा बन गया। आइए जान ...और पढ़ें

    बुंदेलखंड का लोकगीत "चिलम तंबाकू को डब्बा" (Picture Credit- AI Generated)

    बुंदेलखंड का लोकगीत "चिलम तंबाकू को डब्बा" (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. "चिलम तंबाकू को डब्बा" बुंदेलखंड का प्रसिद्ध लोकगीत

    2. गांव की चौपाल से बॉलीवुड फिल्म 'सूबेदार' तक पहुंचा

    3. राई शैली का यह गीत सोशल मीडिया पर भी वायरल

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय लोककला और संस्कृति सदियों से यहां की पहचान बनी हुई है। यहां हर एक क्षेत्र की अपनी अलग बोली और लोक संस्कृति है, जिसकी झलक यहां के गीतों में सुनने को मिलती है। ऐसा ही एक गीत बुंदेलखंड इलाके का है, जो गांव की चौपाल से निकलकर इंटरनेट का वायरल सेंसेशन और फिर बॉलीवुड का सुपरहिट ट्रैक बन चुका है।

    हम बात कर रहे हैं बुंदेलखंड के मशहूर लोकगीत "चिलम तंबाकू को डब्बा" की। अगर आप मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में रहते हैं, तो आपने कभी न कभी यह गाना जरूर सुना होगा। बुंदेलखंड की मिट्टी से निकला यह लोकगीत, सोशल मीडिया के मीम और फिर सीधे फिल्मी पर्दे तक पहुंच चुका है। आइए, इस मजेदार और जोशीले लोकगीत के बारे में जानते हैं विस्तार से- 

    गांव की चौपाल से कैसेट तक का सफर

    इस गीत की कहानी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके से शुरू होती है। पुराने जमाने में जब शाम के समय गांव की चौपाल सजती थी, तो चिलम और तंबाकू से जुड़ी बड़े-बुजुर्गों की लंबी गपशप होती थी। उसी माहौल से यह 'हास्य गीत' पैदा हुआ। "तंबाकू का डिब्बा कहां गया?"- इस एक छोटे से सवाल से बना यह गाना मीठी और नोकझोंक भरी जिंदगी को मजेदार तरीके से दर्शाता है। 

    1990 और 2000 के दशक में जब टेप रिकॉर्डर और कैसेट का दौर आया, तो कुछ क्षेत्रीय कंपनियों ने इसे हर घर तक पहुंचा दिया। नरोत्तम बैंन, रामधन गुर्जर और संजो बघेल जैसे दिग्गज लोक गायकों की आवाज में यह गीत स्थानीय शादियों और मेलों की जान बन गया। आज भी बुंदेलखंड में कोई भी शादी-पार्टी इस गाने के बिना अधूरी मानी जाती है। 

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    मीम की दुनिया और बॉलीवुड का तड़का

    बदलते समय के साथ जब इंटरनेट का दौर आया, तो धीरे-धीरे यह गाना युवाओं के बीच तेजी से पॉपुलर होने लगा। सोशल मीडिया पर अक्सर कई ऐसी रील्स देखने को मिलती हैं, जहां बुंदेलखंड के लोग अपनी पहचान बताने के लिए इस गाने पर डांस करते नजर आते हैं। 

    सोशल मीडिया के बाद इस गाने ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि साल 2026 में इसे सीधे बॉलीवुड में एंट्री मिल गई। अनिल कपूर की फिल्म 'सूबेदार' में इसे एक नए, आधुनिक और क्लब-फ्रेंडली अंदाज में पेश किया गया, जिसे लोगों ने खूब प्यार दिया।

    क्या है इसके संगीत का असली जादू?

    बात करें इस गीत की शैली की, तो यह ठेठ 'राई' शैली का गीत है। राई, बुंदेलखंड का वह लोक नृत्य है, जो अपनी तेज गति के लिए जाना जाता है। इस गीत की मूल भाषा बुंदेली है, लेकिन इसकी असली धड़कन तेज ढोलक, हारमोनियम की सुरीली तान और चिमटे या मंजीरे की खनक है। इस पूरे गीत में आपके तंबाकू के डिब्बे के ईर्द-गिर्द होते सवाल-जवाब सुनने को मिलेंगे। 

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